You are here
Home > Uncategorized > श्रीमहालक्ष्मीचरितमानस:सुन्दरकाण्ड | Shree Mahalakshmi Charit Manas

श्रीमहालक्ष्मीचरितमानस:सुन्दरकाण्ड | Shree Mahalakshmi Charit Manas

#Mahalakshmi #CharitManas #Sundarkand #Deepawali #Diwali #महालक्ष्मी

(सर्वाधिकार सुरक्षित )

श्रीगणेशाय नमः 
श्रीमहालक्ष्मीर्विजयते 

श्रीमहालक्ष्मीचरितमानस

चतुर्थ सोपान
श्री सुन्दरकाण्ड

आर्ष स्तुति

ऊर्णनाभाद्यथा तन्तुर्विस्फुलिंगा विभावसोः |
तथा जगद्यदेतस्या निर्गतं तां नता वयम् ||
यन्मायाशक्तिसंक्लृप्तं जगत्सर्वं चराचरम् |
तां चितिं भुवनाधीशां स्मरामः करुणार्णवाम् ||
यदज्ञानाद् भवोत्पत्तिर्यज्ज्ञानाद् भवनाशनम् |
संविद्रूपां च तां देवीं स्मरामः सा प्रचोदयात् ||
महालक्ष्म्यै च विद्महे सर्वशक्त्यै च धीमहि |
तन्नो देवी प्रचोदयात् || 

मंगलाचरण श्लोक 

या माता जगतां हिताय कुलदेवीरूपमाश्रित्य वै,
लोकत्राणमहो करोति सततं दुःखान्धकारापहा |
सर्वाभीष्टफलप्रदा जगति या सर्वार्थ तत्त्वात्मिका,
वन्दे तां परमेश्वरीं हृदि महालक्ष्मीं परां वत्सलाम्  || 1||

यस्यामन्तर्लोकमेतद्विभाति ,
योगक्षेमं या वहत्येव तुष्टा |
भक्त्या लभ्यां वत्सलां वै श्रियं ताम्,
वन्दे देवीं मातरं देयदात्रीम् ||2||

अग्रोहाख्यं महातीर्थं सिद्धकाननशोभितम् |
वन्दे कोलापुरं चापि करवीरस्थितं श्रियः ||3||

दोहा
सौती मुनि बोले सुनो शौनक अब वृत्तान्त |
श्रीमाँ के वात्सल्य का सुन्दर शुभद नितांत || 1 (अ) ||
पावन ब्रह्मावर्त में रम्य क्षेत्र हरियान | 
शोभित सिद्धारण्य तहँ महालक्ष्मी का स्थान || 1 (आ) || 

चौपाई 
श्री का सिद्धपीठ सुप्रसिद्धा | वहाँ बसे बहु ऋषि मुनि सिद्धा ||
करें भक्ति से श्रीआराधन | श्रीविद्या का केन्द्र पुरातन ||        
गर्ग महर्षि ख्यात तहँ सिद्धा | श्रीविद्यातत्त्वज्ञ प्रसिद्धा || 
पिप्पलादसुत तेजनिधाना | करें महालक्ष्मी का ध्याना || 
गर्गाश्रम श्रीविद्यागुरुकुल | छात्रकुटीरों का तहँ संकुल || 
पावें श्रीविद्याउपदेशा | शिष्यवृन्द ख्याति सब देशा ||

 करे वहन महालक्ष्मी ही उनका योगक्षेम | 
जीवमात्र के प्रति सहज गर्गहृदय में प्रेम || 2 (अ) ||  

गर्गकदाचित् रात्रि में कीर्तनमग्न विभोर | 
रोमांचित वपु नयन जल हिय में उठे हिलोर || आ || 

ॐ महालक्ष्म्यै नमः यह कीर्तन ध्वनि दिव्य |  
गूँजे आश्रम में मधुर क्रमशः मृदुता नव्य || इ || 

प्रकटी महालक्ष्मी कहा सुनो गर्ग मुनिराय |
आया सिद्धारण्य के निकट युवक असहाय || ई ||

अग्रसेन सेवक धीमंता | गणतन्त्रोद्धारक स्वनियन्ता ||
समता-ममता-करुणाधारी | धर्ममूर्ति वह जनउपकारी ||
उसकी प्रकृति में नय बोधा | अभय अहिंसा दम अक्रोधा ||
शान्ति दया मार्दव धृति त्यागा | सच अद्रोह तेज वैरागा ||
था प्रतापपुर का युवराजा | पर हिय चाहा लोकस्वराजा ||
खल काका ने उसे सताया | वह निरुपाय राज्य तज आया ||
भक्तिमती माता का वह सुत | है विषण्ण अति निजजनवंचित ||
उसे निजाश्रम में ले आओ | शिष्य रूप में मुनि अपनाओ ||
दीजे श्रीविद्या उपदेशा | जो नाशे जीवन के क्लेशा ||
वत्सल वचन सुने श्री माँ के | गहे विभोर गर्ग पद वाँके ||
बोले तव वात्सल्य अनूपा | माँ तुम केवल प्रेमस्वरूपा ||
योगक्षेम सन्तति के धारो | सदा विपद से तुम हो तारो ||
माँ बोली सब मम उपजाये | सेवक भक्त मुझे अति भाये ||
सेवा वत्स भक्ति की मूला | मैं सेवक के प्रति अनुकूला ||
अग्र स्वयं को सेवक माने | तुच्छ राजसुख को वह जाने ||

सेव्यसेवकभाव ही भक्तिसाधनामूल |
ऐसे सेवक भक्त ही नाशें जग के सूल || 3 (अ) ||

भक्तपराधीना ह्यहं वत्स स्वतन्त्रा नैव |
भक्तानां हितचिन्तनं क्रियते मया सदैव || आ ||

अन्तर्धान हुई महालक्ष्मी श्री जगदम्ब |
हे शौनक माता परा भक्तों की अवलम्ब || इ ||

उठे गर्ग चलने लगे शिष्य कहा हे तात |
कहाँ अँधेरे में चले बाकी आधी रात || ई ||

कहे शिष्य से गर्ग ने मधुर सुधासम बैन |
मातृकार्य कीन्हे बिना मुझे नहीं अब चैन || उ ||

तुरत मशाल शिष्य तब लाया | आगे होकर मार्ग दिखाया ||
गर्ग महर्षि हृदय अनुरागे | अग्रसेन को खोजन लागे ||
सोचें हिय श्री माँ की लीला | माता कैसी करुणाशीला ||
सदा प्रीति जीवों पर राखे | जीव न किन्तु प्रीतिरस चाखे ||
निरखत जाय गर्ग चहुँ ओरा | आतुर दृक् हिय भावविभोरा ||
बीती रात भोर हो आई | क्रमशः अरुण प्रभा नभ छाई ||
सरसमीप अग्रहिं अवलोका | जो था निद्रामग्न सशोका ||

सुप्त अग्र जागा झटिति सुनि मुनि की पदचाप ||
दिखे गर्ग सम्मुख खड़े करते अजपाजाप || 4 ||

प्रखर तेजयुत अग्निज्वाल से | आभा दमके दीप्त भाल से ||
दीरघ वपु प्रलम्ब भुजदण्डा | शोभित यथा अपर मार्तण्डा ||

सघन जटा श्मश्रू तथा वल्कल कटिप्रदेश |
राजमान मुस्कान से गर्ग तपस्वी वेश || 5 ||

अग्र गर्ग को शीश नवाया | मुनिदर्शन से हिय हरषाया ||
अग्रहिं लखे गर्ग तपधामा | अति गम्भीर स्वरूप ललामा ||

शरदशशी सम रम्य मुख रुचिर केश रद नास |
उन्नत कन्धर पुष्ट वपु आनन किन्तु उदास || 6 ||

आकृति राजकुलोद्भव जानी | घनगम्भीर कही मुनि बानी ||
कौन युवक क्यों भटको वन में | क्या बाधा आई जीवन में ||
लगे विषादग्रस्त मन चंचल | दुखछाया छाई मुखमण्डल ||

सुने गर्ग के मृदु वचन भरे अग्र के नैन |
पाय स्नेह उमगा हृदय बोला सविनय बैन || 7 ||

वल्लभ हुए प्रतापपुरीशा | उनका सुत मैं अग्र मुनीशा ||
कुरुक्षेत्रे हि धर्मयुद्धार्थम् | यातो जनको मम निःस्वार्थम् ||
पाण्डवपक्षे विहितं युद्धम् | पित्रा कौरवपक्षविरुद्धम्  ||
रण में पिता वीरगति पाई | की तब काका कुन्द कुटिलाई ||
वह भटगण मालव से पाया | शासन पर अधिकार जमाया ||
मातृभ्रातृ सह वध मम चाहा | रच डाला षडयन्त्र अथाहा ||

मेरी माता भगवती मैं अरु मेरा भ्रात |
सौम्य पुरोहित राज्य से निकले बिछुड़े तात || 8 (अ) ||

माता भ्रात पुरोहित हुए नदीजलमग्न |
सुना वृत्त पर ना हुई मेरी आशा भग्न || (आ) ||

उन्हें खोजता भटका वन में | लिये प्रबल आशा मैं मन में ||
खोजा बहुत पता नहीं लागा | हूँ दुर्दैवाक्रान्त अभागा ||

चिन्ता चिता समान नित मुझको रही जलाय |
हिय पर शोक मोह अरु क्षोभ रहे लिपटाय || 9 (अ) ||

शत्रु चोट तन पर करे स्वजन हृदय पर घात |
धोखा काका ने किया टूट गया मैं तात || (आ) ||

पीड़ा बसी हृदय यह मेरे | रहती मुझे निरन्तर घेरे ||
घटना विकट परम दुखदाई | मेरी प्रज्ञा देव नशाई ||
मुनिवर मैंने सब कुछ खोया | फिरूँ भटकता थककर सोया ||

क्या मुनि यह प्रारब्ध मम पूर्व जन्म का पाप |
फलीभूत अब हो रहा बन बैठा अभिशाप || 10 ||

मूँदे नयन गर्ग ने देखा | अग्रभाग्य का पूरा लेखा ||
जाना अग्रहृदयगत खेदा | शोकशंकु मनु मर्महिं छेदा ||
मनहुं अलातशल्य हिय प्रविशा | रिसता व्रण मर्मान्तक विकसा ||
तब श्रीमाया को सिर नाया | जिससे प्रेरित वह वन आया ||
निष्ठा अग्रहृदय की जानी | बोले गर्ग सुधासम बानी ||
श्री माँ वत्स जिसे अपनाए | उसका निर्मल चित्त बनाए ||  
विपद निकष जीवन की ताता | इससे श्रद्धा परखे माता ||
तप्त स्वर्ण कुन्दन हो जावे | मूल्य तराशा हीरा पावे ||
मेहँदी पिसे बने शृँगारा | भक्त कष्ट से पाय निखारा ||
तजो दैन्य कृतनिश्चय सुत अब | श्रीअर्पण कर हृदयभाव सब ||
पुत्र अग्र श्री का विश्वासा | आशापूरक हने निराशा ||

बहुत देर से चल रहे बीहड़ पथ अविराम |
चलो सिद्धवन आश्रम में कीजे विश्राम || 11 ||

मातृप्रेरणा से मैं आया | श्री महालक्ष्मी स्वयं पठाया ||
यों कहि मुनि निज परिचय दीन्हा | विह्वल अग्र चरण गहि लीन्हा ||
श्रीमाता ने स्वयं पठाया | यह सुनि वचन हृदय उमगाया ||
बहने लगी अश्रुजलधारा | रुद्ध कण्ठ से वचन उचारा ||
मुनिवर अहो आपके वचना | अमृतवत् किन्ही सुखरचना ||
करुणामयी मात जगदम्बा | दीन्हा मुझे परम अवलम्बा ||
मातृप्रेरणा से तुम आये | यही बात आशा उपजाये ||
आगे गुरुवत् कृपा तुम्हारी | नहीं असम्भव परे निहारी ||
श्री के पथ पर मुझे चलाओ | जो माँ चाहे वही कराओ ||
गर्ग शिष्य को तुरत पठाया | लेय अश्व वह आश्रम आया ||

नदी सरस्वति तीर पथ चले गर्ग अरु अग्र |
आगे पहुँचे सिद्धवन शोभा जहाँ समग्र || 12 ||

सर्वदिशा छाई हरियाली | महकें पुष्प लता तरु डाली |
प्रविशा जबहिं सिद्धवन माहीं | रहा विषाद अग्रमन नाहीं ||
बोला अग्र सुनहुँ मुनिराया | आय विपिन में मन सुख पाया ||
अनुभव हुआ प्रभाव विलक्षण | हिये भावपरिवर्तन तत्क्षण ||
अद्भुत शान्ति हृदय में छाई | तड़पत मीन यथा जल पाई ||
ठिठुरत शीत अग्नि ज्यों पाई | सूखत धान वृष्टि ज्यों आई ||

