शारदीय नवरात्रि 2026: जानिए घटस्थापना का शुभ मुहूर्त, तारीखें और नवरात्रि में कुलदेवी पूजन का महत्व | Shardiya Navratri 2026

Shardiya Navratri 2026: सनातन धर्म में नवरात्रि का त्योहार आत्मिक शुद्धि, शक्ति की आराधना और अपनी जड़ों (कुल परंपरा) से जुड़ने का सबसे पवित्र समय माना जाता है। वर्ष 2026 में आश्विन मास की शारदीय नवरात्रि (Shardiya Navratri 2026) का पावन पर्व 11 अक्टूबर 2026 से शुरू होने जा रहा है।

यह त्योहार असत्य पर सत्य और महिषासुर पर मां दुर्गा की विजय का प्रतीक है। आइए जानते हैं साल 2026 की सटीक तारीखें, घटस्थापना का सबसे शुभ मुहूर्त, नौ देवियों के स्वरूप और इस दौरान किए जाने वाले विशेष कुलदेवी पूजन के नियमों के बारे में।

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क्यों मनाई जाती है नवरात्रि ?

नवरात्र में व्रत रखने वालों को मां भगवती का आशीर्वाद मिलता है, उनके सभी संकट दूर होते हैं और माँ उनकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। तो आइये सबसे पहले हम जानते हैं कि नवरात्रि क्यों मनाई जाती है –

नवरात्रि में देवी की आराधना का विशेष महत्त्व है।  नवरात्रि सुख व समृद्धि देती है तथा उपासना करने से जीव का कल्याण होता है। नवरात्रि क्यों मनाई जाती है इसके पीछे दो कथायें प्रचलित हैं।

नवरात्रि की प्रथम कथा

पहली कथा के अनुसार लंका युद्ध के समय ब्रह्मा ने रावण को पराजित करने के लिए देवी चंडी का पूजन कर देवी को प्रसन्न करने के लिए कहा।  और विधि के अनुसार हवन-पूजन हेतु 108 दुर्लभ नीलकमल की भी व्यवस्था कर दी। दूसरी तरफ लंकाधिपति रावण ने भी अमरत्व प्राप्त करने के लिए चंडी पाठ प्रारम्भ कर दिया। रावण ने राम की पूजा में विघ्न डालने के उद्देश्य से हवन सामग्री में से एक नीलकमल गायब करवा दिया।  इससे श्रीराम का संकल्प टूटता दिखाई दिया। सभी को यह भय सताने लगा कि कहीं देवी चंडी कुपित न हो जाये। तभी श्रीराम को स्मरण हुआ कि उन्हें ..कमल-नयन  नवकंज लोचन.. भी कहा जाता है। अतः श्रीराम ने अपना एक नेत्र माँ की पूजा में समर्पित करने का निश्चय किया। श्रीराम ने जैसे ही बाण से अपना एक नेत्र निकालना चाहा तभी माँ जगदम्बा प्रकट हुईं और कहा कि वे राम की पूजा और भक्ति से प्रसन्न हुई और उन्होंने श्रीराम को विजय का आशीर्वाद दिया।

वहीं दूसरी तरफ रावण की पूजा के समय ब्राह्मण बालक का रूप धरकर वहां पहुँच गए और वहां पूजा कर रहे ब्राह्मणों से एक श्लोक में ‘भूर्तिहरिणी’ के स्थान पर ‘भुर्तिकरिणी’ उच्चारित करवा दिया।  हरिणी का अर्थ होता है पीड़ा को हरने वाली और करिणी का अर्थ होता है पीड़ा देने वाली।  इससे माँ चंडी रावण से कुपित हो गई।  और रावण को शाप दे दिया।  यह रावण के सर्वनाश का कारण  बना।

