सरयूपारीण ब्राह्मणों की उत्पत्ति
Saryuparin Brahmin Samaj in Hindi: भारतीय सनातन धर्म और वैदिक ज्ञान की रक्षा में जिन ब्राह्मण समुदायों का सर्वोच्च योगदान रहा है, उनमें सरयूपारीण ब्राह्मण (Saryupari Brahmin) का स्थान अत्यंत गौरवशाली है। मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश (गोरखपुर, काशी, अयोध्या, प्रयाग, बस्ती, आजमगढ़), बिहार और मध्य प्रदेश में निवास करने वाले ये ब्राह्मण अपनी कठोर साधन-निष्ठा, वैदिक परंपराओं और उच्च आदर्शों के लिए जाने जाते हैं।
‘मिशन कुलदेवी’ के इस विशेष लेख में हम सरयूपारीण ब्राह्मण समाज की ऐतिहासिक उत्पत्ति, भगवान श्रीराम से जुड़े उनके इतिहास, उनके 16 प्रधान गोत्रों, मूल ग्रामों और उनकी कुलदेवियों के बारे में विस्तार से जानेंगे।
सरयूपारीण ब्राह्मणों की उत्पत्ति और भगवान श्रीराम की कथा
“सरयूपारी” शब्द संस्कृत के “सरयू” (नदी) और “पारी” (पार करने वाले) से मिलकर बना है। ब्राह्मणोत्पत्ति मार्तण्ड और ब्राह्मण गोत्रावली जैसे प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, इस समाज की उत्पत्ति त्रेतायुग और भगवान श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ से जुड़ी है।
पौराणिक ऐतिहासिक कथा: जब भगवान श्रीराम रावण (जो कि एक प्रकांड विद्वान और कुलीन ब्राह्मण था) का वध करके लंका से अयोध्या लौटे, तो उन्हें ‘ब्रह्महत्या’ के दोष का भान हुआ। इस दोष के निवारण के लिए ऋषियों ने उन्हें ‘अश्वमेध यज्ञ’ करने की सलाह दी।
इस महान यज्ञ में देश भर से उद्भट विद्वान् एवं तपस्वी पधारे थे, जिनमें कन्नौज के दो महान तपस्वी ऋषि ‘कान्य’ और ‘कुब्ज’ (कान्यकुब्ज) भी शामिल थे। यज्ञ की समाप्ति पर जब भगवान राम ने ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देनी चाही, तब कुब्ज ऋषि ने विचार किया कि ब्रह्महत्या के प्रायश्चित स्वरूप दिया जा रहा यह दान ग्रहण करना उचित नहीं है। धर्म और तपस्या की रक्षा के लिए कुब्ज ऋषि और उनके अनुयायी कई अन्य ब्राह्मण, दान-दक्षिणा लेने के भय से चुपचाप अयोध्या से सरयू नदी पार कर के उत्तर दिशा (सारब देश) की ओर चले गए।
सरव्याश्चोत्तरे देशे ये गताश्च द्विजोत्तमाः। सरयू ब्राह्मणास्ते वै संजाता नामभिः किल ।।
(अर्थात्: सरयू नदी पार कर उत्तर दिशा में जाने वाले उन परम तपस्वी ब्राह्मणों को ही ‘सरवरिये’ या ‘सरयूपारीण’ ब्राह्मण कहा गया।)
लोकव्यवहार में सरयूनदी के उत्तर दिशा वाले किनारे को सारब कहते हैं। इसलिए वहाँ उत्पन्न हुए ब्राह्मणों को सारब या सरयूपारी कहा जाता है। मत्स्य पुराण के अनुसार-
अयोध्या दक्षिणे यस्याः सरयूतटगः पुनः । सारवीवार देशोंऽयं गौडास्तदनुकीर्तिताः ॥
समाज की एक कठोर और अनूठी परंपरा: अपने उच्च आदर्शों के कारण, ये ब्राह्मण जिस गाँव में अपनी बेटी का विवाह करते हैं, उस गाँव का पानी तक नहीं पीते और न ही उस गाँव से अपने बेटे के लिए बेटी लेते हैं।
सरयूपारी ब्राह्मणों के गोत्र-
