Sheetla Mata Pooja Vidhi, Katha, Muhurat, Aarti & Chalisa in Hindi (शीतला अष्टमी 2027)

Sheetla Ashtami (Basoda) 2027: हिंदू धर्म में चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी या ‘बसोड़ा’ (Basoda) के रूप में मनाया जाता है। यह होली के ठीक आठ दिन बाद आता है। इस दिन माता शीतला की पूजा की जाती है और उन्हें बासी (ठंडे) भोजन का भोग लगाया जाता है। माता शीतला को चेचक (माता), खसरा और चर्म रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है।

शीतला माता अपने गधे पर सवार, हाथ में कलश और झाड़ू लिए हुए हैं, पृष्ठभूमि में प्राचीन मंदिर की संरचना दिखाई दे रही है, और एक पूजा की थाली में ठंडे पकवान बिछाए गए हैं।
माता शीतला का स्वरूप, गर्दभ पर सवार, पूजा के लिए बासी भोजन के साथ।

वर्ष 2027 में शीतला अष्टमी की सटीक तिथियां, पूजा का शुभ मुहूर्त, व्रत कथा, और आरती-चालीसा के बोल नीचे विस्तार से दिए गए हैं। सबसे पहले हम जानते हैं इस बार का मुहूर्त –

शीतला अष्टमी (बसोड़ा) 2027 की तिथि और शुभ मुहूर्त (Sheetla Mata Puja Muhurat):

  • शीतला सप्तमी (भोजन बनाने का दिन): 29 मार्च 2027 (सोमवार)
  • शीतला अष्टमी / बसोड़ा (पूजा का दिन): 30 मार्च 2027 (मंगलवार)

पूजा का शुभ मुहूर्त: 30 मार्च 2027 को प्रातःकाल सूर्योदय से लेकर सुबह 10:30 बजे तक माता शीतला की पूजा और घट स्थापना के लिए सबसे उत्तम समय रहेगा। (कृपया अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार सटीक मिनट मिला लें)।

शीतला माता का स्वरुप:

शीतला माता को चेचक रोग की देवी माना जाता है। कई स्थानों पर इस रोग को ‘माता’ कहा जाता है। ये अपने हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाड़ू) और नीम के पत्ते धारण किए होती हैं। इनकी सवारी गर्दभ (गधा) है। उनके एक हाथ में ठंडे जल का कलश भी रहता है। माता को साफ-सफाई, स्‍वस्‍थता और शीतलता का प्रतीक माना जाता है।

शीतला माता को मुख्‍य रूप से चावल और घी का भोग लगाया जाता है। मगर चावल शीतला अष्टमी से एक दिन पहले यानी सप्तमी को बना लिये जाते हैं। मान्‍यता है कि शीतला अष्‍टमी के दिन घर में चूल्‍हा नहीं जलाना चाहिए और न ही घर में खाना बनाना चाहिए। इसलिए एक दिन पहले ही यानी शीतला सप्‍तमी पर ही सारा खाना पका लिया जाता है। फिर यही बासी भोजन शीतला अष्टमी को ग्रहण किया जाता है।

क्या है शीतला सप्तमी ?

कहा जाता है कि शीतला माता का व्रत रखने से गर्मी के कारण होने वाले रोगों से मुक्ति मिलती है।

बसोड़ा (ठंडा भोजन) का विशेष भोग और परंपरा

इस दिन घरों में चूल्हा नहीं जलाया जाता है। पूजा के लिए सभी पकवान एक दिन पहले (सप्तमी की रात) ही बना लिए जाते हैं। राजस्थानी और उत्तर भारतीय परंपरा के अनुसार, माता को ठंडे पकवानों का ही भोग लगता है।

प्रसाद की थाली में मुख्य रूप से राबड़ी, पुए, बाजरे की रोटी, मीठे चावल (ओलिया), और विशेष रूप से शुद्ध व जैविक (Organic) लसोड़े (गुंदा) का अचार या सब्ज़ी शामिल करना बेहद शुभ और स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है। लसोड़े का औषधीय गुण और शीतला माता का आरोग्य का आशीर्वाद मिलकर परिवार को मौसमी बीमारियों से बचाते हैं।

शीतला माता पूजा विधि (Sheetla Mata Puja Vidhi)

प्रातःकाल स्नान: अष्टमी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर ठंडे पानी से स्नान करें (व्रती को गर्म पानी का उपयोग नहीं करना चाहिए)।

पूजा की थाली: एक थाली में सप्तमी की रात को बनाए गए ठंडे पकवान (राबड़ी, लसोड़ा/गुंदा, रोटी, मीठे चावल), रोली, हल्दी, अक्षत (चावल), मेहंदी, मोली (कलावा), और जल का कलश रखें।