नवरात्रि की द्वितीय कथा

दूसरी कथा के अनुसार महिषासुर को उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवताओं ने उसे अजेय होने का वरदान  दे दिया था। वरदान पाकर महिषासुर ने उसका दुरुपयोग करना शुरू कर दिया और नरक को स्वर्ग के द्वार तक विस्तारित कर दिया। महिषासुर ने सूर्य, चन्द्र, इन्द्र, अग्नि, वायु, यम, वरुण और अन्य देवताओं के अधिकार छीन लिए और स्वर्गलोक पर अधिकार कर वहां  का स्वामी बन बैठा। तब महिषासुर के आतंक से क्रोधित होकर देवताओं ने माँ दुर्गा की रचना की। महिषासुर का वध करने के लिए देवताओं ने अपने सभी अस्त्र-शस्त्र माँ दुर्गा को समर्पित कर दिए थे। नौ दिनों तक उनका महिषासुर से संग्राम चला था और अन्त में महिषासुर का वध करके माँ दुर्गा महिषासुरमर्दिनी कहलाईं।

नवरात्र में ध्यान देने योग्य बातें

नवरात्र में ध्यान देने योग्य कुछ बातें होती हैं, जिनका विशेष ध्यान रखना चाहिए। जैसे –  

  • नवरात्रि में पूजा घर की साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए। हर दिन देवी को ताजे फूल ही चढ़ाने चाहिए और पुराने हो चुके फूलों की कभी भी कूड़े दान में नहीं फेंकना चाहिए बल्कि किसी नदी और कुएं में प्रवाहित करना चाहिए।
  • नवरात्रि के हर दिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए। ऐसा करने से आपके सभी तरह के बिगड़े हुए काम पूरे होने लगते हैं।
  • नवरात्रि पर गाय को रोटी जरूर खिलाएं। नवरात्रि के नौ दिनों तक ऐसा करने पर भाग्य संवरता है। 
  • अष्टमी और शुक्रवार के दिन झाडू जरूर खरीदकर घर लाना चाहिए। ऐसे करने से आपके परिवार पर माता लक्ष्मी की कृपा होगी।
  • अपने हर काम में सफल होने के लिए अष्टमी के दिन माता महागौरी को कमल गट्टा जरूर चढ़ाएं, साथ ही माता का सबसे प्रिय लाल गुड़हल का फूल भी अवश्य चढ़ाएं।

शारदीय नवरात्र में पूजा सामग्री का महत्त्व 

नवरात्रि पर देवी मां को तरह-तरह की पूजा सामग्री और भोग चढ़ाया जाता हैं। माँ  के पूजन में  प्रयोग होने वाली प्रत्येक पूजा सामग्री का महत्त्व होता है। तो आइए ,जानते हैं शारदीय नवरात्रि में मां की पूजा में किन-किन चीजों का प्रयोग होता है –

नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना

हिंदू धर्म में पूजा-पाठ और किसी धार्मिक अनुष्ठान में बिना कलश स्थापना के कोई भी धार्मिक अनुष्ठान पूरा नहीं माना जाता है। हर वर्ष चैत्र और अश्विन माह के नवरात्रि के पहले दिन अर्थात् प्रतिपदा तिथि पर कलश स्थापना की जाती है। कलश सुख-समृद्धि,ऐश्वर्य और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना जाता है। 

नवरात्रि पर ज्वारे का महत्व 

नवरात्रि पर घट स्थापना के ही दिन माता की चौकी के सामने ज्वारे उगाए जाते हैं।  माना जाता है कि नवरात्रि पर जौ बोना बहुत ही शुभ होता है। कलश के सामने मिट्टी के पात्र में जौ को बोया जाता है। नवरात्रि में जौ इसलिए बोया जाता है क्योंकि सृष्टि की शुरुआत में जौ ही सबसे पहली फसल थी। साथ ही जौ उगने या न उगने को भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्वानुमान के तौर पर देखा जाता है । अगर जौ तेज़ी से बढ़ते हैं तो घर में सुख-समृद्धि आती है। अगर ये बढ़ते नहीं और मुरझाए हुए रहते हैं तो भविष्य में किसी तरह के अनिष्ट का संकेत देते हैं।