दावानल झुलसा यथा हाथी घुसा तड़ाग |
धूपतप्त मरुपथिक ज्यों छाहँ लही सौभाग || 13 ||

हिय की फाँस कसकती निसरी | मानो स्मृति जागी चिरबिसरी ||
मुनिवर सुखप्रद क्षेत्र प्रभावा | अद्भुत नूतन अनुभव पावा ||
बोले गर्ग वचन सुखकारी | अग्र तीर्थमहिमा अति न्यारी ||
तीर्थों से ही धरती पावन | आत्मशान्तिप्रद जनमनभावन ||
उनमें सिद्धारण्य विलक्षन | धाम महालक्ष्मी का यह वन ||

मिटे सर्वथा भय यहाँ दैन्य क्षोभ अरु मोह |
मन का मिटे विषाद सब त्रिविध तापसन्दोह || 14 ||

कोटियज्ञ फलदायक तीरथ | मातृशरणयात्रा का यह रथ ||
तीर्थ प्रभाव शोक तव नाशा | हुआ हृदय में शान्ति प्रकाशा ||
अग्र विलोका भव्य सरोवर | निर्मल जल से भरा मनोहर ||
सर में रुचिर कमल मुस्कावें | मधुर गान भ्रमरावलि गावें ||
हिंसक और अहिंसक प्रानी | पीवें एक घाट पर पानी ||
सर के तीर वाटिका सोहे | शोभा अमित लखत मन मोहे ||
तरु अशोक गूलर बड़ नीमा | पीपल आम कदलि दाड़ीमा ||
लताकुंज शुक पिक मृदु बोलें | कुरजां मोर कबूतर डोलें ||
तुलसी सींच रहे नर-नारी | लेय सरोवर का शुचि वारी ||

महालक्ष्मीप्रतिमा वहाँ वट के नीचे दिव्य |
चतुर्भुजा जगदम्ब की शोभा अतिशय भव्य || 15 ||

ऋषि-मुनि मण्डल और वन्यजन | पूजनरत सह विपुल बटुकगन ||
नारी वृन्द मधुर लय ताना | करे नाम संकीर्तन गाना ||

ॐ महालक्ष्म्यै नमः यह संकीर्तन गान |
अमृतधारा के सदृश लगा सुखद अति कान || 16 ||

गर्ग कहा यह शक्तिसरोवर | आदिशक्ति का सर्वपापहर ||
पावन सर में जो जन न्हावे | सकल सुतीर्थ स्नान फल पावे ||
स्पर्शमात्र से पाप विनाशे | मातृभक्ति हिय माहिं विलासे ||
सर के तट यह वट अति पावन | इससे शोभित है सिधकानन ||
प्रकटे बालमुकुन्द यहीं पर | वटपल्लवपुट देव अनश्वर ||

दीन्हा बालमुकुन्द को श्री भागवतमन्त्र |
श्रीविद्या जिससे हुई व्यक्त फलप्रद पुत्र || 17 (अ ) 

करें भक्त पूजन यहाँ श्री की महिमा गाय |
अग्र गर्ग बैठे वहाँ श्री माँ को सिर नाय || (आ)

कृपापूर्ण वात्सल्यमय श्री की छवि सुनिहार |
करी गर्ग मुनि वन्दना परैकाग्रता धार || (इ)

स्तोत्र

अयि महालक्ष्मि विपत्तिनिवारिणि दैन्यविदारिणि विश्वनुते,
प्रेमानन्दसुधारसभासिनि भक्तिप्रकाशिनि प्रीतिभरे |
ऋषिमुनिहृदयागारनिवासिनि नीतिविकासिनि तापहरे,
जय जय हे भगवति जगदीश्वरि श्रीः परमेश्वरि शुभफलदे || 1 ||

जय जगदम्ब सुमंगलकारिणि ममताधारिणि बालहिते,
भवभवविभवपराभवकारिणि करुणासारिणि सुखकलिके |
कृपयोत्सारितनिजजनविघ्ने भक्तजनाखिलपापहरे,
जय जय हे भगवति जगदीश्वरि श्रीः परमेश्वरि शुभफलदे || 2 ||

जय वरदायिनि सिद्धिविधायिनि मातर्विश्वजनोद्धरिके,
आर्तहितैषिणि ब्रह्मस्वरूपिणि भुवनविभूषिणि ज्ञानघने |
कमले कमले विमले यमले ललिते पदगतलालित्यन्ते,
जय जय हे भगवति जगदीश्वरि श्रीः परमेश्वरि शुभफलदे || 3 ||

करुणाशालिनि साधकपालिनि मौक्तिकमालिनि प्रीतियुते,
शरणागतरक्षिणि भयभक्षिणि वात्सल्यान्वितलोचनके |
दानवदर्पविनाशनकारिणि वन्दनतत्परदासहिते,
जय जय हे भगवति जगदीश्वरि श्रीः परमेश्वरि शुभफलदे || 4 ||

धनसुखवर्षिणि संकटधर्षिणि दुर्जनमर्षिणि भूतिकृते,
खलदलगञ्जिनि दुर्मदभञ्जिनि ऋषिमुनिरञ्जिनि भक्तनुते |
पद्मदलायतनयने संस्मितवदने भक्तसुबोधकृते,
जय जय हे भगवति जगदीश्वरि श्रीः परमेश्वरि शुभफलदे || 5 ||

दिव्यशरच्छशिकान्तिहरामलहेममयाभरशोभितके,
मणिगणकुण्डलकरिवरमौक्तिकनासिकभूषणरञ्जितके |
शोभारञ्जितसाधकहृदये विविधालंकृतिकान्तिनिधे,
जय जय हे भगवति जगदीश्वरि श्रीः परमेश्वरि शुभफलदे || 6 ||

अमलं कमलं मृदुलं सुदलं सजलं सदये तव पादतले,
अधनं सधनं कुरुषे सततं कुशलं निखिलं तव करकमले |
तव चरणं शरणं हरणं विपदां भवभीतिविनाशकृते,
जय जय हे भगवति जगदीश्वरि श्रीः परमेश्वरि शुभफलदे || 7 ||

त्वत्पदपद्ममहोश्रितमद्य महेशसुरेशनगेशनुतम्,
श्रीः कल्याणि कृपानिधिरम्ब सुवर्धय भक्तिं पावय माम् |
दीनमनन्यगतिं कृपणं शरणागतमाशु विमोचय हे,
जय जय हे भगवति जगदीश्वरि श्रीः परमेश्वरि शुभफलदे || 8 ||

विपदं मर्दय वर्धय भक्तिं शक्तिं सान्द्रीकुरु वरदे,
आनन्दकन्दमनन्तानन्दमहो प्रददात्यरविन्दन्ते |
अभयं सुधियं विजयं निचयं यशसो लभते मा भक्तस्ते,
जय जय हे भगवति जगदीश्वरि श्रीः परमेश्वरि शुभफलदे || 9 ||

एतद् गर्गकृतं स्तोत्रं यः पठेन्नियतः शुचिः |
महालक्ष्मीप्रसादाय तस्य माता प्रसीदति ||10 ||
         
 || इति श्री महालक्ष्मीस्तोत्रम् ||

         ततः चले गर्गाश्रम आया | शोभा निरखि अग्र हरषाया ||
         कुटी-कुटी में श्रुतिपारायण | सस्वर क्वचित् साम का गायन ||
         जो जो ऋचा बटुकगण बोलें | शुकगण वही बोलते डोलें ||
         अग्निहोत्र धूम की रेखा | दीर्घ चढ़ी नभ में वह देखा ||
         कीन्हा अग्र स्नान अरु भोजन | बोले गर्ग वचन शुभ रंजन ||
         वत्स अग्र श्री माँ जग माहीं | परम शरण्य विमति कोउ नाहीं ||
         आराधन उनका कर लीजे | पार कष्टसागर को कीजे ||
         मातृभक्ति सब सुख की मूला | अनायास नाशे भवशूला ||

परम प्रेम ही भक्ति है अमृतरूपा तात |
श्री केवल चाहे वही तृप्त उसी से मात || 18 (अ) ||

जिसका वाचक प्रणव वह महालक्ष्मी जगदम्ब |
श्री श्रेष्ठतादायिनी है श्रेष्ठत्वालम्ब || (आ) ||

माता-सुत सम्बन्ध तुम श्री से लेओ मान |
माँ मेरी मैं मात का यह निश्चय लो ठान || (इ) ||

मात्र स्वत्वसम्बन्ध ही प्रेमभक्ति का मूल |
हुआ नहीं सम्बन्ध वह केवल यह ही भूल || (ई) ||

लाक्षासदृश है मानवमन। प्रकृतिकठोर न द्रवे कथंचन ||
इसे वेदना जब पिघलावे। प्रेमभक्ति का रंग मिल जावे ||

तात तुम्हारी ही तरह सुरथ काल प्राचीन |
निजजनवंचित राज्य से निकला होकर दीन || 19 ||

जाय सुमेधा ऋषि के आश्रम | श्रीविद्योक्त सुना व्रत उत्तम ||
सुरथ महालक्ष्मीव्रत कीन्हा | मनवांछित फल उसने लीन्हा ||
उच्च लक्ष्य हित व्रत आवश्यक | व्रत से होवो मन पर शासक ||
यह जग महालक्ष्मी से चालित | उस पर सृष्टि चक्र आधारित ||
कार्यशक्ति सब उससे पावें | व्रत से आत्मशक्ति बढ़ जावे ||

आए तुम सौभाग्यवश महालक्ष्मी के धाम |
भक्तिभाव से कीजिए श्री का व्रत निष्काम || 20 (अ) ||

अग्र कहा विस्तार से सुनना चाहूँ तात |
निजजनवंचित सुरथ का कहें कथावृत्तान्त || (आ) ||

श्रीविद्योक्त श्रेष्ठ श्रीव्रत बतलाया आप |
क्या श्रीविद्या जो मिटा सके हृदयसन्ताप || (इ) ||

व्रतमाहात्म्य मुझे कह दीजे | मेरे हिय प्रकाश मुनि कीजे ||    
मन में जिज्ञासासंचारा | सुनकर वत्सल वचन तुम्हारा ||
कहने लगे गर्ग साह्लादा | सुनो सुमेधा-नृपसंवादा ||
सरस भक्तिरस से यह ताता | इसमें मातृकृपावृत्तांता ||

चैत्रवंश में नृप हुआ सुरथ नाम गुणवान |
मन्त्री अनुज नरेश का अति शठ दोष निधान || 21 (अ) ||

कोलाध्वंसी वंश का राजा शत्रु सुमन्त्र |
मन्त्री उससे जा मिला किया कुटिल षडयन्त्र || (आ) ||

शत्रु सुरथ पर करी चढाई | नृप सम्मुख जा करी लड़ाई ||
मन्त्री नृप से धोखा कीन्हा | समरसहाय शत्रु को दीन्हा ||
रण में सुरथ पराजय पाई | वन में जाकर जान बचाई ||
मन्त्री अनुज राजपद लीन्हा | राजकोष रिपु को दे दीन्हा ||
सुरथ प्रवंचित कानन माहीं | भटके चैन हिये में नाहीं ||
भटकत गया सुमेधा-आश्रम | सरतट राजित परम मनोरम ||

गही सुमेधा की शरण कही हृदय की बात |
उसी समय इक वैश्य भी आय गया बिलखात || 22 (अ) ||

बोला मेरे पुत्र ने छीनी सब सम्पत्ति |
अपने सुत की कुटिलता से आ पड़ी विपत्ति || (आ) ||

जो सुत था प्राणों से प्यारा | समझा जिसे आँख का तारा ||
कष्ट सहन कर जिसको पाला | उसने चली कुटिल अति चाला ||
शठ ने मेरा सब कुछ छीना | वंचित विवश मुझे कर दीना ||
बोला सुरथ सुनें ऋषिराई | स्वजन दोउँ पर विपदा ढाई ||

स्वजनवंचनाग्रस्त हूँ राज्य गया ऋषिराय |
मोहग्रस्त बिलखूँ हिये मृतवत्सा ज्यों गाय || 23 ||

जो छूटा उसकी स्मृति कैसे | जला रही है हिय को ऐसे ||
इसका देव रहस्य बताओ | दुःखमुक्ति की राह दिखाओ ||

कहा सुमेधा माया श्रीमाता की भूप |
परम प्रभावी जगत में महिमा अकथ अनूप || 24 ||

राजन माया ही दुःखमूला | उससे हृदय उभय के शूला ||
सुनि मुनिवचन सुरथमन डोला | साश्रु विनीत वचन वह बोला ||
क्या माया ऋषि कथं निवारण | क्यों वह होय दुःख का कारण ||

कहा सुमेधा हे सुरथ उत्तम प्रश्न तुम्हार |
सुनो उभय जिससे हुवे दुखों से उद्धार || 25 ||

