Dhakad Samaj in Hindi: मुख्य रूप से मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के उपजाऊ क्षेत्रों में निवास करने वाला धाकड़ समाज भारत के प्रमुख कृषि और योद्धा समुदायों में से एक है। हिंदी भाषा में “धाकड़” शब्द का अर्थ ही होता है— ‘निडर’ या ‘साहसी’। यह समाज जितना कुशल धरती का सीना चीरकर अन्न उगाने (काश्तकारी) में है, उतना ही सिद्ध रणभूमि में अपनी मातृभूमि की रक्षा करने में भी रहा है।
उत्पत्ति और इतिहास: भगवान हलधर से लेकर राजपूताना तक
धाकड़ समाज की ऐतिहासिक उत्पत्ति बहुत ही रोचक है और इसके तार कई महान ऐतिहासिक व पौराणिक घटनाओं से जुड़े हुए हैं। समाज में मुख्य रूप से इनकी उत्पत्ति को लेकर तीन ऐतिहासिक मान्यताएं प्रचलित हैं:
1. भगवान श्रीकृष्ण और बलराम (हलधर) से जुड़ाव:
समाज की सबसे सुंदर और पौराणिक किंवदंती के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ‘मुकुटधर’ थे, जबकि उनके बड़े भाई भगवान बलराम ‘हलधर’ (हल धारण करने वाले) थे। मान्यता है कि भगवान बलराम के जो सहचर (साथी) उनके साथ हल धारण करके संगठित हुए, वे धरती से जुड़े होने के कारण ‘धरखड़’ (धरती को जोतने वाले) कहलाए। यही ‘धरखड़’ शब्द कालांतर में अपने निडर स्वभाव के कारण ‘धाकड़’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। तभी से कृषि इस समाज का सबसे पवित्र और मुख्य व्यवसाय रहा है।
2. राजपूताना और परमार वंश:
कई प्रतिष्ठित इतिहासकार और विद्वान धाकड़ समाज को विशुद्ध रूप से क्षत्रिय (राजपूतों) से उत्पन्न मानते हैं। कुछ ऐतिहासिक स्रोतों में इन्हें शूरवीर ‘जगदेव पंवार’ (परमार) के गौरवशाली वंशज के रूप में भी उल्लेखित किया गया है।
3. ब्राह्मण उत्पत्ति और अजमेर का ऐतिहासिक भोज:
‘धाकड़ पुराण’ और समाज के भाटों (वंशावली लेखकों) के अनुसार, धाकड़ समाज की जड़ें ब्राह्मण जाति से भी जुड़ी हैं।
ऐतिहासिक प्रसंग: कहा जाता है कि अजमेर के शासक बीसलदेव चौहान द्वारा 9,36,000 ब्राह्मणों को एक विशाल राजसी भोज दिया गया था। किंवदंती है कि उस भोज के दौरान खान-पान के कुछ नियमों का अनजाने में उल्लंघन हो गया। इसके बाद, स्वाभिमान और उसूलों की खातिर इस समूह ने स्वयं को अलग कर लिया। अपने इसी अटल और निडर फैसले के कारण वे ‘धाकड़’ कहलाए और उन्होंने कृषि व शौर्य को अपना कर्म बना लिया।
समाज के ऐतिहासिक वर्ग (Classes):
समय के साथ धाकड़ समाज में मुख्य रूप से दो वर्ग बने— नागर और नागर चल्या। आगे चलकर इनका विस्तार दो अन्य वर्गों— सोलिया और बीसा में हुआ, जो वर्तमान में धाकड़ और धाकड़या के रूप में भी जाने जाते हैं।
शौर्य, संस्कृति और पंचायत व्यवस्था
धाकड़ समाज केवल खेतों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इनकी रगों में योद्धाओं का खून दौड़ता है। अतीत में इन्होंने अपने सम्मान और ज़मीन की रक्षा के लिए कई ऐतिहासिक लड़ाइयां लड़ी हैं। आज भी इनकी ईमानदारी, बहादुरी और विश्वसनीयता के कारण इन्हें भारतीय सेना, रक्षा बलों और विशेष सुरक्षा (अंगरक्षक) कार्यों में बहुत उच्च सम्मान दिया जाता है।
- मजबूत पंचायत व्यवस्था: समाज में एकजुटता की भावना बहुत प्रबल है। इनकी अपनी एक बहुत ही सुदृढ़ और न्यायप्रिय पंचायत प्रणाली है, जो आपसी विवादों को सुलझाने और सामाजिक मूल्यों को बनाए रखने का महान कार्य करती है।
- सांस्कृतिक उल्लास: ये अत्यंत अतिथि-सत्कार करने वाले लोग हैं। दिवाली, होली और विशेषकर दशहरा (जो क्षत्रियों का प्रमुख पर्व है) समाज में बड़े ही उत्साह और राजसी ठाठ-बाट के साथ मनाया जाता है।
व्यवसाय और आधुनिक प्रगति की ओर कदम
पारंपरिक रूप से यह समाज कृषि का सिरमौर है। गेहूं, चावल, दालों की बंपर पैदावार करने के साथ-साथ पशुपालन (गाय, भैंस) इनके जीवन का अभिन्न अंग है।