मुख्य दरवाजे पर तोरण का महत्व

नवरात्रि में माता के आगमन पर उनका स्वागत करने के लिए प्रवेश द्वार पर आम या अशोक के पत्तों से बंदनवार सजाए जाते हैं। वैदिक काल से ही किसी भी शुभ कार्य या पूजा-अनुष्ठान के दौरान घर के मुख्य दरवाजे पर तोरण द्वार लगाने की परंपरा है। मान्यता है कि इससे घर में सकारात्मक ऊर्जाओं का प्रवेश होता है और नकारात्मक शक्तियां घर से दूर होती हैं। 

नौ दिनों तक अखंड दीपक

कोई भी धार्मिक अनुष्ठान अखण्ड दीपक के बिना पूरा नहीं हो सकता है। घर पर शुद्ध देसी घी के दीए जलाने पर देवी-देवताओं की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इसके अलावा घर से नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव भी दूर हो जाता है। इसलिए नवरात्रि में भी माँ की कृपा पाने के लिए और उन्हें प्रसन्न करने के लिए अखण्ड दीपक का महत्त्व है।  अखंड दीपक पूजा स्थल के आग्नेय यानि दक्षिण-पूर्व में रखना शुभ होता है क्योंकि यह दिशा अग्नितत्व का प्रतिनिधित्व करती है।

लाल गुड़हल का फूल

माँ दुर्गा को लाल गुडहल का पुष्प अत्यधिक  प्रिय होता है। मान्यता है जो भी भक्त लाल गुड़हल का फूल माँ को अर्पित करता है उसकी मनोकामना जरूर पूरी होती है। अतः नवरात्रि पर लाल गुड़हल का फूल अवश्य अर्पित करना चाहिए।

नारियल

मान्यता है नारियल में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का वास होता है, इसलिए पवित्र और शुभ कार्यों का आरंभ करने में नारियल को जरूर रखा जाता है। अतः नवरात्रि पर कलश स्थापना के साथ लाल कपड़े में नारियल जरूर रखें।

नवरात्रि की अन्य पूजा साम्रगी/नवरात्रि घटस्थापना सामग्री (Navratri 2026 Kalash sthapana samagri list)-

हल्दी, कुमकुम, कपूर, जनेऊ, धूपबत्ती, निरांजन, आम के पत्ते, पूजा के पान, हार-फूल, पंचामृत, गुड़ खोपरा, खारीक, बादाम, सुपारी, सिक्के, नारियल, पांच प्रकार के फल, चौकी पाट, कुश का  आसन, नैवेद्य आदि. 

  • लाल चुनरी
  • लाल वस्त्र
  • श्रृंगार का सामान
  • अक्षत 
  • धूप और अगरबत्ती
  • फूल और माला 
  • उपले (माँ की ज्योत लेने के लिए)
  • फल-मिठाई
  • कपूर
  • पान,सुपारी, लौंग-इलायची, बताशे, और मेवे आदि

घटस्थापना (कलश स्थापना) शुभ मुहूर्त 2026

नवरात्रि के पहले दिन (11 अक्टूबर, रविवार) को घटस्थापना की जाती है। कलश को ब्रह्मांड और त्रिदेव का प्रतीक माना जाता है। इस वर्ष कलश स्थापना के लिए दो सबसे श्रेष्ठ मुहूर्त बन रहे हैं:

  1. प्रातःकाल का शुभ मुहूर्त: सुबह 06:20 AM से 08:35 AM तक (यह घटस्थापना के लिए सबसे उत्तम समय है)।
  2. अभिजीत मुहूर्त (दुपहर का समय): दुपहर 11:44 AM से 12:30 PM तक (यदि सुबह मिस हो जाए, तो इस समय कलश स्थापना कर सकते हैं)।

शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों की देवी पूजा 2026

11 अक्टूबर 2026 (रविवार): प्रतिपदा – माँ शैलपुत्री (पर्वतराज हिमालय की पुत्री)

12 अक्टूबर 2026 (सोमवार): द्वितीया – माँ ब्रह्मचारिणी (तपस्या और संयम की देवी)

