Thathera, Kansara Samaj in Hindi: भारतीय सभ्यता में धातु शिल्प (Metal Craft) का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। वेदों से लेकर आधुनिक युग तक, मंदिरों के कलश से लेकर घरों के पूजा-बर्तनों तक, जिस समाज ने अपनी हथौड़ी की थाप से धातुओं में प्राण फूंके हैं, वह है— ठठेरा और कंसारा समाज। मुख्य रूप से गुजरात, राजस्थान और मध्य भारत में निवास करने वाला यह समाज अपने बेजोड़ धातु-कौशल और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है।
‘मिशन कुलदेवी’ के इस विशेष लेख में हम ठठेरा और कंसारा समाज की ऐतिहासिक उत्पत्ति, धातु निर्माण की उनकी पारंपरिक कला, उनके अनूठे रीति-रिवाजों, राजपूती खाँपों (गोत्रों) और उनकी कुलदेवियों के बारे में विस्तार से जानेंगे।
कंसारा और ठठेरा: नाम का अर्थ और परिचय
भले ही इन्हें अलग-अलग नामों से पुकारा जाता हो, लेकिन राजस्थान और गुजरात में ‘ठठेरा’ और ‘कंसारा’ दोनों जातियाँ एक ही गौरवशाली वृक्ष की शाखाएं (पर्यायवाची) मानी जाती हैं।
- कंसारा: यह शब्द संस्कृत के “कंस्य” (कांस्य/Bronze) शब्द से लिया गया है। कांसे का निर्माण और उसे सुंदर बर्तनों का आकार देने वाले शिल्पी ‘कंसारा’ कहलाए।
- ठठेरा: पीतल और तांबे के बर्तनों को ठोक-पीटकर (ठक-ठक की ध्वनि के साथ) आकार देने वाले शिल्पियों को ‘ठठेरा’ कहा गया।
ऐतिहासिक उत्पत्ति: राजपूती गौरव का प्रतीक
कंसारा और ठठेरा समाज का 12वीं शताब्दी का एक लंबा और समृद्ध इतिहास रहा है। राजस्थान और गुजरात में इस समाज की उत्पत्ति मुख्य रूप से राजपूतों से मानी जाती है। युद्ध के समय शस्त्र बनाने और शांति के समय बर्तन व मूर्तियां बनाने के कौशल के कारण ये समाज में अत्यंत सम्मानीय रहे हैं।
- प्रसिद्ध इतिहासकार हैनरी इलियट के अनुसार, ‘कंसारा’ शब्द “कंसभरा” (कंस + भरा) से निकला है, जिसका अर्थ है कांसे को सांचों में भरने (ढालने) वाला महान शिल्पी।
- राजस्थान में कंसारा समाज की प्रथाएं काफी हद तक ‘बामनिया सुनारों’ (Brahmin Goldsmiths) से मिलती-जुलती हैं, जो इनके उच्च और सात्विक सामाजिक स्तर को दर्शाती हैं।
पेशा और धातु शिल्प का वर्गीकरण (The Art of Metal Craft)
यह समाज सदियों से तांबा, पीतल, काँसा, जस्ता और चाँदी आदि धातुओं को गलाकर और ढालकर बर्तन व मूर्तियां बनाने में दक्ष रहा है। इनके पेशे की सटीकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ये एक सेर तांबे में पाव भर कथीर (टिन) मिलाकर उसे मूस (भट्टी) में गलाते हैं, और फिर कूट-कूटकर थाली, कटोरे, झाँझ, मजीरे, और मंदिरों के विशाल घड़ियाल बनाते हैं।
काम (धातु) के आधार पर समाज को तीन मुख्य सम्मानजनक उप-वर्गों में बांटा गया है:
- ठठेरा: जो विशेष रूप से पीतल और तांबे को घड़ते हैं (मारवाड़ में इनकी संख्या अधिक है)।
- कंसारा: जो मुख्य रूप से कांसे (Bronze) के बर्तन और वस्तुएं बनाते हैं।
- भरावा: जो पीतल और अन्य धातुओं को सांचों में ढालने (Casting) का अत्यंत बारीक कार्य करते हैं।
अनूठी सांस्कृतिक परंपराएं और रीति-रिवाज
कंसारा और ठठेरा समाज की अपनी एक बहुत ही समृद्ध और अनूठी संस्कृति है:
- गोद लेने की प्रथा (पगड़ी बंधन): इस समाज में ‘पगड़ी बंधन संस्कार’ का बहुत महत्व है। यदि परिवार के किसी निकट संबंधी की संतान को गोद लिया जाता है, तो एक पगड़ी की रस्म होती है। लेकिन यदि दूर के संबंधी को गोद लिया जाए, तो पूरी जाति (समाज) की ओर से पगड़ी बांधी जाती है, जो समाज की एकजुटता का प्रतीक है।