भूप अहंता ममता माया | इसने ही सब जग भरमाया ||
निजपरभेद यही उपजाया | वही दुःखकारण श्रुति गाया ||

केवल श्री की भक्ति से माया होय निवृत्त |
श्रीविद्यासिद्धान्त यह श्रीवात्सल्य निमित्त || 26 ||

कहने लगा सुरथ सिर नाई | श्रीस्वरूप बरनें ऋषिराई ||
बोले ऋषि जगदम्बा माता | महालक्ष्मी ही श्री विख्याता ||
आद्या परा शक्ति जो कथिता | महालक्ष्मी श्री माँ वह प्रथिता ||
सर्वज्ञा भवबन्धनछेदिनि | विद्यमान सर्वत्र सुवेदिनि ||
रची सृष्टि वह सदसद्रूपा | पालनसंहृतिकारि अनूपा ||
स्वयं निमित्तोपादाना श्रीः | रचे सृष्टि वात्सल्याश्रय ही ||
जड़ चेतन श्री माँ उपजाए | लूतावत् श्रुतिशास्त्र बताए ||
बहु तरंग शोभित ज्यों सागर | त्यों श्री विविध रूप जगदाकर ||
ज्यों तारंग तरंग अभेदा | त्यों श्री अरु जग में ना भेदा ||
कहा सुरथ ऋषिवर्य महात्मा | देवी ब्रह्म तथा परमात्मा ||

भिन्न-भिन्न या एक हैं देव कहें समझाय |
बहुश्रुतिविप्रतिपन्न मम मति जिससे ठहराय || 27 ||

बोले मुनिवर सुनिए भूपा | महालक्ष्मी पर तत्त्व अनूपा ||
एक अद्वैत तत्त्व श्रुति गावे | भिन्न नाम बहु पन्थ बतावे ||
देवी आत्मा ब्रह्म बखानें | अर्हत नाम कोइ तेहिं मानें ||

नेह नाना किञ्चन बात कही यह वेद |
अद्वितीय वह तत्त्व ही महालक्ष्मी यह भेद || 28 (अ) ||

एकमात्र चैतन्य जो आत्मा देवी ब्रह्म |
महालक्ष्मी सुत है वही वर्णित निगमागम्म || (आ) ||

स्त्री पुं भेद वृथा अध्यात्मनि | जगतप्रपंच लीन सुत आत्मनि ||
श्री बहु नामरूप आराध्या | केवल प्रेमभक्ति से साध्या ||

महालक्ष्मी की भक्ति बिन मिटे न मायाजाल |
मायामोहित जीव का छुटे न दुखजंजाल || 29 ||

मातृभक्ति ही फल जीवन का | अनुभव अरु अभीष्ट मम मन का ||
दुःखनाश का यही उपाया | कहा तुम्हें मेरे मन भाया ||
वन्ध्यासुत बरु जगहिं जरावे | मृगमरीचिका प्यास बुझावे ||
शश के सींग सिंह मर जावे | स्वप्नलोक अस्तित्वहिं पावे ||
अनलशिखा शीतलता धारे | हिमकण काष्ठखण्ड को जारे ||

शुक्तिरजत भूषण बने रज्जुसर्प डस लेय |
चित्रदीप से तम मिटे अर्क आम्रफल देय || 30 ||

गगननीलिमा सच हो जावे | नेत्रपुतलि में मेरु समावे ||
मशक समुद्रवारि पी जावे | अग्निज्वाल अधोगति पावे ||

सर्व असम्भव सम्भव हों बरने जग जोइ |
पर श्री माँ की भक्ति बिन जीवन सफल न होइ || 31 (अ) ||

श्री माता की भक्ति बिन जो चाहे दुखनाश |
बुद्धिमान भी वह मनुज होय विषण्ण निराश || (आ) ||

महालक्ष्मि सब जग की माता | उसके पुत्र सुता सब ताता ||
माँ सन्तति का सुख ही चावे | मुक्तकृपा उस पर बरसावे ||

सब प्राणिन को शक्ति मति दीन्ही है जगदम्ब |
सदुपयोग नर कर सके मात्र मातृ-अवलम्ब || 32 ||

मातृकृपाप्राप्त्यर्थ उभय हैं | प्रज्ञाशील सदा तन्मय हैं ||
मति से अज्ञ भोग्य ही संचे | शक्ति भोगहित खरचे वंचे ||
अन्तकाल वह नर पछतावे | आत्मविघाती अधम गति पावे ||

अस्थि-चर्म-मल-मूत्रमय अशुचि देह यह तात |
शुचि है केवल भक्ति से बसे हृदय जो मात || 33 (अ) ||

श्रीविद्योक्ता साधना का है भक्ति आधार |
एक वही अपनाइए जो है जीवनसार || (आ) ||

दृश्यमान जग के प्रति रागा | बन्धनकारक करिए त्यागा ||
जग का राग अकेला नाहीं | द्वेष द्वन्द्वगत उसके माहीं ||
वित्त वैश्य का सुत हथियाया | सुतप्रति राग द्वेषता पाया ||
स्वार्थी अनुज राज्य तव लीन्हा | भ्रातृराग तुम भी तज दीन्हा ||
जगसम्बन्ध है कच्चा धागा | टूटा स्वार्थजोर जब लागा ||

मात पिता स्त्री पुत्र अरु तन धन घर परिवार |
इनसे जोड़े राग का कर लीजे परिहार || 34 ||

नृप सब द्वन्द्वाकर्षण छोड़ो | राग जागतिक श्री से जोड़ो ||
हो सम्बन्ध मात्र माँ श्री से | तत्सम्बन्धेन जगती से ||
श्रीसम्बन्ध अटूट सनातन | यह श्रीविद्यामर्म पुरातन ||

पुरा स्वयं श्रीमात से विष्णु बालमुकुन्द |
पाई श्रीविद्या जहाँ सहज सुलभ आनन्द || 35 ||

सुन वह सुन्दर कथा पुरातन | यत्र सनातन श्रीविद्यायन ||
सहज सच्चिदानन्दप्रकाशक | श्रीभक्तिमहिमाप्रतिपादक ||

मधुकैटभ को मारकर पुरा विष्णु भगवान |
लागे जपने निज हृदय मन्त्र विभोर सुजान || 36 ||

देखि दृश्य पूछा चतुरानन | विष्णु देव मैं चाहूँ जानन ||
तुम हिय दिव्य मन्त्र जप कीन्हा | कौन मन्त्र यह किससे लीन्हा ||
कहा विष्णु यह परम रहस्यम् | किन्तु आपसे कहूँ अवश्यम् ||
पुरा कदाचित् शिशु के रूपा | मैं कीन्ही अनुभूति अनूपा ||

बालरूप वटपत्रपुटस्थित मैं था हे ब्रह्म |
समझ सका कुछ भी नहीं हुआ विलक्षण भ्रम्म || 37 ||  

सोचा कौन प्रकट मोहे कीन्हा | बालरूप यह अद्भुत दीन्हा ||
लखा ध्यान से आत्मस्वरूपा | प्रकटा हिय एक मन्त्र अनूपा ||
सर्वं खल्विदमहं सनातन | नान्यत् किञ्चित् अस्ति चिरन्तन ||
मन्त्रदायिनी दीखी नाहीं | हुआ सोच मेरे मन माहीं ||
सुमिरी श्रीमाता जगदम्बा | आद्या शक्ति परा आलम्बा ||
महालक्ष्मी प्रकटी साकारा | रूप चतुर्भुज तेज अपारा ||

बोली बालमुकुन्द मैं किया प्रकट लो जान |
तुम्हें करन जग पालन जग मेरी सन्तान || 38 ||

मैं भागवत मन्त्र हिय माहीं | किया प्रकाशित भरमो नाहीं ||
जपो मन्त्र करि अर्थ विचारा | तुम्हें मिलेगा लक्ष्य तुम्हारा ||
ब्रह्मा तब से जपूँ निरन्तर | वह श्रीमन्त्र भागवत तत्पर ||
मन्त्र-अर्थ में तत्त्व समाया | श्रीविद्या का मम मन भाया ||

सुरथ भागवतमंत्र का श्रीविद्या है भाष्य |
श्रीस्वरूपमाहात्म्य का इसमें तत्त्व प्रकाश्य || 39 ||

गुह्यतमा श्रीविद्या राजन | वेदसार अघओघनिकन्दन ||
दिव्य अमोघसिद्धिरत्नाकर | शीघ्रफलप्रद आनन्दसागर ||
देवीतत्त्वबोधिनी विद्या | श्रीप्राप्तिसाधिनि अनवद्या ||

श्रीविद्या की साधना के हैं पन्थ अपार |
प्रेम नामजप श्रीव्रत सर्वसुगम आधार || 40 (अ) ||

श्रीविद्या का लक्ष्य यह होवे आत्मसुधार |
स्वात्मा का विश्वात्म से होवे साक्षात्कार || (आ) ||

सुरथ समाधि दोऊँ तुम जाना श्रेष्ठ उपाय |
श्रीविद्योक्त श्रीव्रत कीजे दुःख नशाय || (इ) ||

महालक्ष्मीव्रत दोऊँ कीन्हा | कृपाप्रसाद मात का लीन्हा ||
अग्र श्रीविद्यासिद्धान्ता | श्रीप्रोक्त जाना तुम ताता ||
श्रीविद्या में श्रीव्रतमहिमा | श्रेष्ठ तुष्ट इससे हो श्री माँ ||
महालक्ष्मीव्रत अग्र अमोघा | नाशे सपदि सकल अघ-ओघा ||
श्रीवात्सल्य प्राप्त अति होवे | मिलें सर्वसुख सब दुख खोवे ||
सिया हरण व्याकुल रघुनन्दन | कीन्हा व्रत से शक्त्याराधन ||

शक्तिकृपा से सफलता पाई रण में राम |
सिया लखन सह अवध में लौटे व्रत सुखधाम || 41 ||

जब प्रसेन को कानन माहीं | कृष्ण ढूँढ़कर लौटे नाहीं ||
होया दुखी सकल परिवारा | मन आशंका व्यथा अपारा ||

मातृकथा सुनि व्रत किया तब वसुदेव सुजान |
सकुशल लौटे कृष्ण घर वर्णित कथा पुरान || 42 ||

सावित्री ने व्रत अपनाया | पुनः दिवंगत पति को पाया ||
हरिश्चन्द्र व्रत धारण कीन्हा | खोया राज्य पुनः पा लीन्हा ||
तुम आदर्श अग्र जगती में | अगुवा जनरक्षण नीती में ||
श्रद्धा से कर व्रत माता का | होय अचिन्त्य लाभ जनता का ||
महालक्ष्मी जग की अवलम्बा | श्रद्धा से ध्याओ जगदम्बा ||

महालक्ष्मीव्रत कीजिए एक मास तक पुत्र |
जो अति प्रिय श्रीमात को सर्वसुखद सर्वत्र || 43 ||

षोडश उपचारैः श्रीपूजन | श्रीयन्त्रार्चन नाम सुकीर्तन ||
नित्य पाठ अष्टोत्तरनामा | श्री के ध्यान चित्तविश्रामा ||
इससे शीघ्र तुष्ट माँ होवे | परमानन्द मिले दुख खोवे ||
पाय सको सब जो जग माहीं | यद्यपि स्वार्थकामना नाहीं ||
अग्र कहा दीक्षा दे दीजे | शिष्य रूप में अपना लीजे ||

हे मुनिवर अध्यात्म में गुरुमाहात्म्य अपार |
गुरु मति आलोकित करे मेटे पथ अँधियार || 44 (अ) ||

लीन्ही गर्ग मुनीश से अग्रसेन युवराज |
जनहित का संकल्प कर दीक्षा व्रत के काज || (आ) ||

श्रीयन्त्र अभिमन्त्रित दिया अग्र को गर्ग |
कहा वत्स श्रीयन्त्र है घनीभूत श्रीभर्ग || (इ) ||

एकाहं बहु स्यामिति श्री कीन्हा संकल्प |
सृष्टि रूप परिणत हुई तन्माहात्म्य अनल्प || (ई) ||

श्रीयन्त्र इस सृष्टि का है रेखात्मक चित्र |
बिन्दुरूप श्री अम्बिका राजमान है तत्र || (उ) ||