माता की पूजा: घर के मंदिर या शीतला माता के मंदिर जाकर माता को जल अर्पित करें। उन्हें रोली-हल्दी का तिलक लगाएं, मेहंदी और वस्त्र अर्पित करें।

भोग: इसके बाद माता को बासी (ठंडे) भोजन का भोग लगाएं।

जल का छिड़काव: पूजा के बाद कलश में बचे हुए जल को पूरे घर में छिड़कें। यह जल घर से नकारात्मक ऊर्जा और बीमारियों को दूर रखता है।

कथा व आरती: अंत में वहीं बैठकर शीतला माता की व्रत कथा सुनें और कपूर/दीपक से आरती करें (कई जगह मंदिर में अग्नि नहीं जलाई जाती, इसलिए बिना जलाए दीपक मानसिक रूप से अर्पित करें)।

शीतला अष्टमी की कथा (Sheetala Ashtami Katha)


हिंदू धर्म में प्रसिद्ध शीतला माता की कथा के अनुसार एक दिन बूढ़ी औरत और उसकी दो बहुओं ने शीतला माता का व्रत रखा। इस व्रत में बासी चावल चढ़ाए और खाए जाते हैं लेकिन दोनों बहुओं ने सुबह ताज़ा खाना बना लिया क्योंकि हाल ही में दोनों की संताने हुई थीं, इस वजह से दोनों को डर था कि बासी खाना उन्हें नुकसान ना पहुंचाए। सास को ताज़े खाने के बारे में पता चला तो वो बहुत नाराज़ हुई। कुछ क्षण ही गुज़रे थे कि पता चला कि दोनों बहुओं की संतानों की अचानक मृत्यु हो गई। इस बात को जान सास ने दोनों बहुओं को घर से बाहर निकाल दिया।

अपने बच्चों के शवों को लेकर दोनों बहुएं घर से निकल गईं। चलते-चलते जब वे थक गईं तो बीच रास्ते वो विश्राम के लिए रूकीं। वहां उन दोनों को दो बहनें ओरी और शीतला मिली। दोनों ही अपने सिर में जूंओं से परेशान थी। उन बहुओं ने दोनों बहनों को ऐसे देखा उन्हें उन पर दया आ गई और वो उन दोनों के सिर को साफ करने लगीं। कुछ देर बाद दोनों बहनों को आराम मिला। आराम मिलते ही दोनों ने उन्हें आशार्वाद दिया और कहा कि तुम्हारी गोद हरी हो जाए.

ये बात सुन दोनों बुरी तरह रोने लगीं और उन्होंने उन बहनों को अपने बच्चों के शव दिखाए। ये सब देख शीतला ने दोनों से कहा कि उन्हें उनके कर्मों का फल मिला है। ये बात सुन वो समझ गईं कि शीतला अष्टमी के दिन ताज़ा खाना बनाने की वजह से ऐसा हुआ।

ये सब जान दोनों ने माता शीतला से माफी मांगी और आगे से ऐसा ना करने को कहा। इसके बाद माता ने दोनों बच्चों को फिर से जीवित कर दिया। इस दिन के बाद से पूरे गांव में शीतला माता का व्रत धूमधाम से मनाया जाने लगा।

शीतला माता की आरती (sheetla mata aarti)