- पुनर्विवाह: समाज में प्रगतिशील सोच के तहत ‘नाता प्रथा’ (विधवा पुनर्विवाह) को भी ऐतिहासिक रूप से सम्मानजनक मान्यता प्राप्त है।
- त्यौहार: यह समाज रोशनी का पर्व दीपावली बहुत धूमधाम से मनाता है, जिसमें देवी लक्ष्मी और अपने औजारों (हथियारों) की पूजा की जाती है। नवरात्रि में माता शक्ति की आराधना और गरबा इनकी संस्कृति का अभिन्न अंग है।
ठठेरा और कंसारा समाज की कुलदेवी व खाँपें (Gotra)
यह समाज मूलतः शक्ति (माता जी) का परम उपासक है। इसके अलावा ये शिवजी और भगवान विष्णु को भी इष्ट देव के रूप में पूजते हैं। राजपूती उत्पत्ति होने के कारण, इस समाज की अधिकांश खाँपें राजपूती गोत्रों पर आधारित हैं और वे अपनी गोत्रानुसार कुलदेवियों की ही पूजा करते हैं।
इस समाज के कुछ गोत्रों के बहुत ही विशेष और अनूठे नियम हैं:
- भाटी गोत्र और आई माता: भाटी गोत्र के लोग शक्ति स्वरूपा ‘आई जी’ (आई माता) के परम भक्त होते हैं और उनका पवित्र डोरा बांधते हैं। आई माता के अनुयायी होने के कारण, मृत्यु के पश्चात् ये अपने स्वजनों को जलाते नहीं हैं, बल्कि (सिरवी समाज की तरह) सम्मानपूर्वक जमीन में समाधि देते हैं।
- भूतड़ा गोत्र: भूतड़ा गोत्र के लोग परम शक्ति ‘कालका माता’ (महाकाली) के उपासक हैं और उन्हें अपनी कुलदेवी मानते हैं।
कंसारा / ठठेरा समाज की खाँपें और गोत्रानुसार कुलदेवियाँ:
| क्र.सं. | खाँप / गोत्र (Gotra) | पैतृक कुलदेवी (Ancestral Kuldevi) | विशेष टिप्पणी |
| 1 | भाटी (Bhati) | आई माता (Aai Mata) / स्वांगिया माता | आई जी का पवित्र डोरा धारण करते हैं। |
| 2 | भूतड़ा (Bhutada) | कालका माता (Kalika Mata) | महाकाली के परम उपासक। |
| 3 | चौहान (Chauhan) | आशापुरा माता (Ashapura Mata) | शाकंभरी / महोदरी माता के रूप में। |
| 4 | परमार (Parmar) | अर्बुदा देवी / सच्चिया माता | शक्ति के उपासक। |
| 5 | राठौड़ (Rathore) | नागणेची माता (Nagnechi Mata) | मारवाड़ मूल के उपासक। |
| 6 | सोलंकी (Solanki) | क्षेमंकरी (खिंवज) माता | प्राचीन चालुक्य वंश की कुलदेवी। |
| 7 | गहलोत (Gehlot) | बाण माता (Baan Mata) | मेवाड़ मूल के उपासक। |
(नोट: इसके अतिरिक्त लुहार, सोनी और कुंभार जैसी उप-शाखाएं भी अपने-अपने पैतृक स्थानों की क्षेत्रीय देवियों की पूजा करती हैं।)
(नोट: कुलदेवियों और गोत्रों के नाम पैतृक निवास और क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। यह सूची केवल एक छोटा सा प्रयास है! यदि आपके गोत्र और आपकी कुलदेवी का नाम इस लेख में शामिल नहीं है, तो कृपया नीचे कमेंट बॉक्स में अपना गोत्र और कुलदेवी का नाम जरूर लिखें, ताकि समाज के अन्य लोगों को मदद मिल सके।
🙏 क्या आपको अपनी कुलदेवी की जानकारी नहीं है?
यदि किसी कारणवश आपको अपने गोत्र या अपनी कुलदेवी का नाम बिल्कुल नहीं पता है और परिवार या रिश्तेदारों से भी कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है, तो निराश न हों! आप हमारी विशेष गाइड 👉 मेरी कुलदेवी कौन है? को पढ़कर अपनी जड़ों और अपनी कुलदेवी को खोजने का सही रास्ता पा सकते हैं।)
निष्कर्ष
कंसारा और ठठेरा समाज केवल धातुकर्मियों का समूह नहीं है, बल्कि यह उन महान भारतीय शिल्पियों का समाज है जिन्होंने हमारी रसोई से लेकर हमारे मंदिरों तक को अपनी कला से सजाया है। आज आधुनिक मशीनों के युग में भी इस समाज ने अपनी हथौड़ी की खनक और अपने पूर्वजों की कला को जीवित रखा है। आज समाज के युवा शिक्षा, व्यापार और प्रशासन में आगे बढ़कर राष्ट्र निर्माण में अपना बहुमूल्य योगदान दे रहे हैं।