अष्टोत्तर शतनाम अब कहूँ सुनो मन लाय |
नाशे सारे क्लेश यह परम अमोघ उपाय || (ऊ) ||

|| अथ श्रीमहालक्ष्मी-अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ||


ॐ श्रीः शक्तिर्महालक्ष्मीस्त्रिपुरा ऋतमीश्वरी |      
महासरस्वती देवी महाकाली महेश्वरी || 1 ||
महाशक्तिर्महाविद्या महात्रिपुरसुन्दरी |
महासत्त्वा महाभागा महामाया जगत्प्रिया || 2 ||
ललिता कमला दुर्गा सिद्धारण्यनिवासिनी |
विश्वमाता गुणातीता सगुणा निर्गुणा परा || 3 ||
जयन्ती मंगला पद्मा ऋषिदेवनमस्कृता |
प्रपन्नवल्लभा माता करवीरसुवासिनी || 4 ||
भगवती कलाधारा ऋद्धिसिद्धिप्रदायिनी |
भर्गात्मिका च कौमारी निराकारा निरञ्जना || 5 ||
मधुकैटभसंहर्त्री महिषासुरमर्दिनी |
मोक्षप्रदायिनी कन्या प्रणतार्तिविनाशिनी || 6 ||
राजराजेश्वरी धात्री त्रिपदा परमेश्वरी |
ब्रह्माण्डबहिरन्तःस्था प्रपन्नार्तिविनाशिनी || 7 ||
शाकम्भरी सहस्राक्षी जम्ब्वालया चतुर्भुजा |
गायत्री वैष्णवी प्रत्यक् वैभवदा सुरेश्वरी || 8 ||
कैला दधिमथी प्रेमा श्रीविद्या दिव्यविग्रहा |
तुरीया ब्रह्म सर्वात्मा कारुण्यामृतवर्षिणी || 9 ||
श्रीचक्रनिलया यज्ञरूपिणी मनसा विभा |
चितिस्तत्पदलक्ष्यार्था चिदेकरसरूपिणी || 10 ||
श्रीशैलवासिनी दिव्यरूपा शुद्धा पराम्बिका |
वरदा त्र्यक्षरी ज्वाला सामगानप्रिया रमा || 11 ||
अनेककोटिब्रह्माण्डजननी ज्ञानविग्रहा |
लीलाविनोदिनी भक्तिप्राप्या भक्तसुवत्सला || 12 ||
स्वात्मारामा जगन्माता सर्वमंगलकारिणी |
सर्वान्तर्यामिणी संवित् चक्रराजनिकेतना || 13 ||
प्रत्यभिज्ञा परालम्बा शुभदा कमलासना |
श्रीपीठवासिनी ज्योतिःस्वरूपा भुवनेश्वरी || 14 ||
श्रीयंत्रवासिनी बिन्दुरूपिणी निजधामदा |
नामानि वै महालक्ष्म्याः मया प्रोक्तानि शौनक || 15 ||
अष्टोत्तरशतं नाम्नां यः पठेत् प्रयतः पुमान् |
महालक्ष्मीकृपां प्राप्य सर्वदा स प्रसीदति || 16 ||

|| इति श्रीमहालक्ष्मी-अष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् || 

अष्टोत्तरशतनामजप का माहात्म्य अपार |
सर्वदुःखविनाशक सर्वानन्दागार || 45 ||

रूप नाम द्वय श्रियः उपाधिः | दोनों मेटें आधिव्याधि ||
नामजापलय तत्त्व प्रकाशे | अग्निपतिततृण इव अघ नाशे ||

होवे केवल नाम से रूपसाक्षात्कार |
बिना नाम प्रत्यक्षीकरणं भी निस्सार || 46 (अ) ||

बाह्याभ्यन्तर नामजप से लाभान्वित होय |
अगुण सगुण श्रीरूप का बोधक जग में सोय || (आ) ||

महिमावर्णन नाम का श्री के भी वश नाहिं |
भाव और लय से जपें होय मोद मन माहिं || (इ) ||

सुत श्रीमन्त्र शुभद अति पावन | साधक होय इष्टफल भाजन ||
महालक्ष्मीमन्त्र सब काला | परमाधार हरे भवजाला ||

शक्तिपरिणमन मन्त्र है पराशक्ति का रूप |
वर्णसमष्टिमात्र ना महिमा अकथ अनूप || 47 (अ) ||

चिच्छक्तिबलस्पर्श से मन्त्रवर्ण में शक्ति |
संचारित होवे सुत उससे उपजे भक्ति || (आ) ||

यदि हो साधक के हृदय शुद्ध प्रेम अविकार |
तब ही उसकी साधना श्री करती स्वीकार || (इ) ||

अक्षम और अबोध शिशु सदृश आश्रित भक्त |
सारल्यानुप्राणित रहे सहज अनुरक्त || (ई) ||

माँ हिय की व्याकुलता निरखे | नहीं योग्यता सुत की परखे ||
श्री में रखो अनन्या ममता | सन्तत सहजप्रेमरससिक्ता ||

जब होवे सच्ची लगन तड़प होय मन माहिं |
श्रीमाता करुणा करे इसमें संशय नाहिं || 48 (अ) ||

पथदर्शन विस्तृत किया गर्ग भावना चीन्ह |
विधिविधान से अग्र श्रीव्रत का आरम्भ कीन्ह || (आ) ||

शौनक तजा प्रतापपुर जब वल्लभपरिवार |
दुर्दिन आये राज्य के जनता दुखी अपार || (इ) ||

कुटिल कुन्द शासक हुआ मालव का सामन्त |
भेजी चमू प्रतापपुर मालवभूप तुरन्त || (ई) ||

मालव सेनापति शशी किया नियन्त्रण जाय |
कठपुतलीशासक रहा हिय में कुन्द लजाय || (उ) ||

विधि विपरीत कुन्द जब चीन्हा | वांछित कर मालव को दीन्हा ||
हुआ प्रजा में रोष भयंकर | दिया शशी ने दबा दमन कर ||

शशी गुप्तचर निपुण भट भेजे त्वरित अनेक |
अग्र आदि को खोजने द्रोही तजा विवेक || 49 ||

करे कुन्द को नित अपमानित | बोला कुन्द विभा से लज्जित ||
धोखा मालवनृप ने कीन्हा | दाससमान मुझे कर लीन्हा ||
क्रूर नियति ने सब कुछ छीना | कैसा नृप मैं सैन्यविहीना ||

व्यथित विभा बोली वृथाचिन्तन निष्परिणाम |
करणी का फल मिल रहा किए नहीं सत्काम || 50 (अ) ||

शौनक ने विनती करी उत्सुकता अति तात |
सौम्य शौर्य अरु भगवती का कहिए वृत्तान्त || (आ) ||

सौती बोले बाढ से रक्षा करी सुजान |
उनकी श्री महालक्ष्मि ने माता कृपानिधान || (इ) ||

बच सरिता की बाढ से सौम्य भगवती शौर्य |
वेष बदल वन में छुपे समझ कुन्द का क्रौर्य || (ई) ||

गया अकेला सौम्य पुर भिक्षा लेने व्यग्र |
चर्चा कानों में पड़ी नहीं मिल रहा अग्र || (उ) ||

खोज रहे हैं उसे गुप्तचर | लौटा सौम्य बात यह सुनकर ||
आ रानी को बात बताई | रानी की आँखें भर आईं ||
हुई कृतज्ञ वह श्रीमाँ के प्रति | श्री को ही अर्पित मन अरु मति ||

बोली श्री ने अग्र की रक्षा करी सुजान |
माता परमा वत्सला का वात्सल्य महान || 51 (अ) ||

सुमिरे माँ को भगवती श्रद्धा हृदय अपार |
शरणागति की ढाल से सहे कष्टतलवार || (आ) ||

कण्टकमय पथ क्षुधा पिपासा | सहे विपद शुभ दिन की आशा ||
आशा ही जीवन आधारा | व्यथित हृदय को देय सहारा ||
सौम्य माँगकर भिक्षा लावे | जो भी मिले उसे सब खावें ||
भ्रमत कालिसिल सरिता आए | वहाँ किया विश्राम नहाए ||
पावन निर्मल सरितासलिलम् | भक्तहृदय ज्यों भक्त्या सफलम् ||
निकट त्रिकूटशैल मनभावन | कैलाधाम वहाँ अति पावन ||

कैला माँ के दरस कर होए भावविभोर |
शौर्य भगवती सौम्य के आर्द्र नयन के कोर || 52 (अ) ||

ॐ महालक्ष्म्यै नमः कीर्तन के रस माहिं |
डूबी रानी भगवती तन की भी सुधि नाहिं || (आ) ||

बहने लगी भाव की धारा | करने लगे भक्त जयकारा ||
कीर्तनविरत भगवती रानी | पूजक से बोली मृदु बानी ||
हे द्विज कृपावृष्टि बरसाओ | कैला माँ की कथा सुनाओ ||
हर्षित कहने लगा पुजारी | महालक्ष्मी कैला महतारी ||
जनहिताय महिषासुरमर्दिनि | प्रकटी होय कृष्ण की भगिनी ||

यादव कुल ने इसलिए कुलदेवी के रूप |
माना कैला मात को महिमा अमित अनूप || 53 (अ) ||

पौराणिक सुनिए कथा श्री माँ की यह दिव्य |
जिसके दिव्य प्रभाव से प्राप्त होय प्राप्तव्य || (आ) ||

नरकासुरपीड़ित सुर मिलकर किया विचार |
श्रीमाता के धाम में जाकर करें पुकार || (इ) ||

शिव बोले सर्वत्र श्रीमाता व्याप्त समान |
होय प्रेम से प्रकट माँ का वात्सल्य महान || (ई) ||

सुनि शिववचन सकल अनुरागे | करुण प्रार्थना करने लागे ||
जय जय हे महालक्ष्मी मैया | डूबी जाय धर्म की नैया ||
नरकासुर पापी अभिमानी | धर्मविनाशन की हिय ठानी |
भक्त दुखी हैं उससे सारे | करुणाक्रन्दन करें बेचारे ||
माँ नरकासुर को संहारो | भक्तजनों को आय उबारो ||
प्रकट होय बोली श्रीमैया | तारूँ सत्य धर्म की नैया ||

जब अधर्म जग में प्रबल धर्म क्षीण जब होय |
भक्त उबारन अवतरूँ समझो सुर सब कोय || 54 ||

मुझे भक्त हैं अतिशय प्यारे | केवल भक्ति हेतु तन धारें ||
राखें सत्य धर्म में निष्ठा | उनको मेरी भक्ति अभीष्टा ||
भक्तत्राण अवतारोद्देश्यम् | भक्त अनन्य मम सर्वस्वम् ||
भक्तहेतु अब भू पर आऊँ | नरकासुर को मार गिराऊँ ||
होय योगमाया अवतारा | कैला नाम विदित संसारा ||
सब सुरगण प्रकटो भूमण्डल | निश्चित होवेगा शुभमंगल ||
महालक्ष्मी हरने महिभारा | नन्दगेह लीन्हा अवतारा ||

कृष्णरूप हरि अवतरे पहुँचाए नंदगेह |
कंसत्रस्त वसुदेव पितु बरसत रिमझिम मेह || 55 ||

नन्दराय को वृत्त बताया | देय कृष्ण कन्या को लाया ||
अद्भुत कन्या दिव्य स्वरूपा | कान्ति विलक्षण तेज अनूपा ||

अष्टम शिशु का जन्म सुनि कंस उठाई आय |
लगा धरा पर पटकने छूटि गई नभ मायँ || 56 (अ) ||

दे चेतावनी कंस को कन्यारूपा मात |
अन्तर्हित प्रकटी यहाँ कैलाख्या विख्यात || (आ) ||

नरकासुर को मार गिराया | सुर नर मुनि प्रमुदित यश गाया ||
उत्सव भक्तवृन्द मनाया | माता का मन्दिर बनवाया ||
कैला नाम ख्यात जग मैया | पार करे भक्तों की नैया ||

सुनी कथा श्री की हुआ प्रमुदित भक्तसमाज |
कीन्ही सब जयकार जय कैला दीननवाज || 57 (अ) ||

शौर्य सेन कहने लगा माँ शंका मन माहिं |
श्रीमाँ से की प्रार्थना पर माँगा कुछ नाहिं || (आ) ||

माँगो वर श्री दैन्य मिटावे | अग्रसेन को लाय मिलावे ||
सुनकर वचन भाव भर आया | शौर्यसेन को हृदय लगाया ||
नयन अश्रुजल बहने लागा | धैर्य परन्तु पूर्ववत जागा ||

कहा भगवती ने महालक्ष्मी अपनी मात |
माँ से भी क्या माँगना चिंता उसको तात || 58 (अ) ||

प्रेममयी जगदम्ब का प्रेमास्पद है भक्त |
सतत प्रेमसम्बन्ध से सन्तति पर अनुरक्त || (आ) ||

श्री माँ की चेष्टा सकल लीला संततिहेत |
चाहे स्वोन्मुख भक्त को योगक्षेम सब देत || (इ) ||

करना चाहे माँ जो लीला | कर स्वीकार शौर्य मतिशीला ||
नरविवेक अत्यल्प सुजाना | माता हित सोचे विधि नाना ||

एक निष्ठ प्यासा व्यथित चातक सहता कष्ट |
रहे अनन्य पयोद प्रति वैसा रखो अभीष्ट || 59 (अ) ||

प्यासे चातक पर जलद करदे ओलावृष्टि |
तो भी चातक ना तजे उस पर अविरल दृष्टि || (आ) ||