सरयूपारी ब्राह्मणों के गोत्र निम्न प्रकार से हैं-
(1) गर्ग, (2) गौतम, (3) शण्डिल्य, (4) पराशर, (5) सावर्णि, (6) काश्यप, (7) वत्स, (8) भारद्वाज, (9) कौशिक, (10) उपमन्यु, (11) वशिष्ठ, ( 12 ) गार्ग्य, ( 13 ) कात्यायन, (14) घृत कौशिक, ( 15 ) गर्दभीमुख, (16) भृगु, ( 17 ) भार्गव, (18) अगस्त्य, (19) कौण्डिन्य आदि ।
सरयूपारीण ब्राह्मणों का वर्गीकरण (श्रेणियां)
सरयूपारीण ब्राह्मण समाज में मुख्य रूप से तीन श्रेणियां मानी जाती हैं। (ध्यान दें: यह वर्गीकरण केवल पहचान और सम्बोधन के लिए है)।
- त्रिकुल (प्रथम श्रेणी): गर्ग, गौतम और शाण्डिल्य— इन तीन कुलों (गोत्रों) की संतति त्रिकुल या प्रथम श्रेणी में गिनी जाती है, जिनका मूल गोत्र एक ही ऋषि की परंपरा से चलता आ रहा है।
- त्रयोदश कुल (द्वितीय श्रेणी): इनमें 13 मुख्य स्थान (ग्राम) शामिल हैं— पयासी, समुदार, धर्मपुरा, चौरा कांचनी, गुर्दवान, बृहदग्राम, माला, पाला, पीण्डी, नागचोरी, इटाये, त्रिफला तथा इटिया। (ये वे वंश हैं जिनमें ऐतिहासिक रूप से अन्य ऋषि गोत्रीय बालकों को गोद लेने या द्वामुष्यायण की परंपरा रही है)।
- तृतीय श्रेणी: अगस्त्य, कौन्डन्य, पराशर, वशिष्ठ, भार्ग, कात्यायन, गार्ग्य, उपमन्यु, कौशिक तथा भृगु आदि गोत्रों वाले ब्राह्मण तीसरी श्रेणी में आते हैं। इनके मूल स्थान खोरिया, अगस्त्पार, नैपुरा, सोनोरा, कुसौरा आदि हैं।
विशेष श्रेणी – पंक्ति पावन ब्राह्मण: सरयूपारीण समाज में एक अत्यंत उच्च श्रेणी ‘पंक्ति पावन’ ब्राह्मणों की है। ये वेद-वेदांत के प्रकांड विद्वान, छहों अंगों के ज्ञाता, विनयी और सादगीपूर्ण योगी होते हैं। इनकी उपस्थिति मात्र से ही दूषित पंक्ति (सभा) भी पवित्र हो जाती है।
उपनाम (उपाधियां) और उनके मूल ग्राम
सरयूपारीण समाज में ब्राह्मणों के उपनाम (Surname) अक्सर उनके मूल ग्राम से जुड़े होते हैं:
- मिश्र: वयसी, मधुवनी, मार्जनी, धरमा, भरसी, पयासी आदि ग्रामों के ब्राह्मण।
- द्विवेदी / त्रिवेदी: सरया, सोहगौरा, धतुरा, गुरौली, पाला, पिण्डी, नदौली, खैरा आदि ग्रामों के ब्राह्मण। (काचंनी, गुर्दवान्, मीठावेल, समुदार के ब्राह्मण भी द्विवेदी कहलाते हैं)।
- पाण्डेय: इटिया, माला, नागचौरी, हस्तग्राम, त्रिफला, अगस्तपार आदि ग्रामों के ब्राह्मण।
- चतुर्वेदी (चौबे): नेपुरा, पिपरासी, सोनवर्ष आदि गांव के ब्राह्मण।
- पाठक: सोनार (सोनौरा) गांव के ब्राह्मण।
- उपाध्याय: खोदिया, लखिमा, पकड़ी, बरौली आदि गांव के ब्राह्मण।
- ओझा: करेली, ककुवा, रजौली, खैरी गांव के ब्राह्मण।
सरयूपारीण ब्राह्मण समाज की कुछ अनूठी ऐतिहासिक कथाएं व विशेषताएं
सरयूपारीण समाज के विभिन्न गोत्रों और ग्रामों से जुड़ी कुछ बहुत ही रोचक और ऐतिहासिक मान्यताएं हैं, जो इस समाज की जड़ों को और भी गहरा बनाती हैं:
