Kharol Samaj in Hindi: भारतीय भोजन और जीवन में ‘नमक’ (Salt) का स्थान सबसे महत्वपूर्ण है। नमक के बिना जैसे हर स्वाद अधूरा है, वैसे ही भारतीय इतिहास का पन्ना भी उस परिश्रमी समाज के बिना अधूरा है जिसने तपती धरती से इस अनमोल नमक को निकालने की कला विकसित की। इस महान शिल्पी और कर्मठ समुदाय का नाम है— खारोल समाज।
राजस्थान के उत्तर-पश्चिम क्षेत्रों में इन्हें ‘नूनिया’ (Nuniya) नाम से भी बड़े सम्मान के साथ जाना जाता है। डॉ. कैलाशनाथ व्यास व देवेंद्रसिंह गहलोत जी की प्रसिद्ध पुस्तक ‘राजस्थान की जातियों का सामाजिक एवं आर्थिक जीवन’ के अनुसार, खारोल जाति मुख्य रूप से व्यवसाय प्रधान समाज है, जो सनातन हिंदू धर्म का पूरी निष्ठा से पालन करता है।
‘मिशन कुलदेवी’ के इस विशेष लेख में हम खारोल समाज की ऐतिहासिक उत्पत्ति, राजपूती जड़ों, उनके गौरवशाली वंशों और उनकी कुलदेवी के बारे में गहराई से जानेंगे।
खारोल समाज की उत्पत्ति: स्वाद और खोज की रोचक कथा
खारोल समाज की उत्पत्ति के पीछे एक बेहद रोचक और ऐतिहासिक घटना जुड़ी हुई है।
प्राचीन काल की किंवदंती है कि एक बार एक राजा अपने एक विश्वस्त साथी के साथ जंगल में शिकार पर गए। वहां भ्रमण करते हुए उस साथी की नजर एक विशेष सफेद जमीन पर पड़ी। जब उसने उत्सुकतावश उस सफेद मिट्टी को खुरच कर चखा, तो उसे वह नमकीन (खारी) महसूस हुई। अपनी इस नई खोज को परखने के लिए, उसने उस सफेद क्षार (नमक) को राजा के भोजन में मिला दिया।
जब राजा ने वह भोजन किया, तो उन्हें वह आम दिनों की तुलना में कहीं अधिक स्वादिष्ट और लजीज लगा। राजा इस अद्भुत स्वाद से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने अपने उस साथी को ‘खारोत’ (क्षार/नमक की खोज करने वाला) की उपाधि से सम्मानित किया और उसे बड़े स्तर पर इस ‘खार’ से नमक बनाने का राजसी आदेश दिया। मान्यता है कि उसी ऐतिहासिक दिन से कर्मठ ‘खारोल’ कौम की उत्पत्ति हुई।
राजपूती जड़ें और ऐतिहासिक प्रवासन (Migration)
खारोल समाज का इतिहास अदम्य साहस और परिश्रम से भरा है। स्वयं इस समाज के बुजुर्गों और ऐतिहासिक तथ्यों का कहना है कि खारोल समाज के लोग मूल रूप से राजपूत ही थे। समय के साथ, आजीविका और राज्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इन राजपूती योद्धाओं ने तलवार के साथ-साथ नमक बनाने के इस अत्यंत कठिन और महत्वपूर्ण व्यवसाय को अपना लिया।
मूल निवास और प्रवासन:
यह समाज अपना मूल निवास स्थान ऐतिहासिक नगर ‘दिल्ली’ को बताता है। समय के साथ, जहाँ-जहाँ नमक की झीलें और खदानें मिलीं, यह समाज अपनी कला का विस्तार करने के लिए वहाँ बसता गया। दिल्ली से ये सबसे पहले अजमेर (सांभर झील के आसपास) आए। उसके बाद मेवाड़ की खाली जमीनों में इन्होंने नमक बनाने का कार्य शुरू किया और अंततः मारवाड़ (पचपदरा, डीडवाना आदि) के क्षेत्रों में आकर मजबूती से बस गए।
खारोल समाज के वंश और खाँपें (Gotra)
चूँकि खारोल समाज की उत्पत्ति सीधे तौर पर क्षत्रिय (राजपूत) वंशों से हुई है, इसलिए आज भी इनके गोत्र और वंशों के नाम विशुद्ध राजपूत वंशों से ही मिलते हैं। समाज मुख्य रूप से निम्नलिखित गौरवशाली वंशों (खाँपों) में बंटा हुआ है:
| क्र.सं. | खारोल समाज के वंश / गोत्र | ऐतिहासिक मूल वंश |
| 1 | सोनगरा (Songara) | चौहानों की एक शाखा |
| 2 | हाड़ा (Hada) | चौहानों की एक शाखा |
| 3 | चौहान (Chauhan) | अग्निवंशी राजपूत |
| 4 | राठौड़ (Rathore) | सूर्यवंशी राजपूत |
| 5 | सीसोदिया (Sisodia) | मेवाड़ के सूर्यवंशी राजपूत |
| 6 | पंवार (Panwar / Parmar) | अग्निवंशी राजपूत |
| 7 | भाछलिया (Bhachliya) | राजपूती गोत्र / खाँप |
| 8 | गामती (Gamti) | राजपूती गोत्र / खाँप |
| 9 | हदावत (Hadawat) | राजपूती गोत्र / खाँप |
खारोल समाज की कुलदेवी (Kuldevi)
खारोल समाज सनातन धर्म और माता शक्ति का परम उपासक है। चूँकि इस समाज के वंश (जैसे राठौड़, चौहान, सीसोदिया आदि) राजपूताना इतिहास से ही निकले हैं, इसलिए ऐतिहासिक रूप से ये लोग अपने मूल राजपूती गोत्र के अनुसार ही अपनी प्राचीन कुलदेवियों की आराधना करते हैं।
उदाहरण के तौर पर— राठौड़ वंश के खारोल नागणेची माता की, सीसोदिया वंश के लोग बाण माता की, और चौहान व सोनगरा वंश के लोग आशापुरा माता की उपासना अपनी कुलदेवी के रूप में करते हैं। इसके अतिरिक्त, नमक की झीलों के पास बसने के कारण यह समाज माता शाकंभरी (सांभर वाले) को भी अपना परम आराध्य मानता है।
(नोट: कुलदेवियों और गोत्रों के नाम पैतृक निवास और क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। यह सूची केवल एक छोटा सा प्रयास है! यदि आपके गोत्र और आपकी कुलदेवी का नाम इस लेख में शामिल नहीं है, तो कृपया नीचे कमेंट बॉक्स में अपना गोत्र और अपनी कुलदेवी का नाम जरूर लिखें, ताकि आपके समाज का यह ऐतिहासिक संकलन पूरा हो सके और आने वाली पीढ़ियों को मदद मिल सके।
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