चातक तो घन से जल माँगे | पर निष्काम भक्त अनुरागे ||
नहीं मात से लेना चावे | माँ को मन देकर सुख पावे ||

चातक पीवे स्वातिजल तृषा बुझावन हेतु |
भक्त जगावे प्यास को जो भवसागरसेतु || 60 (अ) ||

मातृश्रद्धा मातृगति मातृचरण से प्रेम |
मूल सकल पुरुषार्थ का राखो निस्पृह नेम || (आ) ||

नैराश्यज है कथन तुम्हारा | सुनो पुत्र यह वचन हमारा ||
ज्यों सुत घाम कुसुम को नाशे | त्यों विषाद मानस को त्रासे ||
हम प्रारब्धजन्य फल पावें | क्यों माता का हृदय दुखावें ||  
राजी रहो रजा में माँ की | आवे हिय न बात विपदा की ||
बुद्धि हमारि स्वल्प अति ताता | सुहित यथार्थ समझ नहीं आता ||
माँ की मति है अगम अपारा | जाने सच्चा सुहित हमारा ||

कुछ मत माँगो प्रार्थना करते रहना शौर्य |
मन में रख सच्ची लगन मति में राखो धैर्य || 61 (अ) ||

करि प्रस्थान निरन्तर मत्स्यराज्य सीमान्त |
पहुँचे देखा खण्डहर रुके वहीं पर श्रान्त || (आ) ||

भिक्षा मिली कहीं पर नाहीं | लौटे सौम्य व्यथित मन माहीं ||
तीनों वहीं बुभुक्षित सोये | सौम्य विचारजाल में खोये ||

लगे सोचने व्यथित मन कैसी विपद गंभीर |
नियति परीक्षा ले रही रचि मर्मान्तक पीर || 62 ||

रेशमवस्त्र सदा जो धारे | वल्कल उनके बदन विदारे ||
मखमल सेज सदा जो सोये | कंकड़ कंटक पीड़ित होये ||
जो वपु चंदनशोभित सुरभित | वे अब मारग रजकण धुसरित ||
किए भ्रमण जो रथ आरूढ़ा | वे अब भटकें वन ज्यों मूढा ||

जो मंगल स्तुति गायनों से जगती थी रानि |
वही श्रृगालीचीख से जाग उठे दुख मानि || 63 ||

वयस किशोर शौर्य सुकुमारा | भटके वन-वन मारा मारा ||
षटरसभोजी वन्यफलाशी | वन में तन की मृदुता नाशी ||
हे विधि तेरी अद्भुत माया | निज लीला से जगत नचाया ||
तीनों चलि गलताश्रम आए | गालव ऋषि को शीश नवाए ||
ऋषिवर देखा शौर्य किशोरा | कान्तिहीन चन्दा ज्यों भोरा ||
देह परम कृश पीत कपोला | दुःख सविग्रह चित्त सुलोला ||
घर्मशुष्क पंखुड़ी कमल की | बुझी हुई चिंगारि अनल की ||

वृन्तछिन्न किसलयसदृश आनन आभाहीन |
दृष्टि निराशा झलकती राजकुंवर अति दीन || 64 ||

दिखी सदेहभक्तिसम रानी | विह्वल करुणावश ऋषि ज्ञानी ||
श्रीमाया को शीश नवाया | ऋषि सबको भोजन करवाया ||
करि विश्राम शौर्य पुनि आया | ऋषिचरणों में शीश नवाया ||

वह बोला ऋषिवर करें भक्तितत्त्व-उपदेश |
मेरे लायक भक्ति के लक्षण कहें अशेष || 65 (अ)||

शौर्यसेन का प्रश्न सुनि गालव भावविभोर ||
बोले श्रद्धा अद्भुत तव जिज्ञासु किशोर || (आ) ||

यद्यपि वर्णित शास्त्र में भक्तिमार्ग वैविध्य |
वानरसुत मार्जारसुत तदौपम्य द्वैविध्य || (इ) ||

स्वयं सतर्क वानरनुज पकड़े माँ का गात |
अगर पकड़ ढीली पड़े छूटे अरु गिर जात || (ई) ||

त्यों सुत विध्याश्रयी भक्तजन | करता सविधि सकाम उपासन ||
विधि में चूक अगर हो जावे | तो ना लक्ष्यसिद्धि वह पावे ||

मार्जारीसुत पूर्णतः माता के आधीन |
स्वयं उठावे ले चले बच्चा मगन अदीन || 66 (अ) ||

त्यों सुत भक्त प्रपन्न को श्री माँ का अवलम्ब |
वह निस्पृह प्रेमाश्रयी देखे सब में अम्ब || (आ) ||

वत्स प्रपत्तिपन्थ अपनाओ | निस्पृहहृदय मातृगुण गाओ ||
प्रेमाबीज उगे हिय माहीं | किन्तु अन्य कोई जाने नाहीं ||
भीतर भीतर पुष्पित होवे | तृप्त सुरभि से श्री माँ होवे ||

प्रकट होय मुख से नहीं पुत्र प्रेम की बात |
जाने अन्तर्यामिनी ऐसा होय उदात्त || 67 ||

मूकप्राप्तरसास्वादन सम | आन्तरमधुरवेदनारूपम ||
सुलगे प्रेम अनल हिय माहीं | धुआँ परन्तु प्रकट हो नाहीं ||

श्रीलीलागुणश्रवण से चित्त द्रवत्वापन्न |
श्री के प्रति उन्मुख रहे तैलधारवदछिन्न || 68 (अ) ||

प्रेमपक्ष में पूर्णता नहीं कदाचित आय |
ज्यों ज्यों स्थिति विपरीत हो अधिक अधिक अधिकाय || (आ) ||

अद्भुतभाव शौर्यहिय जागा | अँसुवन चरण पखारन लागा ||
सब चलकर जम्ब्वालय आए | जम्ब्वालया चरण सिर नाए ||
वृद्ध पुजारी कथा सुनाई | पौराणिक श्रीमहिमा गाई ||
बोला जम्बूद्वीपरक्षिणी | श्री प्रकटी जम्बूगिरि धरणी ||
कथा दिव्य वह करूँ बखाना | ब्राह्मण एक कठिन प्रण ठाना ||
दर्शन करूँ नित्य श्री माँ के | कीन्हा तप जम्ब्वालय आके ||
सतत प्रतीक्षारत उत्कण्ठित | नामकीर्तन करे समर्पित ||
भक्तो विधिसाध्या श्री नाहीं | सतत प्रतीक्षा हो मन माहीं ||
होई सफल प्रतीक्षा भारी | हुई प्रकट श्री माँ सुखकारी ||
ग्वालिनरूप चरावत गैया | आई महालक्ष्मी मैया ||
बोली तपसी नीर पिलाओ | मैं प्यासी हूँ प्यास मिटाओ ||

शीतल नीर पिलायकर चरण पकड़कर विप्र |
कहा परीक्षा लेय मत करुणा कर माँ क्षिप्र || 69 ||

श्री निजरूप चतुर्भुज धारा | हुआ विप्र हिय हर्ष अपारा ||
हुआ ज्वारयुत हिय अनुरागा | करने साश्रु वन्दना लागा ||

स्तोत्र 

कृपाकटाक्षनिर्झरीं स्वभक्तकल्पवल्लरीं |
अनूपरूपचिन्मयीं नमामि मातरं श्रियम् || 1 ||
सुरारिवृन्दत्रासिनीं भवाब्धिदुःखनाशिनीम् |
स्वभक्तचित्तवासिनीं नमामि मातरं श्रियम् || 2 ||
धनप्रदां सुखप्रदां शुभप्रदां वरप्रदां |
मतिप्रदां गतिप्रदां नमामि मातरं श्रियम् || 3 ||
अनन्यभक्तवल्लभां प्रफ़ुल्लपद्मलोचनाम् |
कृपार्णवां पराम्बिकां नमामि मातरं श्रियम् || 4 ||
सुखावहं हि देहिनां सदा तवास्ति वन्दनम् |
शुभां विवेकदायिनीं नमामि मातरं श्रियम् || 5 ||
त्वदीयपादपङ्कजं श्रितं मया परात्परम् |
विहाय मोहजालकम् नमामि मातरं श्रियम् || 6 ||
न मत्समास्ति दीनता दयालुता न त्वत्समा |
अतो हृदा सुवत्सलां नमामि मातरं श्रियम् || 7 ||
सुरासुरैः सुपूजितां मुनीश्वरैः समर्चिताम् |
मदीय मानसस्थितां नमामि मातरं श्रियम् || 8 ||
श्रियः स्तोत्रमिदं प्रोक्तं द्विजेन श्रीसुतुष्टये |
ये पठन्ति नरा भक्त्या लभन्ते ते कृपां श्रियः ||


|| इति श्रीमहालक्ष्मीस्तोत्रम् ||

श्री के हिय वात्सल्य अपारा | बोली द्विज से करुणागारा ||
हे सुत निसंकोच वर माँगो | कहो कामना चिन्ता त्यागो ||
राज्य सम्पदा सुख सम्माना | विद्या मोक्ष मांग वरदाना ||
निर्विकार शिशुसदृश जो जन | प्रेमपूर्ण अतिशय निर्मलमन ||
बसे भक्त वह मम मन ऐसे | कमल पुष्प में सौरभ जैसे ||
उसको सुत अदेय कछु नाहीं | यह मम प्रण समझो मन माहीं ||
बोला द्विज हो भावविभोरा | हे माँ मम आदर्श चकोरा ||
वह निष्काम चन्द्र को निरखे | नहीं चन्द्रमहिमा को परखे ||

हे जगदम्बा रूप वह गाय चरावत दिव्य |
गिरि पर मेरे सम्मुख रहे नित्य अति भव्य || 70 ||

हे महालक्ष्मी मात पराम्बा | श्री जमुवाय भक्त-आलम्बा ||
दर्शन करत प्राण निज त्यागूँ | दीजे वर कुछ और न माँगूँ ||
श्री माँ द्विज को वर दे दीन्हा | लीलाविग्रह धारण कीन्हा ||
वह चकोरसम दर्शनतत्पर | रहा समर्पित भक्त निरन्तर ||

मातृस्वरूप निहारता भक्त अनन्य सुजान |
परम धाम तजि देह निज किया विरक्त प्रयान || 71 (अ) ||

तब से मात विराजिता वत्सल विग्रह धार |
ख्यात नाम जमुवायगिरि महिमा लोक अपार || (आ) ||

पूजनकर कीन्हा प्रस्थाना | सुमिरत मातृचरित वे नाना ||
मनसामातृधाम तब आये | श्रीमाता को शीश नवाये ||
बोला श्रद्धा जानि पुजारी | माँ की महिमा है दुखहारी ||
कर्तुमकर्तुमन्यथा कर्तुम् | माँ समर्थ अघओघ निहन्तुम् ||

मनसा माता की कथा का मैं करूँ बखान |
महालक्ष्मी अवतार माँ अनुपम कृपानिधान || 72 (अ) ||

काल पुरातन अज कहा कश्यप को समझाय |
वेदबीज से मन्त्र सुत रचिये लोकहिताय || (आ) ||

भक्त मंत्रबल दुःख नशावें | जपें मन्त्र मनवांछित पावें ||
सोचा कश्यप ऋषि श्रुतिदक्षा | कैसे होवे मन्त्रसुरक्षा ||

अधिष्ठातृ हो मन्त्र की प्रकटी माँ जगदम्ब |
अज के मन से श्रीमहालक्ष्मी श्रुत्यालम्ब || 73 ||

महालक्ष्मी मनसा कहलाई | पूजी प्रथम कृष्ण यदुराई ||
तब से पर्वत राजे माता | मनसाधाम लोकविख्याता ||
महिमा सामवेद में बरणी | सुमिरत इच्छा पूरण करणी ||
द्वादश अक्षर मन्त्र महाना | कल्पवृक्ष सम फलद सुजाना ||
कछुक दिवस तहँ पूजन कीन्हे | कर वन्दना ततः चल दीन्हे ||

चलते चलते दिव्य गिरि मालकेतु गए आय |
इन्द्राराध्या वत्सला जहाँ मात शक्राय || 74 ||

शक्रा सरिता के तट मंदिर | सोहे माँ शक्राय जहाँ पर ||
करे वहाँ तप वृद्ध तपस्वी | मातृउपासक विप्र मनस्वी ||
शौर्य प्रार्थना की हे द्विजवर | करें मातृगुणगान कृपा कर ||

महिमा माँ जगदम्ब की दीजे देव सुनाय |
मातृकथा अमृतसमा दे हिय को हुलसाय || 75 ||

बोले मुदित तपस्वी द्विजवर | पुण्यतीर्थ यह परानन्दकर ||
जब था क्षुधात्रस्त संसारा | लिया महालक्ष्मी अवतारा ||
शक्राराध्या यह शक्राई | श्री माँ शाकम्भरी कहाई ||