1. शाण्डिल्य गोत्र (सरार ग्राम) और मित्रता की महान मिसाल: इतिहास के अनुसार, सरार गांव (ताप्ती नदी के किनारे) में एक बार एक भयंकर महामारी के कारण एक परिवार लगभग समाप्त हो गया था। केवल एक गर्भवती स्त्री जो मायके में थी, बच गई। उसके पुत्र को जब अपने मूल गांव का पता चला, तो वह अपने एक ग्वाले (Gwala) मित्र के साथ सरार गांव आया। अपनी पितृभूमि को देखकर वह बालक इतना भावुक हुआ कि उसने वहीं प्राण त्यागने का निश्चय किया। उसे बचाने के लिए और मित्र धर्म निभाने के लिए, उस ग्वाले मित्र ने अपने प्राणों का महान बलिदान दे दिया। जब गांव वालों ने उस ब्राह्मण बालक को उसके पूर्वजों की जमीन सौंपी, तो उसका नाम ‘धरणीधर’ रखा गया। आज भी उस बालक के वंशज अपने नाम के साथ ‘धर’ लगाते हैं, और उनके कुल में उस महान मित्र (साधु नामक ग्वाले) की बड़े सम्मान से पूजा होती है।
2. उपनामों (Suffixes) की उत्पत्ति: समाज में राम, कृष्ण, नाथ और मणि जैसे शब्दों का प्रयोग पूर्वजों के सम्मान में शुरू हुआ। मान्यता है कि गौरक्षा नामक एक ब्राह्मण के चार पुत्र थे— राम, कृष्ण, नाथ और मणि। ये जहाँ-जहाँ जाकर बसे, उनके वंशजों ने उनका नाम अपना लिया। उदाहरण के लिए— सरार गांव के वंशज ‘राम’ लगाते हैं, सोहगौरा के वंशज ‘कृष्ण’, धतुरा के ब्राह्मण ‘मणि’, और चेतिया ग्राम के वंशज ‘नाथ’ लगाते हैं। इसी तरह नदौली ग्राम के नन्ददत्त के वंशज ‘नाथ’ लगाते हैं, जबकि पिण्डी ग्राम वासी अपने नाम के अंत में ‘पति’ (Sabhapati/Sukhapati) लगाते हैं। हालांकि शास्त्रीय ग्रंथों में इनका उल्लेख कम मिलता है, लेकिन लोक-परंपरा में इन नामों का बहुत महत्व है।
3. ‘पिण्डी’ ग्राम का नामकरण: पिण्डी ग्राम का इतिहास बहुत ही रोचक है। किंवदंती है कि एक बार गौतम गोत्र के एक ‘पंक्ति पावन’ (परम पवित्र) ब्राह्मण ने सभापति नामक व्यक्ति के हाथ से पानी में सानी हुई सत्तू की ‘पिण्डी’ (सत्तू का गोला) ग्रहण कर ली थी। उनके इस स्नेह और स्वीकार्यता के कारण उन्हें पंक्ति में मिला लिया गया, और उसी दिन से उस स्थान का नाम ‘पिण्डी’ ग्राम पड़ गया।
4. गर्दभीमुख गोत्र की प्राचीनता: गर्दभीमुख नाम के पांच गोत्रकार ऋषि अलग-अलग समय में विभिन्न प्राचीन वंशों में उत्पन्न हुए हैं— भृगुवंश, वशिष्ठ वंश, विश्वामित्र वंश, अंगिरस वंश और कश्यप वंश। इसी महान ऋषि परंपरा के कारण सरयूपारीण समाज में गर्दभीमुख गोत्र का एक विशिष्ट और ऐतिहासिक स्थान है।
गोत्र और विवाह के विशेष नियम (वैवाहिक शुद्धता)
सरयूपारीण ब्राह्मण समाज अपनी वैवाहिक परंपराओं और ‘गोत्र-प्रवर’ के नियमों का बहुत ही गहराई, शुद्धता और सावधानी से पालन करता है। विवाह संबंध तय करते समय इन 9 विशेष और कठोर नियमों का पालन किया जाता है:
विशिष्ट वर्जनाएं: माण्डव्य, दर्भ और रैवत गोत्रों के साथ भृगु और जमदग्नादि गोत्रों का विवाह संबंध नहीं होता है।
ग्राम का नियम: ये जिस गांव में अपनी बेटी की शादी करते हैं, उस गांव में अपने बेटे की शादी नहीं करते।
गोत्र निर्णय: विवाह संबंध तय करने में ये गोत्र और प्रवर के निर्णय में अत्यंत सावधान रहते हैं।