समय के साथ हर समाज की तरह धाकड़ समाज ने भी कई सामाजिक उतार-चढ़ाव देखे हैं, लेकिन अपने नाम को सार्थक करते हुए इन्होंने हर बाधा को पार किया है। आज समाज ने शिक्षा के महत्व को गहराई से अपनाया है। धाकड़ समाज के युवाओं ने अपने लिए कई शैक्षणिक संस्थानों, स्वयं सहायता समूहों और सहकारी समितियों (Co-operatives) की स्थापना की है। आज ये लोग व्यापार, परिवहन (Transport) और निर्माण क्षेत्र में सफल उद्यमी बनकर देश की अर्थव्यवस्था को गति दे रहे हैं।
धाकड़ समाज के गोत्र (Gotra)
धाकड़ समाज की पारिवारिक संरचना बहुत ही विस्तृत है। दिलचस्प बात यह है कि इस समाज के अधिकांश गोत्रों (खाँपों) के नाम उनके पैतृक ‘गांवों के नामों’ और प्राचीन राजपूती वंशों पर आधारित हैं।
यहाँ धाकड़ समाज के प्रमुख गोत्रों की सूची दी गई है:
| क्र.सं. | धाकड़ समाज के गोत्र (Gotra) | क्र.सं. | धाकड़ समाज के गोत्र (Gotra) |
| 1 | सोलंकी (Solanki) | 13 | भागोत्रा (Bhagotra) |
| 2 | परमार (Parmar) | 14 | सागीत्रा (Sagitra) |
| 3 | यादव (Yadav) | 15 | बंबोरिया (Bamboriya) |
| 4 | हारम्बा (Haramba) | 16 | धतेरिया (Dhateriya) |
| 5 | रडवाड़या (Radwadya) | 17 | मदारिया (Madariya) |
| 6 | नाइमा (Naima) | 18 | खसाणा (Khasana) |
| 7 | पीपरणदया (Peeperandya) | 19 | वीर धाकड़ोल्या (Veer Dhakadolya) |
| 8 | खाटोल्या (Khatolya) | 20 | बाबल्या (Babalya) |
| 9 | आलोल्या (Alolya) | 21 | बाबी (Babi) |
| 10 | आठोल्या (Aatholya) | 22 | गणाता (Ganata) |
| 11 | फफूदिया (Fafudiya) | 23 | खाटिया (Khatiya) |
| 12 | साकिया (Sakiya) | 24 | ठन्ना (Thanna) |
धाकड़ समाज की कुलदेवी (Kuldevi)
प्रत्येक शूरवीर और कृषि प्रधान समाज की तरह, धाकड़ समाज भी शक्ति (माता जी) का परम उपासक है। चूँकि इस समाज का विस्तार बहुत बड़ा है और इनके गोत्र मुख्य रूप से पैतृक गांवों पर आधारित हैं, इसलिए स्थान और गोत्र के अनुसार इनकी कुलदेवियां भिन्न-भिन्न हो सकती हैं। कई धाकड़ परिवार अपने स्थानीय क्षेत्रपाल और ग्राम देवी को भी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं।
चूँकि धाकड़ समाज की गोत्रानुसार कुलदेवियों की संपूर्ण सूची अभी तक डिजिटल रूप में संकलित नहीं हो पाई है, इसलिए ‘मिशन कुलदेवी’ समाज के सभी प्रबुद्ध पाठकों से एक विशेष आग्रह करता है:
(नोट: यदि आप धाकड़ समाज से हैं, तो कृपया नीचे कमेंट बॉक्स में अपना गोत्र, अपना पैतृक गांव और अपनी कुलदेवी / इष्टदेवी का नाम जरूर लिखें। आपके द्वारा साझा की गई यह एक छोटी सी जानकारी आने वाली पीढ़ियों को उनकी जड़ों से जोड़ने और धाकड़ समाज के इस ऐतिहासिक संकलन को इंटरनेट पर पूरा करने में बहुत बड़ी मदद करेगी।)
🙏 क्या आपको अपनी कुलदेवी की जानकारी नहीं है?
यदि किसी कारणवश आपको अपने गोत्र या अपनी कुलदेवी का नाम बिल्कुल नहीं पता है और परिवार या रिश्तेदारों से भी कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है, तो निराश न हों! आप हमारी विशेष गाइड 👉 मेरी कुलदेवी कौन है? को पढ़कर अपनी जड़ों और अपनी कुलदेवी को खोजने का सही रास्ता पा सकते हैं।


Sir बडुल्या gotra bhi h
कुलदेवी kha he budulya ki
किलोरिया भी गोत्र है धाकड़ समाज की
POPANDIYA (पोपण्डिया)
Kaila Devi
Gotra- Bagoriya
Dhakad jaati ki बडुल्या bhi gotra h jo ki rajasthan ke karauli or bharatpur me Niwas krti h
You leave a well explained information about my caste.
Thank you.
Pawan Malav
Maa kaila devi
बस्तर में पाए जाने वाले जाति धाकड़ गोत्र पुलस्त्य भी है
ब्रजवासी गोत्र भी है हम चंद्रवंशी धाकड क्षत्रिय है
जय धरणीधर
लाखुली माता
Same same but i am lahchoriya