सविनय पूछा शौर्य ने क्यों शाकम्भरी नाम |
शक्रकृत आराधना की क्या कथा ललाम || 76 (अ) ||

कथा सुनो श्रीमात की बोले विप्र सुजान |
प्रकट महालक्ष्मी हुई रखने जग के प्राण || (आ) ||

हिरण्याक्ष के वंश में होया दुर्गम नाम |
दानव ब्रह्मा से लिया वर छीना सुरधाम || (इ) ||

वैदिक मन्त्र अधिकृत कीन्हा | जलवर्षण निरुद्ध कर दीन्हा ||
जग अकाल से हाहाकारा | दुर्गम का आतंक अपारा ||
शौर्य इंद्र तब सरिता तीरा | गिरि पर करी तपस्या धीरा ||
श्रीमाता ध्यायी देवेशा | हो प्रसन्न प्रकटी इस देशा ||
मातृदरश से हिय अनुरागा | मुदित इंद्र स्तुति करने लागा ||

आर्ष स्तोत्र 

नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते |
शंखचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते || 1 ||
नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयंकरि |
सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते || 2 ||
सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयंकरि |
सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते || 3 ||
सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि |
मन्त्रमूर्ते सदा देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते || 4 ||
आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्ति महेश्वरि |
योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते || 5 ||
स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे |
महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते || 6 ||
पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि |
परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते || 7 ||
श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूषिते |
जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते || 8 ||
महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं यः पठेद् भक्तिमान्नरः |
सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा || 9 ||
एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम् |
द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वितः || 10 ||
त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम् |
महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा || 11 ||

|| इत्यार्षम् इन्द्रकृतं श्रीमहालक्ष्म्यष्टकम् ||

अभय इंद्र को माता दीन्हा | प्राणहरण दुर्गम का कीन्हा ||
जगति अनुग्रह माँ का होया | वर्षा की जग का दुख धोया ||
कृपया दिव्य शाक उपजाये | जन रक्षा की जग गुण गाये ||
भरण शाक से कीन्हा माई | इससे शाकम्भरी कहाई ||
शक्र इंद्र का नाम सुजाना | अतः नाम शक्राय बखाना ||

नमन किया शक्राय को भगवत्यादि सुजान |
 करी प्रार्थना भगवती श्रद्धा से धरि ध्यान || 77 ||

जय जगदम्ब दुःखभयभञ्जिनि | कृपामयी वत्सला निरंजनि ||
महिमा अपरम्पार तुम्हारी | दर्शन मोहशोकभ्रमहारी ||
तुम भक्तों की भक्त तुम्हारे | सारे जीव प्राण से प्यारे ||
इतनी कृपा कृपामयी कीजे | दुःखसहनसमरथ कर दीजे ||
करि अरदास वत्सला माँ से | तीनों आगे चले वहाँ से ||       
दिव्य जयन्तीधाम पुरातन | पथ में देखा तीर्थ सनातन ||

दर्शन करके वन्दना करी सभी मन लाय |
पूजक ने करुणार्द्र हो दी श्रीकथा सुनाय || 78 ||
तारक असुर पुरा बलवाना। किया स्वर्गजय सुर भय माना ||
असुरवधार्थ देव तप कीन्हा। प्रकटी श्री उनको वर दीन्हा ||
वरप्रभाव सुरगण जय पाई। तदा जयन्ती श्री कहलाई ||

चलकर पुनः निरंतर करन लगे विश्राम |
कहा सौम्य ने अब निकट है मेरा गुरुधाम || 79 (अ) ||

आगे क्षेत्र कपाल में मेरे गुरु पिपलाद |
तपें दधिमथी धाम में पराभक्तिमर्याद || (आ) ||

जाकर श्री धाम में आश्रय | पाय निरापद रहें असंशय ||
वहाँ गुप्तचर का न प्रवेशा | प्रविशत कांपें अधम नरेशा ||
ब्रह्मकपाल दिव्य अति धामा | दधिमथि राजे पूरनकामा ||
श्रीसुमिरनरत किया प्रयाना | श्रीदधिमथीधाम नियराना ||

दिखा दूर से ही शिखर हृदय उठे हरषाय |
उन्नत ध्वज फहराय नभ गए देखते आय || 80 ||

गए कपालकुण्ड तहँ पावन | किया स्नान करते श्रीसुमिरन ||
कुण्ड निकट तरुकुंज कुटीरा | ध्यानमग्न पिपलाद सुधीरा ||
अमित आयु तपमूर्ति उदारा | श्रीमन्त्रजपव्रत हिय धारा ||
ध्यानमग्न लखि शीश नवाए | दधिमथीमन्दिर में सब आए |
दर्शन कर रानी अनुरागी | प्रमुदित कीर्तन करने लागी ||
जननीसंग शौर्य संकीर्तन | करने लगा होय विह्वल मन ||
सौम्य एक श्रुतिछात्र बुलाया | करने योग्य कार्य समझाया ||

व्यवस्था आवास की कीन्ही उत्तम ठाम |
रानी शौर्य गए वहाँ करन लगे विश्राम || 81 ||

सौम्य पुरोहित हिय अनुरागा | मंदिर में स्तुति करने लागा ||
नमो नमो श्रीमाँ दुखहारिणि | नमो नमो शरणागततारिणि ||
हे जगदम्बा दधिमथिमाता | करुणासिन्धु वत्सला ख्याता ||
माँ तेरा घट-घट में वासा | जानत हो सबकी अभिलाषा ||
मैं हूँ बालक अबुध तुम्हारा | चरणशरण आ तुम्हें पुकारा ||
विधवा रानी अम्ब सतनया | संकटग्रस्त करूँ मैं विनया ||
वह तुमसे कुछ भी ना माँगे | मात्र अकामभक्ति अनुरागे ||
हे माँ करुणा उन पर कीजे | सन्तति की विपदा हर लीजे ||

भक्तवत्सला दधिमथीमाता करुणागार ||
शरणागत पर कीजिए कृपा हरो दुखभार || 82 ||

करी वन्दना शीश नवाया | पिप्पलाद की कुटिया आया ||
देखा ध्यानविरत मुनिराया | पदवन्दन कर आशिष पाया ||
कही सौम्य रानी की बाता | बोला शरण दीजिए ताता ||
दुष्ट कुन्द से अम्ब बचाये | मातापुत्र शरण में आये ||

रानी सब पीड़ा सहे कहकर ना बतलाय |  
दुःसह दुखदावानल हिय में रखा दबाय || 83 ||

व्यथासरितरय सैकत रोका | सहन शक्ति से थामा शोका ||
भीषण दुख हिय थाम रखे हैं | मर्यादावश शान्त दिखे है ||
तपसामर्थ्य तात प्रकटाओ | शरणागत के शोक मिटाओ ||
पिप्पलाद तब ध्यान लगाया | जान यथार्थ हृदय हरषाया ||

बोले वत्स प्रपन्न है श्रीमाता की रानि ||
श्रीप्रपत्ति अवलम्ब से रोकी हिय की हानि || 84 ||

सुत सामान्य भक्त यह नाहीं | यह निश्चय मानो मन माहीं ||
जिनकी माता लेय परीक्षा | उन्नत हो जीवों में कक्षा ||
इसको दुर्लभ सुफल मिलेगा | जगत सर्वदा स्मरण करेगा ||

पिप्पलाद के हिय उठा सहसा भावज्वार |
विह्वल हो करने लगे करुणाभरी पुकार || 85 ||

|| स्तोत्र || 

जननि हे कमले ललिते रमे, भुवनमोदिनि नित्यमनोरमे |
पतितपावनि भक्तनुते शुभे, भगवति कृपया कुरु मङ्गलम् || 1 ||
त्वमसि देवि सुरेशनमस्कृता,सुफलदा वरदा प्रणवात्मिका |
त्रिविधतापनिवारणकारिणि, भगवति कृपया कुरु मङ्गलम्  || 2 ||
जय कृपामयि देवि परात्परे,अघविनाशिनि मा करुणान्विते |
भुवनकारिणि विष्णुशिवस्तुते, भगवति कृपया कुरु मङ्गलम्  || 3 ||
जयदधीचिनुते करुणात्मिके, असुरमर्दिनि दैन्यविभञ्जिके |
त्वमसि देवि परा जगदम्बिका, भगवति कृपया कुरु मङ्गलम्  || 4 ||
वितर हे करुणां जनवत्सले, कुरु हितं शुभदे त्वमहो शुभम् |
दधिमथि श्रृणु हार्दिकवन्दनां, भगवति कृपया कुरु मङ्गलम् || 5 ||
पिप्पलादकृतं स्तोत्रं ये पठन्ति नराः सदा |
दधिमथी महालक्ष्मीर्नित्यं तेषां प्रसीदति || 6 ||

         
|| इति महालक्ष्मीस्तोत्रम् ||

साश्रु नयन अरु पुलक शरीरा | करी प्रार्थना मुनि गम्भीरा ||
रानी शौर्य नमन आ कीन्हा | पिप्पलाद से आशिष लीन्हा ||
करुणदृशा पिपलाद निहारी | अति कृश दिखी विदर्भकुमारी ||
सतत हृदय में करत पुकारा | अविरल बहे नयन जलधारा ||

छिपी राख में अग्नि ज्यों मेघघटा में भान |
मलिन वसन तन क्लिन्न पर हिय में श्री का ध्यान || 86 (अ) ||

चर्मावृत कंकाल सम दीखत शौर्य कुमार |
आँख धँसी लखकर दशा उपजा हिय दुखभार || (आ) ||

पिप्पलाद बोले सुता दधिमथि हैं साक्षात |
महालक्ष्मी जगदम्बिका भक्तवत्सला मात || (इ) ||

मैं प्रत्यक्ष लखा जीवन में | श्री ने मुझको पाला वन में ||
शरणागत को माँ अपनावे | वत्सलतावर्षा बरसावे ||
लेय रही है मात परीक्षा | करे भक्ति की कठिन समीक्षा ||

कमल खिलत हैं पंक से निशागर्भ से भानु |
कष्टानल से नर कनक हो कुंदन लो जानु || 87 ||

यहीं शरण में श्री की रहिये | माँ का नित्याराधन करिये ||
तपरत है सुत अग्र तुम्हारा | महालक्ष्मीव्रत वह दृढ धारा ||
जब श्रीकृत संयोग बनेगा | तुमसे आकर यहीं मिलेगा ||
शौर्यसेन के हिय श्रीप्रेमा | श्री साधेगी योगक्षेमा ||
सुता प्रपत्तिसाधना तेरी | सर्वमूल तूँ इनको प्रेरी ||
कुशलवृत्त सुत का सुनि काना | हिय आनन्द भगवती माना ||
सूर्यताप से तप्त महीतल | हुआ सिक्त ज्यों पा वर्षाजल ||
हृदय परम शीतलता छाई | बोली महिषि मुनिहिं शिर नाई ||

मम म्लान जीवनकुसुम विकसित की तव बानि |
कर्णसुधा यह चित्त के लिए रसायन जानि || 88 (अ) ||

पड़ी चरण में भगवती शिरोधार्य वच कीन्ह |
ऋषि की वाणी में लिया जीवनपथ निज चीन्ह || (आ) ||

मंदिर में पूजक से रानी | हिरदे की अभिलाष बखानी ||
तात धाममाहात्म्य बताओ | दधिमथी माँ की कथा सुनाओ ||
वह बोला जिज्ञासा सुन्दर | कथा मात की सुखद मनोहर ||

दधिमथीमाता हैं स्वयं महालक्ष्मी साक्षात् |
भक्तिविवश माँ अवतरी कथा लोकश्रुति गात || 89 (अ) ||

प्रसरे जगति अधर्म जब होय धर्म की हानि |
महालक्ष्मी तब अवतरे समझो निश्चय रानि || (आ) ||

दानव विकटासुर बलवन्ता | पुरा हुआ उत्कट जनहन्ता ||
घोर तपस्या अज परितोषे | ब्रह्मा कहा माँग वर मो से ||
वर माँगत विकटासुर बोला | करो अमर सुनि अज मन डोला ||
बोले अमर नहीं जग कोई | माँग अन्यवर मन में जोई ||

कहा विकट नारी अबल मृत्यु उसी के हाथ |
होय न अन्य उपाय वर दीजे नाऊँ माथ || 90 ||

एवमस्तु बोले चतुरानन | चला विकट सुरपुर तज कानन ||
सब दानव देवों से भीता | आये उसकी शरण विनीता ||
सेना सजा स्वर्ग पर धाया | भागे सुर अधिपत्य नशाया ||
असुर ऋषिन्ह को मारन लागे | वे सब प्राण बचाकर भागे ||
जहाँ होयं मख कीर्तन पूजन | करें असुरगण हिंसा नर्तन ||
पहुँचे देव पितामहशरणा | बोले विकट अधम सुखहरणा ||

