Bhaat Charan Samaj in Hindi: राजस्थान और गुजरात के इतिहास में शौर्य, स्वाभिमान, कला और साहित्य को जीवित रखने का सबसे बड़ा श्रेय मुख्य रूप से दो जातियों को जाता है— ‘चारण’ और ‘भाट’। लेकिन इतिहास के पन्नों में इन दोनों महान जातियों के संगम से एक और विशिष्ट और कलात्मक समाज का निर्माण हुआ, जिसे ‘भाट चारण’ (Bhaat Charan) समाज कहा जाता है।
‘मिशन कुलदेवी’ के इस विशेष लेख में हम डॉ. कैलाशनाथ व्यास व देवेंद्रसिंह गहलोत द्वारा रचित प्रसिद्ध पुस्तक ‘राजस्थान की जातियों का सामाजिक एवं आर्थिक जीवन’ के आधार पर ‘भाट चारण’ समाज की उत्पत्ति, उनकी एक बेहद रोचक ऐतिहासिक कथा और उनकी परंपराओं के बारे में विस्तार से जानेंगे।
भाट चारण समाज का परिचय
‘भाट चारण’ जाति मूल रूप से भाट और चारण दोनों से भिन्न एक स्वतंत्र पहचान रखती है। यह समाज इन दोनों जातियों के श्रेष्ठ गुणों (साहित्य, संगीत और निर्भीकता) के मिश्रण से बना है। इनके रीति-रिवाज, परंपराएं और जीवनशैली काफी हद तक भाटों और चारणों के समान ही होते हैं।
भाट चारण समाज की उत्पत्ति: संगीत, स्वाभिमान और चमत्कार की कथा
इस समाज की उत्पत्ति के पीछे गुजरात के सोलंकी शासक सिद्धराज जयसिंह के दरबार से जुड़ी एक बहुत ही रोचक और ऐतिहासिक कथा है:
स्वाभिमान का निर्णय: कहा जाता है कि गुजरात के भुज क्षेत्र में ‘माऊल बरसडा’ गोत्र के एक बहुत ही सिद्ध चारण रहते थे। उनकी 9 कन्याएं (पुत्रियां) थीं। एक बार वे अपनी पुत्रियों के साथ गुजरात के प्रतापी शासक सिद्धराज जयसिंह के दरबार में गए। वहाँ दरबार में चारण जाति के स्वाभिमान को लेकर कुछ ऐसी परिस्थितियां बनीं जिससे उन स्वाभिमानी कन्याओं को ठेस पहुँची। उन्होंने अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए चारण जाति से बाहर विवाह करने का एक दृढ़ संकल्प लिया।
संगीत की ऐतिहासिक प्रतियोगिता: उन्हीं दिनों दरबार में ‘मालवान भाट’ नाम के एक अत्यंत श्रेष्ठ और चमत्कारी गीतकार थे। उनकी कला इतनी सिद्ध थी कि वे अपने गीतों की वाहवाही (प्रशंसा) एक छः महीने के शिशु के मुख से भी करवा लिया करते थे। मालवान भाट की इस विद्या से चारणों की कला को चुनौती मिल रही थी।
तब चारण समाज ने माऊल बरसडा से सहायता माँगी, जो परम शक्ति ‘भैरव’ के उपासक थे। माऊल ने अपने इष्ट देव भैरव से विनय की कि वे उनकी कला की लाज रखें। भैरव जी ने उन्हें वचन दिया। तब माऊल ने सिद्धराज जयसिंह के दरबार में घोषणा की कि— “यदि मालवान भाट एक शिशु से वाहवाही करा सकते हैं, तो मैं अपनी कला और इष्ट के प्रताप से एक ‘खाली घड़े’ से वाहवाही करवा दूँगा।”
दरबार में एक खाली घड़ा रखा गया। जैसे ही माऊल ने अपने रचे हुए ओजस्वी गीत सुनाने शुरू किए, उस खाली घड़े के भीतर से स्वतः ही ‘वाह-वाह’ के स्वर गूंजने लगे। इस अद्भुत चमत्कार के आगे मालवान भाट की हार हुई।
कला का सम्मान और भाट-चारण वंश की नींव: अपनी हार से क्रोधित होकर मालवान भाट एक रात माऊल बरसडा से सामना करने (बदला लेने) उनके घर गए। लेकिन जैसे ही वे घर के समीप पहुँचे, उन्होंने सुना कि माऊल अपनी पत्नी से मालवान भाट की कला की भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे थे। माऊल कह रहे थे कि “मालवान भाट को हराना कोई मामूली बात नहीं थी, वह सचमुच एक महान और बेजोड़ गीतकार है।”
अपने प्रतिद्वंद्वी के मुख से अपनी कला का यह सच्चा सम्मान सुनकर मालवान भाट का क्रोध शांत हो गया और उनका हृदय आदर से भर गया। वे तुरंत माऊल के सामने गए और अपनी हार स्वीकार करते हुए अपने आने का सही कारण (क्रोध) निर्भीकता से बता दिया। माऊल बरसडा मालवान भाट की इस सच्चाई, कला और निर्भीकता से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने अपनी एक पुत्री का विवाह मालवान भाट के साथ कर दिया।
इन्हीं महान चारण कन्या और श्रेष्ठ मालवान भाट के वंशज आगे चलकर ‘भाट चारण’ कहलाए। यह समाज आज भी अपने पूर्वजों की सच्चाई, कला और इष्ट-भक्ति के लिए जाना जाता है।
भाट चारण समाज की कुलदेवी व इष्ट देव (Kuldevi)
चूँकि भाट चारण समाज की उत्पत्ति चारण और भाट जातियों के संगम से हुई है, इसलिए इस समाज में शक्ति-उपासना (माता जी की भक्ति) और भैरव उपासना का सर्वोच्च स्थान है। इनकी गोत्र और पैतृक निवास के अनुसार इनकी कुलदेवियां और इष्ट देव पूजे जाते हैं।
चूँकि भाट चारण समाज की गोत्रानुसार कुलदेवियों की संपूर्ण सूची अभी तक डिजिटल रूप में संकलित नहीं हो पाई है, इसलिए ‘मिशन कुलदेवी’ समाज के सभी प्रबुद्ध पाठकों से एक विशेष आग्रह करता है:
(नोट: यदि आप ‘भाट चारण’ समाज से हैं, तो कृपया नीचे कमेंट बॉक्स में अपना गोत्र, अपना मूल ग्राम और अपनी कुलदेवी / इष्टदेवी का नाम जरूर लिखें। आपके द्वारा साझा की गई यह एक छोटी सी जानकारी आने वाली पीढ़ियों को उनकी जड़ों से जोड़ने और इस समाज के ऐतिहासिक संकलन को पूरा करने में बहुत बड़ी मदद करेगी।)
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रोहरिया बारहठ शाखा कि कूलदेवी कौन है