समान प्रवर वर्जित: यदि गोत्र भिन्न हो, लेकिन उनका ‘प्रवर’ समान हो, तो विवाह वर्जित माना जाता है। (जैसे- शाण्डिल्य, कश्यप और गर्दभीमुख के गोत्र भिन्न-भिन्न हैं, किन्तु प्रवर समान होने से इनमें परस्पर विवाह संबंध वर्जित है)।
सगोत्र का नियम: अंगिरस और भृगु वंश के सिवा, अगर एक भी प्रवर ऋषि (प्रवरर्षि) समान दिख पड़े, तो उसे ‘सगोत्र’ माना जाता है और विवाह नहीं किया जाता।
भारद्वाज समूह: भरद्वाज, गर्ग, रौक्षायण और और्व— ये चारों ‘भारद्वाज’ कहे जाते हैं। इसलिए इनका परस्पर विवाह संबंध नहीं होता है।
अंगिरस पक्ष: हारित, संकृति, कण्व, रथीतर, मुद्गल, विष्णु और वृद्ध— ये छह ऋषि अंगिरस पक्ष के माने जाते हैं। इसलिए इनमें भी परस्पर विवाह संबंध वर्जित है।
भृगु पक्ष (भार्गव): वितहव्य, मिश्रयु, शुनक तथा वेणु— ये चार ऋषि भृगु पक्ष के होने से ‘भार्गव’ कहलाते हैं। इनका भी परस्पर विवाह वर्जित है।
पंच प्रवर की समानता: भृगु, सावर्णि और वत्स गोत्रों के पंच प्रवर (भार्गव, च्यवन, आप्लवान, और्व और जामदग्न्य) एक समान हैं। इसलिए इनका भी परस्पर विवाह संबंध पूरी तरह वर्जित है।
सरयू पारीण ब्राह्मणों के गोत्र प्रवरादि
1. गर्ग
- आस्पद – शुक्ल
- प्रवर – आंगिरस, वार्हस्पत्य, भारद्वाज, श्येन, गार्ग्य
- शाखा– माध्यनन्दिनीय
- सूत्र– कात्यायन
- उपदेश – धनुर्वेद
- शिखा – दाहिनी
- पाद-दक्षिण
- उपास्य देव – शिव
- मूल स्थान – भेड़ी, मामखोर, बकरुआ, करज्जही, कनइल, मझगवां, महसो, बरेही,करहुचिया,लखनौरा, पां:तेय, महलियार, असौंजा, नगहरा, शुक्लपुरा अपांगते है।
गार्ग्य और गार्गेय भी इसी के अंतर्गत हैं। इन गांवों के भी कई भेद हो गये हैं। जैसे –
- मामखोर से- सीयर, खखाइचखोर, सरांव, रुदाइन, परसा, भण्टोली, छोटा सोरांव, कनइल, तलहा आदि ।
- महसों से- मुडेरा, बकैना, बसौढ़ी, कटारि, झौवा, रुद्रपुर, अकौलिया, खोरीपाकर, गोपालपुर, मेहरा, सिलहटाह आदि ।
2. गौतम
- आस्पद- मिश्र, द्विवेदी
- वेद- यजुर्वेद शाखा – माध्यन्दिन
- सूत्र- कात्यायन
- उपवेद – धनुर्वेद
- शिखा- दक्षिण
- पाद – दक्षिण
- उपास्य देव – शिव
- प्रवर- अंगिरस, वार्हस्पत्य, गौतम
- मूल स्थान- मिश्र वंश का बइसी, कारौडीह, मधुबनी, मटियारी, पिपरा, भर्सी, भउडीह, ममया, रापतपुर, जिगिना आदि । ,
द्विवेदी लोगों का मूल गांव बरपार, सहुवा, बडयापार, गोपालपुर, गड़री, रजहटा, कांचनी, गुर्दवान, धनौली, मझौरा तथा पटियारी ।
3. शाण्डिल्य
इनके दो भेद 1. श्री मुख, 2. गर्धमुख
- आस्पद – तिवारी
- वेद – सामवेद
- शाखा- कौथुमी
- सूत्र – गोभिल
- उपवेद – गन्धर्व
- शिखा – वाम
- पाद – वाम
- छन्द – जगती
- उपास्य देव – विष्णु
- प्रवर- शाण्डिल्य, असित, कश्यप
4. श्रीमुख शाण्डिल्य
गोरखपुर में सरयां, सौहगौरा, झुड़िया, देउरवा, मलुवा, सिरजम, धानी, सोपरी, चेतिया और परतावल।इन गांवों के तिवारी परिवार में पंक्ति भेद है। इनके नाम के साथ राम, कृष्ण, नाथ तथा मणि शब्द लगाते हैं।
सरसा, सोहगौरा, उनवलिया, अतरौली, रुद्रपुर, झड़िया, बहुवारी आदि के निवासी अपने नाम के साथ मणि शब्द लगाते हैं।