करुण वचन सुनकर हुआ अज के हिये विषाद |
सोचा वर ही दुःख का कारण है अविवाद || 91 ||

एकै वस्तु पात्र अनुसारी | देय विविध फल अरु गति न्यारी ||
विद्या ले खल करे विवादा | सज्जन बांटे ज्ञानप्रसादा ||
सम्पति पाय नीच अभिमानी | जनहित में दे सज्जन दानी ||
शक्ति अधम मद गर्व विवर्धक | सज्जन पा हों परदुखनाशक ||
मैं वरदान विकट को दीन्हा | पर स्वभाव पहले नहिं चीन्हा ||
यद्यपि दूध सुधा सम ख्याता | सर्प पिये तो विष हो जाता ||

कहा पितामह देवगण जगति अमर नहिं कोय |
नारी कर से निश्चय मृत्यु विकट की होय || 92 (अ) ||

महालक्ष्मी जगकारिणी दधिमथि कन्यारूप |
शीघ्र अवतरित होएगी सदन अथर्व अनूप || (आ) ||

हो प्रसन्न सब सुर चले करते श्रीगुणगान |
महालक्ष्मी जगदम्ब की करुणाकृपा महान || (इ) ||

अज के मानस पुत्र अथर्वा | तपोमूर्ति सुभसत्त्व अगर्वा ||
शान्ति सुकन्या कर्दमतनया | परहितरत परणी शुभ समया ||
सन्ततिहित अथर्व व्रत कीन्हा | सह भार्या श्रीपद चित दीन्हा ||
प्रकटी श्री बोली वर लीजे | मन की अभिलाषा कह दीजे ||
ऋषि बोले सुत दें महतारी | दानी शीलवान यशकारी ||
वंशविवर्धक धर्मपरायन | तव प्रपन्न भक्त करुणायन ||

नीति अहिंसा बन्धुता अरु अवैर सिद्धान्त |
रोम रोम जिसके बसें वह सुत दीजे मात || 93 ||

एवमस्तु माँ सस्मित भाषी | आशा ऋषि के हिये प्रकाशी ||
बोली शांति वचन सिर नाई | अहो पुत्र आग्रह ऋषिराई ||
सन्ततिहित माँ का व्रत कीन्हा | सुता विहाय पुत्रवर लीन्हा ||
काहे उभय भेद ऋषिराया | कन्या नाम नहीं मुख आया ||
कन्यारूप स्वयं जगदम्बा | प्रकटे सृष्टि यज्ञ अवलम्बा ||
सेवामूरति सरल स्वभावा | कन्याजन्म यज्ञ मम भावा ||
पुत्रजनक ले कन्यादाना | दाता कन्याजनक महाना ||
वंश अहंतामूलक नाथा | श्रीलीला जगसर्जनगाथा ||
वागाम्भृणी दिव्यता पाई | अम्भृण ऋषि की कीर्ति बढ़ाई ||
विदुषी गार्गी अपाला घोषा | उज्जवल नाम किया कुलयोषा ||

नाथ इसलिए लीजिये बेटी का वरदान |
भगिनिस्नेह पावे तनय पावन गेह महान || 94 ||  

सुनी बात ऋषि हिय संकोचे | मोहमूल पुत्राग्रह सोचे ||
करी प्रार्थना हे महतारी | शान्तिवचन निश्चय शुभकारी ||
नाहं मम नहिं किंचित लोके | ज्ञानवंश नर होयँ विशोके ||
सारी सत्य शान्ति की वाणी | कन्या तव स्वरूप मैं जानी ||
कन्यारूप करो हो लीला | प्रकृतिस्वरूपा तुम गुणशीला ||
दीजे कन्यावर जगमाता | होवे जन्म धन्य सुरत्राता ||

हो प्रसन्न जगदम्बिका बोली वचन उदार |
सुत अथर्व संतुष्ट मैं देखि युगलव्यवहार || 95 ||

सुतारूप तेरे घर आऊँ | विकटासुर खल दैत्य नशाऊँ ||
 कुल का योगक्षेम मैं धारूँ | भवसागर से पार उतारूँ ||
मातृवचन सुनि शान्ति विभोरा | लखी अम्ब ज्यों शशिहिं चकोरा ||

पुलकित कीन्ही वन्दना सफल जन्म मम मात |
करी निमित अवतार की सुख नहिं हृदय समात || 96 (अ) ||

हुई सगर्भा शान्ति मुख छाई अनुपम कान्ति |
समझि महालक्ष्मीकृपा दम्पति हिय विश्रान्ति || (आ) ||

जिस दिन श्रीमाँ गर्भहिं आई | निखिल भुवन सुख सम्पति छाई ||
दम्पति करें नाम संकीर्तन | नित्य नियम महालक्ष्मीवन्दन ||

करें पाठ श्रीसूक्त का शान्ति अथर्वा नित्य |
करें प्रतीक्षा अवतरण की सोत्साह अमर्त्य || 97 ||

दम्पति व्रतमय काल बिताया | श्रीप्राकट्य दिवस शुभ आया ||
रविचन्द्रादिग्रहस्थिति शोभन | दिव्यानन्द व्याप्त मनमोहन ||
शुभ मुहूर्त प्रकटी जगदम्बा। दिव्यस्वरूपा जगदालम्बा ||
चार भुजा अनुपम छवि सुन्दर | धरे शंखचक्रादिक निज कर ||
कोटिसूर्यशशितेजसदृश मुख | दर्शन कर उपजा अतिशय सुख ||
हुए शकुन शुभ सुन्दर नाना | अशकुन विकटहिं तथा प्रमाना ||
बोली शान्ति कृपा माँ कीजे | करि शिशु लीला हिय सुख दीजे ||

पराशक्ति जगदम्ब जो धरे अमित ब्रह्माण्ड |
कर्तुमकर्तुमन्यथा कर्तुं योग्य अकाण्ड || 98 (अ) ||

वो ही कन्यारूप धरि रोय शान्ति की गोद |
अनुभव की श्री की कृपा हिय दम्पती समोद || (आ) ||

जय जय करते ऋषि मुनि आये | नभ से देव पुष्प बरसाये ||
ऋषि अथर्व मनवांछित पाया | दधिमथी कन्यानाम धराया ||

विकटासुर जाना हुआ महालक्ष्मी-अवतार |
चला अथर्वाश्रम अधम लेकर चमू अपार || 99 ||

दधिमथी दिव्य रूप तब धारा | निश्चय किया हरन भूभारा ||
सिंहवाहिनी आयुध धारे | सुर हर्षित जय वचन उचारे ||
सुरसेना लेकर जगमाता | लीन्हा घेर विकट को ताता ||      
दधिमथि प्रखर शंखध्वनि कीन्ही | विकट सशंक मृत्यु निज चीन्ही ||
टूटे दानव सुरसेना पर | रण प्रचण्ड तब हुआ परस्पर ||

जगदम्बा दधिमथि किया विकटासुर का अन्त |
मिटा शूल सुरहृदय का हर्षित हुए नितान्त || 100 ||

किया प्रणाम चित्त अनुरागे | श्री की करन वन्दना लागे ||
जय जगदम्बा दधिमथि मैया | पार करी भक्तों की नैया ||
भावविभोर सुमन बरसाये | जय जय करते स्वर्ग सिधाये ||
दधिमथि अथर्वाश्रम आई | शान्ति अथर्वा ने स्तुति गाई ||
हे जगदम्ब अनुग्रह कीन्हा | अभयदान सब जग को दीन्हा ||
जग कन्या की साख बनाई | मात-पिता की कीर्ति बढ़ाई ||

जन्म लिया एक पुत्र तब श्री माँ के वरदान |
नाम दधीचि द्विज रखा लखकर तेजनिधान || 101 (अ) ||

दधिमथि बोली होएगा ऋषि दधीचि तपपुष्ट |
कृपा वृष्टि माता पिता पर की हो संतुष्ट || (आ) ||

मात-पिता को सुख दिया लोक उठा हरषाय |
दधिमथि सूक्ष्म स्वरूप ले भू में गई समाय || (इ) ||

शान्ति अथर्वा भी तन त्यागे। दधिचि आय नैमिष तप लागे ||
अस्थिदान सुरपति को दीन्हा। जग पर परम अनुग्रह कीन्हा ||

मान्धातानामक हुआ मरुधरणी भूपाल |
नृपमंडल में शोभित खगगणयथा मराल || 102 (अ) ||

कुटिल पड़ौसी भूप मिल गुणद्वेषी सीमान्त |
छीन लिया भू भाग बहु नरपति हुआ अशान्त || (आ) ||

मंत्री विज्ञ नरेश का प्रज्ञाशाली वृद्ध |
कहा अथर्वाश्रम चलो करि मख हुओ समृद्ध || (ई) ||

दधिमथि महालक्ष्मि जगदम्बा | आद्या शक्ति प्रपन्नालम्बा ||
सूक्ष्मरूप में भूगर्भस्थित | कृपा करेगी मात अपरिमित ||
वहाँ कपालकुण्ड अति पावन | दधिमथि किया जहाँ अवगाहन ||
माँ कारज सारेगी सारा | शरणागति से चैन अपारा ||
आया पावन क्षेत्र कपाला | श्री जगदम्बाशरण नृपाला ||
करवाया जगदम्बा अध्वर | घटना घटी दिव्य उस अवसर ||

प्रकट हुआ भूगर्भ से श्रीविग्रह यह दिव्य |
नृप मन्दिर बनवा दिया अधरखम्भयुत भव्य || 103 (अ) ||

पाया विस्तृत वैभवशाली राजा राज्य |
बढ़ी समृद्धि सुरेन्द्र सम अनल पाय ज्यों आज्य || (आ) ||

माँ करुणावरुणालयरूपा | महिमा अनुभवगम्य अनूपा ||
भक्तों पर सर्वस्व लुटावे | नित्य कृपा-अमृत बरसावे ||
सुनी कथा रानी अनुरागी | विह्वल करन वन्दना लागी ||
नमो नमो माँ परमालम्बा | शरणागतवत्सला पराम्बा ||
तेरे नाम स्वरूप अनेका | हिय वात्सल्यभाव अतिरेका ||
अखिल भुवन में महिमा तेरी | जन जन गावें कीर्ति घणेरी ||
सुरनर नाम जपें माँ तेरा | ऋषि मुनि ध्यान धरें माँ तेरा ||
माता तुमने हमें बचाया | जान अनाथ हमें अपनाया ||
हूँ कृतज्ञ जगदम्बा मैया | तुमने सदा संभाली नैया ||
शौर्यसेन के सह नित रानी | कीर्तन करने लगी अमानी ||

पिप्प्लाद को एक दिन शौर्यसेन सिर नाय |
बोला जिज्ञासा हृदय देव कहूँ सकुचाय || 104 ||

गुरुवर यात्रा में अभिरामा | देखे बहु कुलदेवीधामा || 
पूजित सभी क्षेत्र अनुसारा | लीन्हे श्री विभिन्न अवतारा ||
जो जग की जननी जगदम्बा | निखिल सृष्टि की है अवलम्बा ||
प्रकट होय क्यों भू पर आवे | काहे कुलदेवी कहलावे ||
पिप्पलाद सुनि भावविभोरा | बोले धन्य महीशकिशोरा ||
मातृकथा में रुचि तव अद्भुत | इसका शुभ परिणाम अपरिमित ||
महालक्ष्मी माँ चिन्मयरूपा | नित्य असीम अनन्त अनूपा ||
सर्वाद्या त्रिगुणा परमेश्वरि | कृपाकरुणवत्सलता सुरसरि ||
लक्ष्यालक्ष्यस्वरूपा परमा | प्रेमा तत्प्राकट्यसुमर्मा ||

श्री माँ के प्राकट्य का अधिष्ठान है प्रेम |
भक्तप्रेमवश अवतरे धारे योगक्षेम || 105 (अ) ||

धर्मस्थापन असुरवध केवल बाह्यनिमित्त |
साध्य श्रीच्छामात्र से माँ तो प्रेमप्रवृत्त || (आ) |

केवलभक्तहितार्था लीला | लीलाविग्रहकारणशीला ||
श्री वात्सल्यमयी जगदम्बा | आवे भू पर हो अवलम्बा ||
असंख्येय श्री के अवतारा | वत्सलतामय चरित अपारा  ||

श्रीलीलायश गाइ सुनि भक्त लेयँ आनन्द |
दुर्गम भवसागर तरें पाकर प्रेम अमन्द || 106 ||

शौर्यसेन त्रिपुटीगतलोकाः | कुल हैं श्रियाप्रसूत अशोका ||
बिन्दुनादगतकुलद्वयदेवी | श्रीमाता ख्याता कुलदेवी ||

महालक्ष्मी जगदम्बिका कूटस्था अविकार |
क्रीडा करती लीलया स्वैच्छिक बहु तन धार || 107 (अ) ||

शौर्य स्वर्ण के खण्ड ज्यों विविधभूषणाकार |
श्रीमाता के रूप त्यों कुलदेवी अवतार || (आ) ||

