Kahar, Mehra, Bhoi Samaj in Hindi: भारतीय समाज और संस्कृति के निर्माण में जल, जंगल और जमीन से जुड़े समुदायों का सबसे बड़ा योगदान रहा है। कहार, मेहरा और भोई समाज ऐसे ही अत्यंत परिश्रमी, प्रकृति-प्रेमी और लोकसेवी समुदाय हैं। मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में निवास करने वाले ये समुदाय ऐतिहासिक रूप से मछली पकड़ने, नौका विहार, कृषि और पालकी उठाने जैसे महत्वपूर्ण कार्यों से जुड़े रहे हैं।
‘मिशन कुलदेवी’ के इस विशेष लेख में हम इन तीनों अभिन्न समुदायों के इतिहास, उनकी रोचक उत्पत्ति कथाओं, राजपूती खाँपों और उनकी संस्कृति पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
1. कहार समाज (Kahar Samaj): गंगा के नाविक और लोकसेवी
कहार शब्द मूल रूप से उन लोगों के लिए प्रयुक्त होता था जो ‘पालकी’ (Palanquin) उठाते थे, क्योंकि इनके व्यवसाय में कंधे (कंधार/कहार) का उपयोग होता था। ये समाज के लोकसेवी के रूप में कार्य करते थे, जैसे पानी भरना, रसोई का कार्य करना और नदी के किनारे माल व लोगों का परिवहन करना।
राजस्थान में कहार समाज का विभाजन:
राजस्थान में कहार जाति मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित है, जिनके बीच परस्पर विवाह या खान-पान का संबंध नहीं होता:
- पूरबिया: ये स्वयं को मूल कहार मानते हैं। ये पालकी वाहक का कार्य करते हैं, बर्तन साफ करते हैं, लेकिन बोझा ढोने या सईसी (घोड़ों की देखरेख) का काम नहीं करते।
- ढूँढाड़ा: ये भी पूरबिया समाज की तरह ही नियम मानते हैं। पूरबिया और ढूँढाड़ा कहारों की औरतें हाथी दांत का चूड़ा नहीं पहनती हैं। राजस्थान के पूर्वी भाग के कहार ‘भाई’ कहलाते हैं।
- मारवाड़ी: ये झूठन नहीं माँजते और न ही कपड़े धोते हैं, लेकिन सईसी का कार्य और बाजार से अनाज उठाने का काम करते हैं। इनकी स्त्रियां हाथी दांत का चूड़ा पहनती हैं।
(नोट: मछली पकड़ने वाले कहारों को अलग से ‘ढीमर’ कहा जाता है।)
कहार समाज की उत्पत्ति और पौराणिक कथा
कहार समाज की उत्पत्ति के पीछे एक बेहद रोचक पौराणिक मान्यता जुड़ी हुई है, जिसका संबंध देवराज इंद्र और राजा निहुष से है।
राजा निहुष और सप्तर्षियों की कथा: पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब देवराज इन्द्र को ब्रह्म हत्या के पाप का प्रायश्चित करने के लिए स्वर्ग छोड़ना पड़ा, तो देवताओं ने चंद्रवंशी राजा निहुष को इन्द्र के स्थान पर नियुक्त किया। सत्ता के नशे में निहुष इन्द्र की पत्नी शची पर मोहित हो गया। जब शची ने शर्त रखी कि निहुष उनसे मिलने के लिए ‘सप्तर्षियों की पालकी’ में बैठकर आए, तो निहुष ने ऐसा ही किया।
सप्तर्षियों को पालकी धीरे ले जाते देख, निहुष ने ‘सर्प-सर्प’ (शीघ्र चलो) कहते हुए अगस्त्य ऋषि को लात मार दी। क्रोधित होकर ऋषि ने निहुष को सर्प बनने का श्राप दे दिया। मान्यता है कि कहार समाज उन्हीं सप्तर्षियों के वंशज हैं, जिन्होंने निहुष की वह पालकी उठाई थी।
2. मेहरा समाज (Mehra Samaj): राजपूती गौरव और त्याग
कहार समाज का ही एक दूसरा नाम और अभिन्न अंग ‘मेहरा’ है। मेहरा समुदाय मुख्य रूप से कृषि, पशुपालन और निर्माण कार्यों से जुड़ा हुआ है।
मेहरा नाम की उत्पत्ति का ऐतिहासिक किस्सा
मेहरा समाज अपनी उत्पत्ति मुख्य रूप से ‘चौहान राजपूतों’ से मानता है। ऐतिहासिक किंवदंती के अनुसार:
एक बार एक सुल्तान के पेट में भयंकर दर्द हुआ जो किसी दवा से ठीक नहीं हो रहा था। तब कैद में बंद एक कैदी (जो युद्ध में हथियार डालने के कारण बंदी बना था) ने ‘बिजोरा’ खाने का उपाय बताया, जिससे सुल्तान ठीक हो गया। जब सुल्तान ने उसे इनाम मांगने को कहा, तो उसने अपने बंदी भाई-बंधुओं की रिहाई मांगी। सुल्तान ने आदेश दिया कि यह जिसे भी अपना रिश्तेदार बताएगा, उसे छोड़ दिया जाएगा। वह कैदी जिस-जिस को देखकर कहता— “यह मेरा है, यह मेरा है”, उसे आजाद कर दिया गया। इसी ‘मेरा’ शब्द से आगे चलकर ‘मेहरा’ शब्द की उत्पत्ति हुई।
मारवाड़ी मेहरे पालकी उठाने के अलावा पत्थर घड़ने, छत बनाने और पानी भरने का व्यवसाय भी करते हैं।
मेहरा समाज की राजपूती खाँपें (Gotra) और उनकी कुलदेवियां