निम्नलिखित गांवों में भी शाण्डिल्य गोत्री तिवारी मिलते हैं, किन्तु इनका प्रवर भिन्न है।
कदहा, गोपीकान्ध, यंगेरा और घोड़नर के तिवारी लोगों का गोत्र तो शाण्डिल्य है, किन्तु प्रवर शाण्डिल्य, कौलव तथा बाल्मीक है।
देउरिया, खोरभा, गानौरा, नेवास, नकौझा, बुढ़ियावारी, धतुरा, पाला, सेमरी, चौरा, गुरौली, हथियामरास के तिवारी लोगों का प्रवर शाण्डिल्य, असित एवं कश्यप है।
5. गर्धमुख शाण्डिल्य
- आस्पद – तिवारी
- गोत्र – शाण्डिल्य
- प्रवर– शाण्डिल्य, असित, देवल
- वेद – सामवेद
- उपवेद – गान्धर्व वेद
- शाखा- कौथुमी
- सूत्र – गोमिल
- शिखा -वाम
- पाद – वाम
- छन्द– जगती
- देवता – विष्णु
इनका आदि स्थान नदौली कहा जाता है। यहीं से पिण्डी स्थान भी सम्बन्ध है । अन्तर केवल इतना है कि नदौली के लोग ‘नाथ’ शब्दान्त तथा पिण्डी के ‘पति’ शब्दान्त नामों से कहे जाते हैं। इसी गोत्र में कीलपुर के दीक्षित लोग भी हैं, किन्तु उनमें पंक्ति नहीं है।
6. पराशर
- आस्पद- पाण्डेय, उपाध्याय तथा शुक्ल
- प्रवर- शक्ति, पराशर, वशिष्ठ
- मूल स्थान- सिलावट, वामपुरा, धमौली, सोहनहार गांवों में पाण्डेय हैं । धनैती, नदुवा, चौखरी गांवों में उपाध्याय हैं। परसा, बूढ़ा, परहसा, कन्तित तथा नगवा बरौछा में शुक्ल लोग रहते हैं।
7. भारद्वाज
- आस्पद-द्विवेदी, पाण्डेय, चतुर्वेदी, पाठक, उपाध्याय
- वेद-यजुर्वेद
- उपवेद- धनुर्वेद
- शाखा- माध्यन्दिनीय, कात्यायन
- शिखा- दाहिनी ओर
- पाद – दाहिनी ओर
- देवता – शिव
- प्रवर- अंगिरस, वार्हस्पत्य, भारद्वाज
- मूल गांव- द्विवेदी-बड़गों, शरारि, बड़या, रमवापुर, बदगदी, मझौंवा, जलालपुर, बड़मैया, पटवारियां, मुडवरिया आदि ग्रामों को अपना मुख्य स्थान मानते हैं।
- पाण्डेय लोगों में- सिसवां, पुरैना तथा कौसड़-ये मचैयां के अन्तर्गत हैं। बलुवा, बाबू मठियारी तथा पगड़ों के लोग अध्वर्यु (अधुर्य) अधुर्य कहे जाते हैं। बलुवा बाबू और मंलौली में इसी गोत्र के चतुर्वेदी भी हैं।
8. कश्यप
- वेद – सामवेद
- उपवेद – गन्धर्व वेद
- शाखा- कौथुमी
- सूत्र – गोमिल
- पाद – वाम
- शिखा- वाम
- उपास्यदेव- शिव
- प्रवर-कश्यप, असित, देवल
- आस्पद – पाण्डेय, द्विवेदी, चौबे, मिश्र, ओझा, उपाध्याय
- मूल गांव- पाण्डेय – त्रिफला, बनगांव, फरेदा, जगदीशपुर, नाथपुर, बिसनैया, गौरा तथा नदुला में अधिकांश पाण्डेय लोगों की आबादी है। द्विवेदी-काश्जनी (परवा कन्तित) में दुबे लोग हैं।
- चौबे – सोनवर्ष, विष्णुपुर में चौबे लोग हैं।
- उपाध्याय – पकड़ी, बरौली तथा भरसांड
- मिश्र – राढ़ी, मिश्रोलिया, परमेश्वरपुर तथा रभौली में भारद्वाज गोत्री मिश्र लोग मिलते हैं।
- पाठक- सोनौरा
9. अत्रि (कृष्णात्रि गोत्र )
- वेद – ऋग्वेद
- उपवेद – आयुर्वेद
- शाखा- शाकल्य
- सूत्र – आश्रयलायन
- प्रवर- अर्चि, अचनिनस, श्यावाश्र
- शिखा- वाम
- पाद – वाम
- आस्पद- दुबे, शुक्ल
- उपास्यदेव – ब्रह्मा
- मूल गांव- डुमरीगंज तहसील में डुमरिया के दुबे लोग तथा पिछौरासत्यकर कन्तित में शुक्ल लोग मिलते हैं।