श्री वात्सल्य अनुग्रह शक्तिद्वय आश्रित्य |
कुलदेवी हो अवतरे उभयरूप हैं नित्य || (इ) ||

वत्स गूढ श्रीप्रेम तुम्हारा | करता प्रज्ञा का उजियारा ||
श्रीमाता जिसको अति चावे | उसके हिय में प्रेम जगावे ||

मातृकृपा सब पर रहे किन्तु फलित तब होय |
जब नर पावे पात्रता मिले प्रेम से सोय || 108 (अ) ||

रखिये लगन अटूट यह पुत्र सदा निष्काम |
नैया की पतवार श्री कर राखे अविराम || (आ) ||

भावविभोर द्रवित हिय कहा सौति मुनिराय |
सुनो अग्र की तपकथा ऋषिगण चित्त लगाय || (इ) ||

गर्गाश्रम में अग्र की व्रतसाधना कठोर |
चलती रही निरन्तर श्रेष्ठ लक्ष्य की ओर || (ई) ||

बीते सतत भक्ति में काला | तड़पे ज्यों बिन नीर मराला ||
मार्गशीष की पूनम आई | दरसलालसा हिय गहराई ||
भाववेदनाक्रन्दन जागा | करुण प्रार्थना करने लागा ||
हे माँ काहे करो विलम्बा | दे दर्शन दीजे अवलम्बा ||
भीर पड़े तब भक्त पुकारें | माँ तूँ सबके कष्ट निवारे ||
दीनहीन शरणागत सारे | माता तुमने सहज उबारे ||
अग्र प्रपन्न शरण में तेरी | क्यों ना लेती माँ सुध मेरी ||
सुत-माता का अद्भुत नाता | विवश विकल शिशु माँ को भाता ||
पुत्र कुपुत्र सुने जग माहीं | माता सुनी कुमाता नाहीं ||
जीवन तेरे अर्पण अम्बा | तेरी रजा चलूँ जगदम्बा ||
स्वीकारो माँ मेरी पूजा | तुम सम सुतवत्सल ना दूजा ||
साँस साँस में पीड़ा गाऊँ | व्यथित हृदय से तुम्हें मनाऊँ ||

शरण तुम्हारी आ पड़ा अब मत करो विलम्ब |
इस अनन्यगति पुत्र को तेरा ही अवलम्ब || 109 (अ) ||

बही व्यथा हो अश्रुजल आर्द्र हुए तन वस्त्र |
भावज्वार से अग्र की विह्वल दशा विचित्र || (आ) ||

प्रकटी महालक्ष्मी जगदम्बा | देने उसको करुणालम्बा ||
रूप चतुर्भुज कान्ति विलक्षण | प्रसरे दिव्यतेज नभ क्षण क्षण ||
सस्मित अधर सुवत्सल नैना | मुख ज्यों शशि आलोकित रैना ||

निरखि प्रेम अतिरेक से नाच उठा मन मोर |
नतमस्तक चरनन गिरा छलकत नयन विभोर || 110 ||

उमड़ा हृदय प्रबल अनुरागा | पुलकित हिय स्तुति करने लागा ||
जय जय महालक्ष्मी जगदम्बा | जयति भक्तजन की अवलम्बा ||
वन्दूँ माँ पदकमल तुम्हारे | भक्तविपत्ति विनाशनहारे ||
शिशु की शक्ति रुदन ही मैया | पार करो तुम मेरी नैया ||
श्रेयपन्थ माता दिखलाओ | देय सहारा स्वयं चलाओ ||

जिन चरणन का देवता करें भक्ति से ध्यान |
उनके दर्शन पायकर मैं हूँ धन्य महान || 111 (अ) ||

रुद्ध कण्ठ गद्गद् गिरा साश्रु नयन हिय स्तब्ध |
प्रेमभाव से मौन हो अग्र निहारे मुग्ध || (आ) ||

सकल अहंता ममता भूला | झूले प्रेम रज्जु हिय झूला ||
वत्स माँग वर बोली माता | तव स्वभाव अति विमल उदात्ता ||
अग्रसेन बोले हे अम्बा | रखें सदा वात्सल्यालम्बा ||
अविचल भक्ति दीजिए मोहे | यथा अनन्य भक्त को सोहे ||
यह छवि हिय में बसे विलक्षण | भक्तवत्सला माता प्रतिक्षण || 
जाग्रत स्वप्न सुप्त त्रय काला | तव स्मृतिसर रहे चित्त मराला ||

काम क्रोध मद लोभ के वश नहिं होऊँ मात | 
लोकतंत्र उत्थान में लागे चित्त उदात्त || 112 (अ) || 

महालक्ष्मी बोली सुत तूँ अनन्य निष्काम | 
माँगा नहिं कुछ स्वार्थहित ऐसा भक्त ललाम || (आ) || 

यह मेरा वरदान है तेरे शुभ संकल्प | 
पूर्ण होएँगे वत्स नित सुख समृद्धि अनल्प || (इ) || 

मोहे अतिशय प्रिय यह धामा | भजो यहीं पर रह अविरामा || 
सिधवनमहिमा दिव्य सनातन | तपरत ऋषि मुनि सिद्ध चिरन्तन || 
जनहितकार्य यहाँ पर कीजे | श्रेयमार्ग अवलंबन लीजे ||

मन्दिर यहाँ बनाइए शोभाशाली दिव्य | 
मन्दिर की तीनों दिशा में पुर होवे भव्य || 113 (अ) ||

समताश्रित जनतन्त्र की करो स्थापना पुत्र | 
नवयुग आवे लोक में महिमा हो सर्वत्र || (आ) ||

अग्रा ऊहा वत्स है समता वर्णित वेद | 
समदर्शी बनकर रहो समता नाशे भेद || (इ) || 

अग्र कहा श्रीमाँ कृपा तव कर देगी काम | 
मैं निमित्त अग्रोहा हो त्वदुक्त पुरनाम || (ई) || 

देकर वर अरु प्रेरणा होई अन्तर्धान | 
अनुभव कीन्हा अग्र माँ का वात्सल्य महान || (उ) || 

गुरु को सब वृत्तांत सुनाया | मातृकृपाफल मुनि समझाया ||
बोले सुत माता की लीला | है मन बुद्धि अगम मतिशीला ||
शुभ संकल्प लेय व्रत कीन्हा | अकल्पनीय वर माता दीन्हा ||

माता की आराधना का फल क्षुद्र न होय |
करुणासुफल विलक्षण हो सुपात्र जो कोय || 114 ||

महत्कार्य माँ करना चावे | उसमें तुम्हें निमित्त बनावे ||
तूँ है अग्र सत्य शरणागत | तजे स्वार्थसंकल्प मनोगत ||

मार्जारीसुत ज्यों रहो मातृशरण युवराज |
सुमिरन अरु चिंता करे श्री ही सारे काज || 115 (अ) ||

चर्चा सुनि वरदान की वनवासी गए आय |
लगे बधाई देन सब हर्ष न हृदय समाय || (आ) ||

बोले सुनो अग्र हितकारी | सफल अनन्या भक्ति तुम्हारी ||
सेवानिष्ठ भावना तेरी | की श्रीमाता कृपा घणेरी ||

गर्ग कहा यह पूर्णिमा अतिशय शुभ है तात |
महाआरती कीजिए श्रीमहिमा हो ख्यात || 116 ||

सुनि गुरुवचन हर्ष अति छाया | उत्सव आयोजन मन भाया ||
वटतरुतलस्थित श्री का धामा | सभी सजाया भव्य ललामा ||
नृत्य करत वनवासी आये | प्रमुदित चित्त पुष्प बरसाये ||
ब्रह्मचारिणी अरु ऋषिभार्या | मंगलगान किया शुचि आर्या ||

सामगान करने लगे ऋषि मुनि भाव विभोर |
ब्रह्मचारि शंख ध्वनि करें मुदित चहुँ ओर || 117 (अ) ||

देव्युत्सव शोभा अमित शौनक बुद्धि अगम्य |
महाआरती तब करी सब मिलकर अति रम्य || (आ) ||

दर्शनरत थी भगवती तब दधिमथि के धाम |
शौर्यसेन के संग में आरती में अविराम || (इ) ||

दिखा दृश्य प्रत्यक्ष इव दिखे अग्र सोल्लास |
महाआरती कर रहे झलकत दृक् विश्वास || (ई) ||

भावज्वार से भगवती के छलका जल नैन | 
करने लागी कीर्तन आर्द्र वाष्प से बैन || (उ) || 

करी आरती पूर्ण पुजारी | तब रानी की दशा निहारी || 
अविरल बहे अश्रु जलधारा | भावमग्न विस्मृत संसारा || 
अन्य सभी जन दशा विलोकी | रहे निहार साँस मनु रोकी || 
सहसा हुआ प्रचण्ड प्रकाशा | आलोकित धरती आकाशा || 
प्रकटी महालक्ष्मी जगदम्बा | रूप चतुर्भुज भक्तालम्बा || 
दर्शन से रानी अनुरागी | पुलकित हो स्तुति करने लागी ||

स्तुति 

जय जननि परमवात्सल्ययुते, जय विष्णुपितामहशम्भुनुते | 
जय सन्ततिभीतिविनाशकृते, महालक्ष्मि नमामि पदाब्जं ते || 1 ||
जय भगवति विश्वजनोद्धरिके, जय श्रीः करुणामयलोचनिके | 
जय भक्तसुकीर्तनरसरसिके, महालक्ष्मि नमामि पदाब्जं ते || 2 ||
जय कमले ललिते श्रीविद्ये, श्रीयंत्रवासिनि ह्यनवद्ये | 
जय मात र्मुनिवृन्दाराध्ये, महालक्ष्मि नमामि पदाब्जं ते || 3 ||
जय दुःखविपत्तिविनाशकरे, जय भक्तिसमृद्धिविवृद्धिकरे | 
जय भक्तप्रपन्नसहायकरे, महालक्ष्मि नमामि पदाब्जं ते || 4 ||
मातस्ते दर्शनसुखमाप्तम्, कारुण्यमकल्पितमिदं कृतम् | 
हृदयं ते परवात्सल्यभृतम्, महालक्ष्मि नमामि पदाब्जं ते || 5 || 
स्तोत्रमेतन्महालक्ष्म्याः ये पठन्तीह श्रद्धया | 
महालक्ष्मीकृपां प्राप्य मोदन्ते भुवने सदा || 6 ||

|| इति श्रीमहालक्ष्मीस्तुतिः ||

महालक्ष्मी बोली तुम धन्या | धरी सुता हिय भक्ति अनन्या || 
नहीं विपद् में विचलित होई | हिय में उपालम्भ ना कोई || 
यद्यपि तव अकाम अनुरागा | सहजविरक्ता स्वारथ त्यागा || 
पर अमोघ है दर्शन मेरा | होगा सर्वभाँति हित तेरा ||

जो भी हिय संकल्प हो माँगो वह वरदान | 
करी मुदित तब भगवती निज भावना बखान || 118 || 

माँ कुछ नहीं वरेच्छा मेरी | किन्तु सफल हो आज्ञा तेरी || 
मातृसुता का निर्मल नाता | रहे अटल यह सदा उदात्ता || 
सुतद्वय रहें शरण में तेरी | रखें भक्तिपथ प्रीति घणेरी ||

जन्म जन्म रति तव चरण में यह दें वर इष्ट | 
अन्य जगत में कुछ नहीं माता मुझे अभीष्ट || 119 ||


एवमस्तु बोली श्रीमाता | अहो सुता तव प्रकृति उदात्ता || 
लौकिक वर तुम कुछ ना माँगा | नश्वर के प्रति सहज विरागा ||

सुता अन्य वर मम यह राज करेंगे पुत्र | 
अग्र शौर्य के राज्य में होगा सुख सर्वत्र || 120 (अ) ||

देकर वर श्री वत्सला होई अंतर्धान | 
हुआ दधिमथीधाम में उत्सव भव्य महान || (आ) || 

महाआरती तब करी पिप्पलाद हरषाय | 
हुई जयध्वनि सुर रहे नभसि पुष्प बरसाय || (इ) ||

महालक्ष्मीवरदान की कथा सुनाय विभोर | 
सौती बोले यह कथा है आनंदहिलोर || (ई) ||

पढत सुनत हो सर्वसुख सर्वविपत्तिविनाश | 
हिय में परमानन्द हो अरु समृद्धिविकास || (उ) || 


|| इति रामकुमारदाधीचकृते श्रीमहालक्ष्मीचरितमानसे चतुर्वर्गफलप्रदे चतुर्थः सोपानः ||      

Sanjay Sharma
Sanjay Sharma is the founder and author of Mission Kuldevi inspired by his father Dr. Ramkumar Dadhich. Mission Kuldevi is trying to get information of all Kuldevi and Kuldevta of all societies on one platform.

प्रातिक्रिया दे

Top

This site is protected by wp-copyrightpro.com