सिकलीगर समाज का गौरवशाली इतिहास: उत्पत्ति, धातु कला, खाँपें व कुलदेवी | Sikligar Samaj in Hindi

Sikligar Samaj in Hindi: भारतीय इतिहास में जब भी युद्ध के मैदान में चमकती हुई तलवारों और अचूक हथियारों का जिक्र आता है, तो उनके पीछे जिस महान शिल्पी समाज की मेहनत छिपी होती है, वह है— सिकलीगर समाज। मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक में फैला यह समुदाय अपने अद्भुत धातु-कौशल और शूरवीरता के लिए पूरे भारत में जाना जाता है।

‘मिशन कुलदेवी’ के इस विशेष लेख में हम सिकलीगर समाज की ऐतिहासिक उत्पत्ति, हथियारों और सिक्कों की ढलाई में उनके योगदान, राजपूती खाँपों और उनकी कुलदेवी के बारे में विस्तार से जानेंगे।

सिकलीगर शब्द का अर्थ और समाज का परिचय

“सिकलीगर” शब्द मुख्य रूप से दो ऐतिहासिक अर्थों से जुड़ा है। पहला अर्थ हिंदी के “सिक्का” (Coin/Mint) शब्द से माना जाता है, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से यह समाज शासकों के लिए टकसाल में सिक्के ढालने का महत्वपूर्ण कार्य करता था। वहीं इसका दूसरा अर्थ हथियारों को पॉलिश करने और उन पर धार लगाने वाले महान कारीगरों से जुड़ा है।

सिकलीगर समाज मूल रूप से लोहारों की ही एक बहुत विशिष्ट और उच्च शाखा है। इन्हें कई स्थानों पर ‘खेरनिये’ भी कहा जाता है। अपनी विशिष्ट पहचान और परंपराओं के कारण, सिकलीगर जाति के लोग गाड़िया लोहार अथवा मालविया लोहारों में विवाह संबंध नहीं करते हैं।

कन्नौज से उत्पत्ति और गौरवशाली इतिहास

सिकलीगर समाज का इतिहास 6वीं शताब्दी जितना प्राचीन माना जाता है। इस समाज के लोग अपना मूल निवास स्थान ऐतिहासिक नगर ‘कन्नौज’ को बताते हैं, जहाँ से समय के साथ ये राजस्थान और भारत के अन्य हिस्सों में आकर बस गए।

  • मुगल और राजपूताना काल: मध्यकाल में सिकलीगर समुदाय का स्वर्ण युग था। राजाओं और सम्राटों की सेनाओं के लिए सबसे अचूक हथियार बनाने और शाही सिक्कों की ढलाई के लिए इन्हें आधिकारिक तौर पर नियुक्त किया गया था। इस दौरान समाज के लोग अपनी कला के दम पर अत्यंत संपन्न और प्रभावशाली बने।
  • बदलते समय के साथ अनुकूलन: 19वीं शताब्दी में जब रियासतों का पतन हुआ और हथियारों का उपयोग कम हो गया, तब इस परिश्रमी समाज ने हार नहीं मानी। इन्होंने खुद को सुनारी (गहने बनाने), चांदी और पीतल के काम में ढाल लिया और अपनी आजीविका के नए रास्ते खोले।

अनूठी संस्कृति, भाषा और प्रगतिशील परंपराएं

सिकलीगर समाज अपनी जड़ों से बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है।

  • भाषा: विभिन्न राज्यों में बसने के बावजूद, इस समुदाय की अपनी एक बहुत ही मीठी बोली है जिसे “सिकलिगी” कहा जाता है, जिसमें राजस्थानी और मराठी भाषा का सुंदर मिश्रण झलकता है।
  • त्यौहार और आराध्य: यह समाज शिल्पकारों के आराध्य भगवान विश्वकर्मा की जयंती (सितंबर-अक्टूबर) सबसे बड़े त्यौहार के रूप में मनाता है। इस दिन परिवार एक साथ मिलकर अपने औजारों और घरों की पूजा करते हैं। इसके साथ ही दिवाली, होली और नवरात्रि भी धूमधाम से मनाई जाती है।
  • रीति-रिवाज: समाज के कुछ परिवार परम शक्ति ‘आई जी’ (आई माता) के परम अनुयायी हैं। आई पंथ को मानने के कारण, मृत्यु के पश्चात् ये अपने स्वजनों को सम्मानपूर्वक समाधि (जमीन में गाड़ते) देते हैं। समाज में सगाई की रस्म गुड़ और खोपरे (नारियल) से पूरी की जाती है। महिलाओं के सम्मान में समाज ने हमेशा प्रगतिशील सोच रखी है, जिसके तहत इनमें विधवा पुनर्विवाह (नाता) की प्रथा भी खुशी-खुशी स्वीकार्य है।

सिकलीगर समाज की खाँपें (Gotra)

चूँकि सिकलीगर समाज का सीधा संबंध राजपूताना और क्षत्रिय योद्धाओं से रहा है, इसलिए इनकी खाँपें (गोत्र) विशुद्ध राजपूती गोत्रों पर ही आधारित हैं। समाज मुख्य रूप से इन गौरवशाली खाँपों में बंटा हुआ है:

  1. राठौड़ (Rathore)
  2. पंवार (Panwar / Parmar)
  3. परिहार (Parihar / Pratihar)
  4. चौहान (Chauhan)
  5. बोराणा (Borana)

सिकलीगर समाज की कुलदेवी (Kuldevi)

सिकलीगर समाज मुख्य रूप से भगवान विश्वकर्मा और माता शक्ति का परम उपासक है। चूँकि इनकी खाँपें सीधे तौर पर राजपूतों से जुड़ी हैं, इसलिए ये अपने पैतृक राजपूती गोत्र के अनुसार ही अपनी कुलदेवी की पूजा करते हैं।

जैसे— राठौड़ गोत्र के सिकलीगर नागणेची माता को, चौहान गोत्र के लोग आशापुरा माता को, और पंवार गोत्र के लोग सच्चिया माता या अर्बुदा देवी को अपनी कुलदेवी के रूप में पूजते हैं। इसके अतिरिक्त, कई परिवार अपने स्थानीय निवास के अनुसार क्षेत्रपाल और ग्राम देवी की भी उपासना करते हैं।

(नोट: कुलदेवियों और गोत्रों के नाम पैतृक निवास और क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। यह सूची केवल एक छोटा सा प्रयास है! यदि आपके गोत्र और आपकी कुलदेवी का नाम इस लेख में शामिल नहीं है, तो कृपया नीचे कमेंट बॉक्स में अपना गोत्र और अपनी कुलदेवी का नाम जरूर लिखें, ताकि आपके समाज का यह ऐतिहासिक संकलन पूरा हो सके और आने वाली पीढ़ियों को मदद मिल सके।

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