10. वत्स गोत्र
- वेद- सामवेद
- उपवेद – गन्धर्व
- शाखा- कौथुमी
- सूत्र – गोभिल
- पाद – वाम
- शिखा- वाम
- उपास्यदेव – विष्णु
- प्रवर- वत्स, च्यवन, आप्लवान, और्व एवं जामदग्न्य 5 प्रवर होते हैं ।
- आस्पद- पाण्डेय, दुबे, मिश्र, तिवारी, ओझा लोग मिलते हैं।
- मूल गांव- पाण्डेय-नागचौरी, बेलवा, सोनफेरवा, वनहा, परसिया तथा बिठौला में मिलते हैं ।
- द्विवेदी- ये सनदरिया, भरौली, बकुलारी तथा विमटी में मिलते हैं ।
- मिश्र- ये मुख्यतः पयासी, रतनमाला, नरगहा, बनकटा, करिहैया, मणिकटा, वाना, बेलौरा तथा टोगारि में मिलते हैं। पयासी में रतनमाला, भरवलिया, गोपालपुर, बीजापुर, जिगना, भिटह, छपिया, बिजरा, कतरारी, बैरिया, परसिया, भुड़िसा तथा रानीपुरी हैं।
- बनवटा या नगरहा में- अघैला, सुखई, तिलकपुर, सलेमपुर, रेवली तथा चैनपुर आते हैं ।
- करिहैयां में- करिहांव, दियावती तथा मेंहदावल हैं।
- मणिकढ़ा से – खुदिया, बघौरा, चिमखा तथा बैनुवा हैं।
- गाना में –गाना, त्योंठा, बरवरिया, बैरिया तथा चकहदा सम्मिलित हैं।
- बेलोरा में- पानन, चिनरवा, बंघोरा, मझौलिया, सुलजामपुर तथा पकरिया सम्मिलित हैं।
- तिवारी – फूदा गाजर, धुरियामार, बिरई तथा पोहिला में इस गोत्र के तिवारी रहते हैं।
- ओझा – ककुवा, रजौली तथा खैरी में वत्स गोत्री ओझा लोग रहते हैं ।
11. वात्स्यायन गोत्र
- वेद- यजुर्वेद
- शाखा- माध्यन्दि
- सूत्र- कात्यायन
- पाद- दक्षिण
- शिखा- दक्षिण
- उपास्यदेव- शिव
- प्रवर- विश्वामित्र, किल, कात्यायन
- आस्पद- चौबे
- मूल गांव- नैपुरा, कुसौरा
12. सांकृत गोत्र
- वेद- यजुर्वेद
- शिखा- दक्षिण
- शाखा – माध्यन्दिन
- पाद – दक्षिण
- सूत्र – कात्यायन
- उपास्य देव – शिव
- प्रवर- सांकृत, सांख्यायन, मिश्र
- आस्पद – पाण्डेय, तिवारी, चौबे
- मूल गांव-
- पाण्डेय – मलांव में पाण्डेय लोग मिलते हैं ।
- तिवारी – नाउरदेउर, मिलौर सरया
- चौबे- भभुआ पार, नगवा, उनबलि, देउगर, सरसैया, तेलियाडीह तथा सिधैया में मुख्य रूप से चौबे लोग मिलते हैं।
13. सावर्ण्य गोत्र
- वेद- सामवेद
- उपवेद – गान्धर्व वेद
- शाखा- कौथुमी
- सूत्र – गोभिल
- शिखा– वाम
- पाद- वाम
- प्रवर – भार्गव, च्यवन, आप्रवाल, और्व, सावर्ण्य
- आस्पद – मिश्र, पाण्डेय
- देव – विष्णु
- मूल गांव-
- पाण्डेय – इटारि, रैकहट, पट्टीदिलीपपुर, वंशीधरपुरवा, मझगंवा, चारपानि, लसेहरी, साहुकोल तथा भसमा ये मूल स्थान हैं। सखरुआ, इमली डांड, भरोसा के परखपाण्डे, इन्द्रपुर, वारघाट, भट्टाचारी तथा टिकरा के पाण्डे भी इसी गोत्र के हैं ।
- मिश्र – सिसैया के मिश्र भी इसी गोत्र के हैं।
14. भार्गव
- वेद- सामवेद
- उपवेद – गान्धर्व वेद
- शाखा- कौथुमी
- सूत्र – गोभिल उपास्य
- देव – विष्णु
- शिखा- वाम
- पाद- वाम
- आस्पद- तिवारी
- प्रवर- भार्गव, च्यवन, आप्लवान, और्व, जामदग्न्य 5 प्रवर
- मूल गांव- भार्गवपुर, मदनपुर, सोढ़ा चक्र सिंहन जोरी, रखुआ खोर तथा चर्नार इनके मुख्य स्थान हैं।
15. उपमन्यु गोत्र