13 अक्टूबर 2026 (मंगलवार): तृतीया – माँ चंद्रघंटा (सिंह वाहिनी, वीरता की प्रतीक)

14 अक्टूबर 2026 (बुधवार): चतुर्थी – माँ कूष्मांडा (सृष्टि की रचनाकार)

15 अक्टूबर 2026 (गुरुवार): पंचमी – माँ स्कंदमाता (भगवान कार्तिकेय की माता)

16 अक्टूबर 2026 (शुक्रवार): षष्ठी – माँ कात्यायनी (राक्षसों का संहार करने वाली)

17 अक्टूबर 2026 (शनिवार): सप्तमी – माँ कालरात्रि (भय और अंधकार का नाश करने वाली)

18 अक्टूबर 2026 (रविवार): अष्टमी – माँ महागौरी (शांति और करुणा की देवी)

19 अक्टूबर 2026 (सोमवार): नवमी – माँ सिद्धिदात्री (सिद्धियों और मोक्ष की देवी) 

20 अक्टूबर 2026 (मंगलवार): दशमी – नवरात्रि पारण और विजयदशमी (दशहरा)

नवरात्रि : देवी के पूजन की संक्षिप्त सरल व उचित विधि

माँ जगदम्बा अपने भक्तों का कल्याण करती है।  माँ की आराधना के लिए संक्षिप्त विधि प्रस्तुत है।

सर्वप्रथम आसन पर बैठकर जल से तीन बार शुद्ध जल से आचमन करे- “ॐ केशवाय नम:, ॐ माधवाय नम:, ॐ नारायणाय नम:”

फिर हाथ में जल लेकर हाथ धो लें। हाथ में चावल एवं फूल लेकर अंजुरि बांध कर दुर्गा देवी का ध्यान करें।

आगच्छ त्वं महादेवि। स्थाने चात्र स्थिरा भव।
यावत पूजां करिष्यामि तावत त्वं सन्निधौ भव।।

‘श्री जगदम्बे दुर्गा देव्यै नम:।’ दुर्गादेवी-आवाहयामि! – फूल, चावल चढ़ाएं।
‘श्री जगदम्बे दुर्गा देव्यै नम:’ आसनार्थे पुष्पानी समर्पयामि।– भगवती को आसन दें।
श्री दुर्गादेव्यै नम: पाद्यम, अर्ध्य, आचमन, स्नानार्थ जलं समर्पयामि। – आचमन ग्रहण करें।
श्री दुर्गा देवी दुग्धं समर्पयामि – दूध चढ़ाएं।
श्री दुर्गा देवी दही समर्पयामि – दही चढा़एं।
श्री दुर्गा देवी घृत समर्पयामि – घी चढ़ाएं।
श्री दुर्गा देवी मधु समर्पयामि – शहद चढा़एं
श्री दुर्गा देवी शर्करा समर्पयामि – शक्कर चढा़एं।
श्री दुर्गा देवी पंचामृत समर्पयामि – पंचामृत चढ़ाएं।
श्री दुर्गा देवी गंधोदक समर्पयामि – गंध चढाएं।
श्री दुर्गा देवी शुद्धोदक स्नानम समर्पयामि – जल चढा़एं। आचमन के लिए जल लें,
श्री दुर्गा देवी वस्त्रम समर्पयामि – वस्त्र, उपवस्त्र चढ़ाएं।
श्री दुर्गा देवी सौभाग्य सूत्रम् समर्पयामि-सौभाग्य-सूत्र चढाएं।
श्री दुर्गा-देव्यै पुष्पमालाम समर्पयामि-फूल, फूलमाला, बिल्व पत्र, दुर्वा चढ़ाएं।
श्री दुर्गा-देव्यै नैवेद्यम निवेदयामि-इसके बाद हाथ धोकर भगवती को भोग लगाएं।
श्री दुर्गा देव्यै फलम समर्पयामि– फल चढ़ाएं।
श्री दुर्गा-देव्यै ताम्बूलं समर्पयामि -तांबुल (सुपारी, लौंग, इलायची) चढ़ाएं । मां दुर्गा देवी की आरती करें।