जय शीतला माता, मैया जय शीतला माता,

आदि ज्योति महारानी सब फल की दाता। जय शीतला माता…

रतन सिंहासन शोभित, श्वेत छत्र भ्राता,

ऋद्धि-सिद्धि चंवर ढुलावें, जगमग छवि छाता। जय शीतला माता…

विष्णु सेवत ठाढ़े, सेवें शिव धाता,

वेद पुराण बरणत पार नहीं पाता । जय शीतला माता…

इन्द्र मृदंग बजावत चन्द्र वीणा हाथा,

सूरज ताल बजाते नारद मुनि गाता। जय शीतला माता…

घंटा शंख शहनाई बाजै मन भाता,

करै भक्त जन आरति लखि लखि हरहाता। जय शीतला माता…

ब्रह्म रूप वरदानी तुही तीन काल ज्ञाता,

भक्तन को सुख देनौ मातु पिता भ्राता। जय शीतला माता…

जो भी ध्यान लगावें प्रेम भक्ति लाता,

सकल मनोरथ पावे भवनिधि तर जाता। जय शीतला माता…

रोगन से जो पीड़ित कोई शरण तेरी आता,

कोढ़ी पावे निर्मल काया अन्ध नेत्र पाता। जय शीतला माता…

बांझ पुत्र को पावे दारिद कट जाता,

ताको भजै जो नाहीं सिर धुनि पछिताता। जय शीतला माता…

शीतल करती जननी तू ही है जग त्राता,

उत्पत्ति व्याधि विनाशत तू सब की घाता। जय शीतला माता…

दास विचित्र कर जोड़े सुन मेरी माता,

भक्ति आपनी दीजे और न कुछ भाता। जय शीतला माता…

SHREE SHITALA MATA CHALISA : श्री शीतला चालीसा in Hindi

|| दोहा ||

जय जय माता शीतला तुमही धरे जो ध्यान।
होय बिमल शीतल हृदय विकसे बुद्धी बल ज्ञान ॥

घट घट वासी शीतला शीतल प्रभा तुम्हार।
शीतल छैंय्या शीतल मैंय्या पल ना दार ॥

|| चौपाई ||

जय जय श्री शीतला भवानी । जय जग जननि सकल गुणधानी ॥
गृह गृह शक्ति तुम्हारी राजती । पूरन शरन चंद्रसा साजती ॥

विस्फोटक सी जलत शरीरा । शीतल करत हरत सब पीड़ा ॥
मात शीतला तव शुभनामा । सबके काहे आवही कामा ॥

शोक हरी शंकरी भवानी । बाल प्राण रक्षी सुखदानी ॥
सूचि बार्जनी कलश कर राजै । मस्तक तेज सूर्य सम साजै ॥

चौसट योगिन संग दे दावै । पीड़ा ताल मृदंग बजावै ॥
नंदिनाथ भय रो चिकरावै । सहस शेष शिर पार ना पावै ॥

धन्य धन्य भात्री महारानी । सुर नर मुनी सब सुयश बधानी ॥
ज्वाला रूप महाबल कारी । दैत्य एक विश्फोटक भारी ॥

हर हर प्रविशत कोई दान क्षत । रोग रूप धरी बालक भक्षक ॥
हाहाकार मचो जग भारी । सत्यो ना जब कोई संकट कारी ॥

तब मैंय्या धरि अद्भुत रूपा । कर गई रिपुसही आंधीनी सूपा ॥
विस्फोटक हि पकड़ी करी लीन्हो । मुसल प्रमाण बहु बिधि कीन्हो ॥

बहु प्रकार बल बीनती कीन्हा । मैय्या नहीं फल कछु मैं कीन्हा ॥
अब नही मातु काहू गृह जै हो । जह अपवित्र वही घर रहि हो ॥

पूजन पाठ मातु जब करी है । भय आनंद सकल दुःख हरी है ॥
अब भगतन शीतल भय जै हे । विस्फोटक भय घोर न सै हे ॥

श्री शीतल ही बचे कल्याना । बचन सत्य भाषे भगवाना ॥
कलश शीतलाका करवावै । वृजसे विधीवत पाठ करावै ॥

विस्फोटक भय गृह गृह भाई । भजे तेरी सह यही उपाई ॥
तुमही शीतला जगकी माता । तुमही पिता जग के सुखदाता ॥

तुमही जगका अतिसुख सेवी । नमो नमामी शीतले देवी ॥
नमो सूर्य करवी दुख हरणी । नमो नमो जग तारिणी धरणी ॥

नमो नमो ग्रहोंके बंदिनी । दुख दारिद्रा निस निखंदिनी ॥
श्री शीतला शेखला बहला । गुणकी गुणकी मातृ मंगला ॥

मात शीतला तुम धनुधारी । शोभित पंचनाम असवारी ॥
राघव खर बैसाख सुनंदन । कर भग दुरवा कंत निकंदन ॥

सुनी रत संग शीतला माई । चाही सकल सुख दूर धुराई ॥
कलका गन गंगा किछु होई । जाकर मंत्र ना औषधी कोई ॥

हेत मातजी का आराधन । और नही है कोई साधन ॥
निश्चय मातु शरण जो आवै । निर्भय ईप्सित सो फल पावै ॥

कोढी निर्मल काया धारे । अंधा कृत नित दृष्टी विहारे ॥
बंधा नारी पुत्रको पावे । जन्म दरिद्र धनी हो जावे ॥

सुंदरदास नाम गुण गावत । लक्ष्य मूलको छंद बनावत ॥
या दे कोई करे यदी शंका । जग दे मैंय्या काही डंका ॥

कहत राम सुंदर प्रभुदासा । तट प्रयागसे पूरब पासा ॥
ग्राम तिवारी पूर मम बासा । प्रगरा ग्राम निकट दुर वासा ॥

अब विलंब भय मोही पुकारत । मातृ कृपाकी बाट निहारत ॥
बड़ा द्वार सब आस लगाई । अब सुधि लेत शीतला माई ॥

यह चालीसा शीतला पाठ करे जो कोय ।
सपनेउ दुःख व्यापे नही नित सब मंगल होय ॥

बुझे सहस्र विक्रमी शुक्ल भाल भल किंतू ।
जग जननी का ये चरित रचित भक्ति रस बिंतू ॥

॥ इति श्री शीतला चालीसा समाप्त॥

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