- वेद- यजुर्वेद
- उपवेद – धनुर्वेद
- शाखा- माध्यन्दिनीय
- सूत्र- कात्यायन उपास्य
- देव- शिव
- शिखा- दक्षिण
- पाद- दक्षिण
- आस्पद- ओझा, पाठक
- प्रवर- वशिष्ठ, इन्द्रप्रमद तथा उपमन्यु
- मूल गांव-
- ओझा- करैली, ओझवली, अजांप तथा मलांव इनके मुख्य स्थान हैं।
- पाठक – मगदरिया में इसी गोत्र के पाठक मिलते हैं।
16. वशिष्ठ गोत्र
- वेद- यजुर्वेद
- उपवेद- धनुर्वेद
- शाखा- माध्यन्दिनीय
- सूत्र- कात्यायन
- प्रवर- वशिष्ठ, शक्ति, पराशर
- उपास्य देव- शिव
- शिखा- दक्षिण
- पाद- दक्षिण
- आस्पद- तिवारी, पाण्डे, मिश्र, चौबे
- मूल स्थान–
- मार्जनी तथा वट्टापुर गांवों मे मिश्र लोग रहते हैं।
- मणिकण्ठवंकिवा तथा हरिना में तिवारी लोग इसी गोत्र के हैं।
- नार्जनी में चौबे |
- अम्बा, कोहड़ा गांव के पाण्डेय लोग वशिष्ठ गोत्री हैं।
17. घृतकौशिक
- वेद- यजुर्वेद
- उपवेद- धनुर्वेद
- शाखा- माध्यन्दिनीय
- सूत्र- कात्यायन
- प्रवर- विश्वामित्र, कौशिक, घृतकौशिक
- शिखा- दक्षिण
- पाद- दक्षिण
- उपास्य देव- शिव
- आस्पद- मिश्र
- मूल गांव- धर्मपुरा, लगुनहीं, हरदिया, मझौना तथा कुशहरा इनके मूल स्थान हैं।
18. कौशिक गोत्र
- वेद – यजुर्वेद
- उपवेद – धनुर्वेद
- शाखा- माध्यन्दिनीय
- सूत्र- कात्यायन
- प्रवर – विश्वामित्र, कौशिक तथा अघमर्षण
- शिखा- दक्षिण
- पाद – दक्षिण
- आस्पद – मिश्र, दुबे
- उपास्य देव – शिव
- मूल गांव-
- द्विवेदी-मीठवेल, ब्रह्मपुर ।
- मिश्र- सुगौटी।
19. कुशिक
- वेद – यजुर्वेद
- उपवेद – धनुर्वेद
- शाखा- माध्यन्दिनीय
- सूत्र – कात्यायन प्रवर विश्वामित्र, कौशिक, अघमर्षण
- उपास्य देव – शिव
- आस्पद- चौबे
- शिखा- दक्षिण
- पाद- दक्षिण
- मूल गांव- अलीनगर तथा हरगढ़
20. कौण्डिन्य
- वेद- अथर्ववेद
- उपवेद – स्थापत्य वेद
- शाखा- शौनकी
- सूत्र- बोधायन
- शिखा- दक्षिण
- पाद- वाम
- प्रवर- वशिष्ठ, मित्रावरुण, कौण्डिन्य
- उपास्य देव- इन्द्र
- आस्पद- मिश्र और पाण्डेय
- मूल गांव –
- मिश्र- बभनौली, नगरहा।
- पाण्डेय- पलामू, बेलौजा।
सरयू पारीण ब्राह्मणों में उपरोक्त गोत्रों के अतिरिक्त भी गोत्र मिलते हैं।
नाम गोत्र उत्तर भारतीय ब्राह्मण गोत्र शासनावली 183 चन्द्रायण आस्पद ग्राम वरतन्तु कश्यप पाण्डेय 1. 2. 3. त्रिपाठी वेलौंजा 4. धर्महरि दुबे सिंगेला कण्व निरौली दुबे सरयू पारीण ब्राह्मणों के गोत्र का और भी विस्तार है।
सरयूपारीण ब्राह्मण समाज की कुलदेवी (Kuldevi)
प्रत्येक ब्राह्मण समाज की तरह सरयूपारीण ब्राह्मणों में भी अपने गोत्र और ऋषि परंपरा के अनुसार कुलदेवी और इष्टदेवी की उपासना का विशेष विधान है। चूँकि इस समाज का विस्तार बहुत बड़ा है और उपनामों (मिश्र, पांडे, तिवारी आदि) के साथ-साथ उनके मूल ग्राम (Mool Gram) भी अलग-अलग हैं, इसलिए स्थान और गोत्र के अनुसार कुलदेवियों के स्वरूप में भिन्नता पाई जाती है। (उदाहरण के लिए: कई भारद्वाज गोत्रीय ब्राह्मण माता शाकंभरी या सरस्वती की पूजा करते हैं, वहीं गौतम और कश्यप गोत्र के लोग माँ विंध्यवासिनी या चामुंडा को अपनी कुलदेवी मानते हैं।)
