sachiya-mata-katha-mahatmya

सच्चियाय माता की श्लोकमय कथा, इतिहास – कुलदेवीकथामाहात्म्य

‘कुलदेवीकथामाहात्म्य’

ओसियां की सच्चियाय माता

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इतिहास

सच्चियाय माता संचाय, सच्चिका, सचवाय, सूच्याय, सचिया आदि अनेक नामों से प्रसिद्ध है। इनका शक्तिपीठ जोधपुर से लगभग 60 कि.मी. दूर ओसियाँ में स्थित है। ओसियाँ पुरातात्त्विक महत्त्व का एक प्राचीन नगर है। जैन साहित्य में ओसियाँ नगर का उपकेश, ऊकेश, ओएश आदि नामों से उल्लेख मिलता है।

ओसियाँ धार्मिक सामंजस्य की नगरी रही है। यहाँ शैव, वैष्णव, शाक्त और जैन मन्दिर साथ-साथ बने। इन मन्दिरों में सच्चियाय माता का मन्दिर सर्वाधिक प्रसिद्ध और लोकप्रिय है। सच्चियाय माता के मन्दिर में महिषमर्दिनी दुर्गा की प्रतिमा स्थित है। वैदिकमतावलम्बियों की तरह श्रमणमतावलम्बी ओसवाल भी सच्चियाय की पूजा कुलदेवी के रूप में करते हैं। ओसवालों के पूर्वज जैनधर्म स्वीकार करने से पूर्व क्षत्रिय थे। ओसवालों का मूल उद्गमस्थल ओसियां ही है।

सच्चियायमाता का मन्दिर पहाड़ी पर स्थित है। मन्दिर के प्रवेशद्वार पर चंवरधारिणी स्त्रीप्रतिमाएँ कलापूर्ण हैं। मन्दिर तक पहुंचने के लिए सीढीदार आकर्षक मार्ग है, जिस पर आठ कलात्मक तोरणद्वार हैं। …. लेख नीचे जारी है ……

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पहाड़ी की चट्टानों को काटकर बनाया गया मन्दिर अत्यन्त भव्य है। उसका रचनाविधान अतीव चित्ताकर्षक है। मन्दिर-परिसर में नवदुर्गा, विष्णु, शिव, सूर्य, गणेश, भैरव पुनियाजी आदि के छोटे-छोटे मन्दिर हैं। मुख्य मन्दिर पश्चिमाभिमुख है। मन्दिर का सभामण्डप आठ आकर्षक स्तंभों पर स्थित है। इस मन्दिर के गर्भगृह में सच्चियाय माता की भव्य स्वरूप वाली प्रतिमा प्रतिष्ठापित है। माता के बाईं ओर वैष्णवी माता की आकर्षक प्रतिमा है। मन्दिर आठवीं शताब्दी का बना हुआ है, पर इसका विकास मुख्यतः बारहवीं शताब्दी में हुआ। इस तथ्य की पुष्टि मन्दिर में लगे शिलालेखों से होती है। इतिहासकार गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने ‘ जोधपुर राज्य का इतिहास ‘ ग्रन्थ में इन शिलालेखों का उल्लेख किया है। ‘मुंहता नैणसी री ख्यात ‘ ग्रन्थ में माता के चमत्कारों का वर्णन किया गया है।

डॉ. महावीरमल लोढा ने अपनी पुस्तक ‘ओसवंश : उद्भव और विकास तथा मांगीलाल जी भूतोड़िया ने अपनी पुस्तक ‘इतिहास की अमरबेल ओसवाल ‘ में जैन परम्परा के गुटकों के उद्धरण दिये हैं जिनमें ओएशा नगर (ओसियाँ ) व मन्दिर के निर्माण की कथा का उल्लेख है। जहाँ ओएशा नगर बसा वहाँ पहले निर्जन वन था। वहाँ एक राक्षस रहता था। उस क्षेत्र में राक्षस के भय से सब आतंकित रहते थे। मंगा नामक ब्राह्मण की आराधना से प्रसन्न होकर उसकी अभिलाषा की पूर्ति के लिए माता ने राक्षस का संहार किया। मरते-मरते राक्षस ने प्रार्थना की, कि यहाँ जो नगर आपकी कृपा से बसेगा उसका नाम मेरे नाम पर हो। माता ने ऐसा ही होने का वरदान दिया –

मंगा  विप्र  तिन समय    एक मन सक्त अराधे। 
सुप्रसन्न       हुई      सक्त     अराकेन    अराधे।
जद  कयो  कर  जोड़    तवे   एक राकस चावो। 
माजी   जिनने    मार   बस्तियां  सहर  बसाओ। 
मारियो तबे मरतां मुखां करुणाकर वोसे कयो। 
मोय   नाम   नग्र   बसे   देवी   केता   वर  दियो। 

सम्भवतः उस राक्षस का नाम ओसियाँ था। अतः उसके नाम पर नगर का नाम ओसियाँ रखा गया। बाद में जब राजा उपलदेव ने उपकेशगच्छ के आचार्य रत्नसूरी से देशना प्राप्त कर जैन धर्म स्वीकार किया, तब से नगर का नाम उपकेशपुर हो गया। ऊकेश, ओएश आदि शब्द भी  उपकेश ‘ शब्द के ही अपभ्रंश प्रयोग हैं। जनसाधारण के व्यवहार में ओसियाँ नाम ही प्रचलित रहा।

एक अन्य गुटके में सच्चियाय मन्दिर के संस्थापक उपलदेव पर माता की कृपा का वर्णन इस प्रकार किया गया है-

उपलदेव      पंवार      नगर      ओएसा      नरेश      रा,
राजरीत      भोगवै     सकल     सचियाय    दियो    वर,
नवलख     चरु      निधान     दियो     सोनहियां    देवी ,
इतव    उपर    अरिगंज   कियो    सह    पाव    न केवी ,
इम   करे  राज  भुगते  अदल  के  इक वर सब दिविया,
नहिं   राजपुत्र,  चिंता निपट सकत प्रगट कह कत्थिया।।
हो   राजा,  किण   काज   करै  चिंता मन मांहि,
थारै   उदर   सुतन्न   वेह  अंक   लिखिया  नाहि,
जद    नृप   छै  दलगीर  दीना वाय क इम दाखै,
राज   बिना   सुत  राय  राज  म्हारो  कुण  राखै,
जा  नृपत  पुत्र  होसी  हमें घणां नरां पण घटसी,
होवसी वणं  संकर जुवा पुव रांध राव लहसी ।।
देवी    रै    वरदान    पुत्र     राजा    फल   पाये,
नाम   दियो   जयचन्द   बरस   पनरा   परणाये,

सच्चियायमाता अनेक समाजों में कुलदेवी के रूप में पूजित है। यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु, जात देने व जडूला उतारने के लिए आते रहते हैं। इस प्रकार यह मन्दिर लोक-आस्था का प्रमुख केन्द्र है।

डॉ. महावीरमल लोढा तथा मांगीलाल जी भूतोड़िया ने उपलदेव की कथा के दो स्रोतों का उल्लेख किया है। पहला स्रोत जैन परम्परा के गुटकों का है और दूसरा चारणसाहित्य व इतिहास का।

यहाँ प्रस्तुत कथा दोनों स्रोतों के समन्वय पर आधारित है। संस्कृत भाषा में रचित दुर्लभ व सुन्दर कथा स्तुति  की अपनी प्रति नीचे दिए गए लिंक से प्राप्त कर सकते हैं –

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