नवरात्रि की नौ देवियाँ और उनका पसंदीदा भोग

नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है और उन्हें उनकी पसंद के अनुसार भोग लगाया जाता है:

  1. मां शैलपुत्री (11 अक्टूबर): गाय का शुद्ध घी
  2. मां ब्रह्मचारिणी (12 अक्टूबर): शक्कर और सफेद फल
  3. मां चंद्रघंटा (13 अक्टूबर): दूध या दूध से बनी मिठाई
  4. मां कुष्मांडा (14 अक्टूबर): मालपुआ
  5. मां स्कंदमाता (15 अक्टूबर): पका हुआ केला
  6. मां कात्यायनी (16 अक्टूबर): शहद
  7. मां कालरात्रि (17 अक्टूबर): गुड़ या गुड़ से बनी चीजें
  8. मां महागौरी (18 अक्टूबर): नारियल या नारियल की बर्फी
  9. मां सिद्धिदात्री (19 अक्टूबर): हलवा-पूरी और चना

मिशन कुलदेवी विशेष: नवरात्रि में कुलदेवी पूजन क्यों है अनिवार्य?

हमारे ब्लॉग missionkuldevi.in के माध्यम से हमारा सदैव यह प्रयास रहता है कि आपको आपकी मूल संस्कृति से जोड़ा जाए। बहुत से लोग नवरात्रि में नवदुर्गा की पूजा तो करते हैं, लेकिन अपनी कुलदेवी को याद करना भूल जाते हैं।

शास्त्रों के अनुसार, यदि कुलदेवी रुष्ट या विस्मृत हों, तो अन्य किसी भी देवी-देवता की पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।

2026 नवरात्रि में कुलदेवी की पूजा कैसे करें?

  • अखंड ज्योति या विशेष दीपक: यदि आप पूरे नौ दिन अखंड ज्योति नहीं जला सकते, तो सुबह-शाम अपनी कुलदेवी के नाम का एक शुद्ध घी का दीपक जरूर जलाएं।
  • अष्टमी या नवमी पर ‘जात/धोक’: आपके कुल की परंपरा के अनुसार 18 अक्टूबर (अष्टमी) या 19 अक्टूबर (नवमी) को कुलदेवी के नाम का कढ़ाव (लापसी, खीर-पूरी) बनाया जाएगा। इस दिन पूरे परिवार को मिलकर कुलदेवी के सामने माथा टेकना चाहिए और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करनी चाहिए।
  • मौली बदलना: नवरात्रि के पहले दिन (11 अक्टूबर) घर के मुख्य द्वार पर और परिवार के सभी सदस्यों की कलाई पर कुलदेवी का ध्यान करते हुए नया कलावा (मौली) बांधना चाहिए।

नवरात्रि के नियम और सावधानियां

  1. सात्विकता: इन नौ दिनों में घर में पूरी तरह सात्विक माहौल रखें। लहसुन, प्याज, शराब और तामसिक भोजन का पूरी तरह त्याग करें।
  2. कन्या पूजन (18 व 19 अक्टूबर): अष्टमी या नवमी के दिन 2 से 10 वर्ष तक की कन्याओं को आदरपूर्वक घर बुलाकर भोजन कराएं, उन्हें उपहार दें और उनके पैर छूकर आशीर्वाद लें। कन्याओं को साक्षात नवदुर्गा का रूप माना जाता है।

शारदीय नवरात्रि 2026 केवल उपवास रखने का नाम नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर की नकारात्मकता को समाप्त कर दिव्य शक्तियों को जाग्रत करने का समय है। इस आश्विन मास में मां दुर्गा और अपनी कुलदेवी की आराधना कर अपने जीवन को सुखमय बनाएं।

पाठकों से चर्चा :

साल 2026 की इस नवरात्रि में आप अष्टमी को कुलदेवी की पूजा करेंगे या नवमी को? आपके यहाँ कुलदेवी को लापसी का भोग लगता है या खीर का? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने समाज और कुलदेवी का नाम लिखकर हमारे साथ जरूर साझा करें!

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