मेहरा समाज के गोत्रों से यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि इनकी अधिकांश खाँपें चौहान व अन्य राजपूत वंशों से निकली हैं। ये हिंदू और इस्लाम दोनों का पालन करते हैं। इनकी प्रमुख खाँपें और कुलदेवियां इस प्रकार हैं:
| क्र.सं. | खाँप (Gotra) | मूल वंश (Origin) | पैतृक कुलदेवी (Kuldevi) |
| 1 | चौहान (Chauhan) | अग्निवंशी राजपूत | शाकंभरी माता / आशापुरा माता |
| 2 | हाडा (Hada) | चौहानों की शाखा | आशापुरा माता / भदाणा माता |
| 3 | खीची (Khichi) | चौहानों की शाखा | जोगणिया माता / भंवाल माता |
| 4 | सोनगरा (Songara) | जालौर के चौहान | आशापुरा माता (महोदरी माता) |
| 5 | निरबाण (Nirban) | चौहानों की शाखा | शाकंभरी माता |
| 6 | मोयल (Moyal) | ऐतिहासिक वंश | दधिमती माता / आशापुरा माता |
| 7 | साँभरिया (Sambhariya) | सांभर (अजमेर) के मूल | शाकंभरी माता |
| 8 | सांचोरा (Sanchora) | सांचोर क्षेत्र के मूल | आशापुरा माता |
| 9 | मादेचा (Madecha) | राजपूती गोत्र | आशापुरा / क्षेत्रीय माता |
| 10 | पाकेचा (Pakecha) | क्षेत्रीय गोत्र | चामुंडा / क्षेत्रीय देवी |
| 11 | साहलोत (Sahlot) | ऐतिहासिक राजपूत गोत्र | क्षेत्रीय कुलदेवी / भवानी |
(नोट: कहार और भोई समाज मुख्य रूप से शिव (शैव) और जल व प्रकृति की देवियों की उपासना करते हैं। अपने-अपने क्षेत्रों के अनुसार ये मुख्य रूप से भवानी, चंडी माता और शीतला माता की पूजा करते हैं।)
(नोट: कुलदेवियों और गोत्रों के नाम पैतृक निवास और क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। यह सूची केवल एक छोटा सा प्रयास है! यदि आपके गोत्र और आपकी कुलदेवी का नाम इस लेख में शामिल नहीं है, तो कृपया नीचे कमेंट बॉक्स में अपना गोत्र और कुलदेवी का नाम जरूर लिखें, ताकि समाज के अन्य लोगों को मदद मिल सके।
3. भोई समाज (Bhoi Samaj): जल प्रबंधन और शिल्पकला के धनी
भोई समाज मुख्य रूप से महाराष्ट्र, ओडिशा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पाया जाता है। “भोई” शब्द का अर्थ है “खेती करना” या भूमि से जुड़ना।
- स्वतंत्रता संग्राम में योगदान: ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान, भोई समाज ने असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया था।
- संस्कृति और मान्यताएं: इनका मुख्य धर्म शैव (भगवान शिव के उपासक) है और ये माता जी (कुलदेवी/शक्तियाँ) को पूजते हैं। ये अपने पारंपरिक नृत्यों, त्योहारों (होली, दिवाली, दशहरा) और विशिष्ट वेशभूषा (धोती, कुर्ता और टोपी) के लिए जाने जाते हैं।
- शिल्प और कृषि: जल प्रबंधन (Water Management) और सिंचाई में इनकी विशेषज्ञता प्राचीन काल से रही है। इसके अलावा, ये बांस की टोकरी, चटाई, धातु के काम और मिट्टी के बर्तन बनाने में बेहद कुशल हैं। इनकी औरतें भवन निर्माण (कमठों) में चूना पीसने का कार्य करती रही हैं, जिसके कारण अन्य मजदूर महिलाओं को भी सम्मान से ‘प्रहरी’ या ‘भोई’ कहा जाने लगा।
- शिक्षा: आज भोई समाज शिक्षा पर बहुत जोर दे रहा है और कई शैक्षणिक संस्थान चलाकर अपने युवाओं को आगे बढ़ा रहा है।
चुनौतियां और निष्कर्ष (Conclusion)
कहार, मेहरा और भोई—तीनों ही समाजों का इतिहास भारत के विकास और अर्थव्यवस्था का आधार रहा है। आज भी यह समुदाय गरीबी, शिक्षा के अभाव और सीमित स्वास्थ्य सेवाओं जैसी ग्रामीण चुनौतियों से संघर्ष कर रहा है। इसके बावजूद, अपने कबीलाई संगठन (मुखिया प्रथा), त्योहारों (छठ, होली, ईद) और कड़ी मेहनत के बल पर इस समाज ने अपनी जड़ों और अपनी संस्कृति को सहेज कर रखा है। जरूरत है कि समाज के युवा शिक्षा के माध्यम से आधुनिक अवसरों का लाभ उठाएं।
🙏 क्या आपको अपनी कुलदेवी की जानकारी नहीं है?
यदि किसी कारणवश आपको अपने गोत्र या अपनी कुलदेवी का नाम बिल्कुल नहीं पता है और परिवार या रिश्तेदारों से भी कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है, तो निराश न हों! आप हमारी विशेष गाइड 👉 मेरी कुलदेवी कौन है? को पढ़कर अपनी जड़ों और अपनी कुलदेवी को खोजने का सही रास्ता पा सकते हैं।)



Wow