कूँपावत राठौड़ वंश का इतिहास व ठिकाने | Kumpawat Rathore Vansh History in Hindi

Kumpawat Rathore vansh history in hindi : मण्डौर के रणमलजी के पुत्र अखैराज के दो पुत्र पंचायत व महाराज हुए। महाराज के पुत्र कूंपा के वंशज कूँपावत राठौड़ कहलाये। मारवाड़ का राज्य जमाने में कूंपा व पंचायण के पुत्र जैता का महत्वपूर्ण योगदान रहा था। चित्तौड़ से बनवीर को हटाने में भी कूंपा की महत्वपूर्ण भूमिका थी। मालदेव ने वीरम को जब मेड़ता से हटाना चाहा, कूंपा ने मालदेव का पूर्ण साथ देकर इन्होंने अपना पूर्ण योगदान दिया। मालदेव ने वीरम से डीडवाना छीना तो कूंपा को डीडवाना मिला। (आसोप का इतिहास- रामकरण आसोप पृ. 26) मालदेव की 1598 वि. में बीकानेर विजय करने में कूंपा की महत्वपूर्ण भूमिका थी। शेरशाह ने जब मालदेव पर आक्रमण किया और मालदेव को अपने सरदारों पर अविश्वास हुआ तो उन्होंने  साथियों सहित युद्धभूमि छोड़ दी परन्तु जैता व कूंपा कहा धरती हमारे बाप दादाओं के शौर्य से प्राप्त हुई हैं हम जीवित रहते उसे जाने न देंगे। दोनों वीरों ने शेरशाह की सेना से टक्कर ली और अद्भुत शौर्य दिखाते हुए मातृभूमि की रक्षार्थ बलिदान हो गए। (राजस्थान का इतिहास-गोपीनाथ पृ. 324) उनकी बहादुरी से प्रभावित होकर शेरशाह के मुख से ये शब्द निकल पड़े “मैंने मुट्ठी भर बाजरे के लिए दिल्ली सल्तनत खो दी होती।”

इस प्रकार अनेक युद्धों में आसोप के कूँपावतों ने वीरता दिखाई।

1.) महेशदासोत कूँपावत :-

वि. सं. 1641 में बादशाह अकबर ने सिरोही के राजा सुरतान को दण्ड देने मोटे राजा उदयसिंह को भेजा। इस युद्ध में महेशदास के पुत्र शार्दूलसिंह ने अद्भुत पराक्रम दिखाया और वही रणखेत रहे। अतः उनके वंशज भावसिंह को 1702 वि. में कटवालिया के अलावा सिरयारी बड़ी भी उनका ठिकाना था। एक एक गांव के भी इनके काफी ठिकाने थे।

2.) ईश्वरदासोत कूँपावत :-

कूंपा के पुत्र ईश्वरदास के वंशज ईश्वरदासोत कूँपावत कहलाये। इनका मुख्य ठिकाना चण्डावल था।

3.) माण्डणोत कूँपावत :-

कूँपाजी के बड़े पुत्र मांडण के वंशज माण्डणोत कूँपावत कहे जाते है। इनका मुख्य ठिकाना चन्देलाव था।

4.) जोधसिंहोत कूँपावत :-

कूँपाजी के बाद क्रमशः मांडण,खीवकण,किशनसिंह,मुकन्दसिंह,जैतसिंह,रामसिंह व सरदारसिंह हुए। सरदारसिंह के पुत्र जोधसिंह ने महाराजा अभयसिंह जोधपुर की तरफ से अहमदाबाद के युद्ध में अच्छी वीरता दिखाई। महाराजा ने जोधसिंह को गारासांण खेड़ा,झबरक्या और कुम्भारा इनायत किया। इनके वंशज जोधासिंहोत कूँपावत कहलाते हैं।

5.) उदयसिंहोत कूँपावत :-

कूँपाजी के चौथे पुत्र उदयसिंह के वंशज उदयसिंहोत कूँपावत कहलाते हैं। उदयसिंह के वंशज छत्रसिंह को वि. 1831 में बूसी का ठिकाना (परगना गोड़वाड़) मिला। वि. सं. 1715 के धरमत के युद्ध में उदयसिंह के वंशज कल्याणसिंह घोड़ा आगे बढ़ाकर तलवारों की रीढ़ के ऊपर घुसे और वीरता दिखाते हुए काम आये। यह कुरब बापसाहब का ठिकाना था। चेलावास,मलसा,बावड़ी,हापत,सीहास,रढावाल,मोड़ी आदि छोटे ठिकाने थे।

6.) तिलोकसिंहोत कूँपावत :-

कूंपा के सबसे छोटे पुत्र तिलोकसिंह के वंशज तिलोकसिंहोत कूँपावत कहलाते हैं। तिलोकसिंह ने सूरसिंहजी जोधपुर की तरफ से  किशनगढ़ के युद्ध में वीरगति प्राप्त की। इस कारण तिलोकसिंह के पुत्र भीमसिंह को घलणा का ठिकाना सूरसिंह जोधपुर ने वि. 1654 में इनायत किया।

कूँपावत राठौड़ वंश की कुलदेवी :-

मूल राठौड़ वंश होने से इस वंश की कुलदेवी पंखिनी/नागणेचिया माता है। नागणेचिया माता के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए Click करें >

यदि आप कूँपावत राठौड़ वंश से हैं और नागणेचिया माता से इतर किसी देवी को कुलदेवी के रूप में पूजते हैं तो कृपया Comment Box में बताएं। अथवा इस वंश से जुड़ी कोई जानकारी देना चाहते हैं तो भी आप Comment Box में अपने सुझाव व विचार दे सकते हैं।

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