चूँकि सरयूपारीण ब्राह्मण समाज की गोत्रानुसार कुलदेवियों की संपूर्ण और सटीक सूची अभी तक डिजिटल रूप में संकलित नहीं हो पाई है, इसलिए ‘मिशन कुलदेवी’ समाज के सभी प्रबुद्ध पाठकों से एक विशेष आग्रह करता है:
(यदि आप सरयूपारीण ब्राह्मण समाज से हैं, तो कृपया नीचे कमेंट बॉक्स में अपना गोत्र, अपना उपनाम (मिश्र, चौबे, तिवारी आदि), अपना मूल ग्राम और अपनी कुलदेवी नाम जरूर लिखें। आपके द्वारा साझा की गई यह एक छोटी सी जानकारी आने वाली पीढ़ियों को उनकी जड़ों से जोड़ने और सरयूपारीण समाज की कुलदेवियों के इस ऐतिहासिक संकलन को पूरा करने में बहुत बड़ी मदद करेगी। जय परशुराम!)
🙏 क्या आपको अपनी कुलदेवी की जानकारी नहीं है? यदि किसी कारणवश आपको अपने गोत्र व अपनी कुलदेवी का नाम बिल्कुल नहीं पता है और परिवार या रिश्तेदारों से भी कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है, तो निराश न हों! आप हमारी विशेष गाइड 👉 मेरी कुलदेवी कौन है? को पढ़कर अपनी कुलदेवी को खोजने का सही रास्ता पा सकते हैं।



महिषासुर मर्दिनी माता की जय।
सतीश कुमार तिवारी(त्रिपाठी)
श्रीमुख शांडिल्य गोत्र
सौहगौरा गांव गोरखपुर से
कुल देवी दुर्गा जी,घमसा माता
Bhai aap ki jankari bahut hi adhuri hai bahut padhne ki jarurat hai,ham mahasuriya Pandey hain aur itar,itiya,atraila sabhi ke man hain,
Sath hi atraila,itar aur itya baki sabhi ke man hain samjhe,sath hi ham teen ke bhi man hain garg, Gautam aur urmaliya aate hain teen me aap ko 3 aur 13 ka bhi adhura Gyan hai.
मंसुरिया के पाण्डेय को मैं जानता हूं, लेकिन ये लोग सरयूपारी ब्राह्मणों में नहीं आते हैं। ये लोग अपने गोत्र को चंद्रात्रय बताते हैं। झारखंड और मध्य प्रदेश में आंशिक रूप से पाये जाते हैं। झारखंड में गढ़वा जिले में और मध्य प्रदेश के सीधी तथा रीवा जिले में, उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में आंशिक रूप से चंद्रात्रय गोत्र के पाण्डेय एवं चौबे पाये जाते हैं।ये लोग सरयूपारी ब्राह्मणों में नहीं आते। सरयूपारी और कान्यकुब्ज ब्राह्मणों में शादी संबंध करने से सरयूपारी नहीं हो सकते।
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Maharaj hum Chandrayan gotra k Chaturvedi hain Lekin is gotra ki Jaankari prapat ni ho paa ri hai.
मै औदीच्य सहस्त्र झालावाडी ब्राह्मण हु, ( गोत्र गौतम है, अवंटक दवे, यजुर्वेद मध्यंदिनी शाखा त्रि प्रवर) औदीच्य ब्राह्मण का इतिहास वि. स 950 से माना जाता है उससे पहले हम सब औदीच्य उत्तर भारत मे निवासित थे, तब हम कान्यकुब्ज, सरयुपारी किस प्रकार के ब्राह्मण थे और कोनसा मूल स्थल था वह कैसे पता करे?
कुल देवी- दुर्गा माँ
कुल देवता- नाग देवता
गोत्र- सावर्ण गोत्र (सरयूपारिण)
प्रवर – पाँच
Hum log sankrit gotra ke hain aur kul devi phool mati Mata ko mante hain