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कुलदेवियों की मुख्य उपासनास्थली : मरुधरा

Kuldeviyo ki Mukhya Upasana Sthali Marudhara : पिछले लेख में आपने कुलदेवियों का स्थानों पर आधारित नामकरण विषय पर लेख पढ़ा था। इस लेख का विषय है – कुलदेवियों की मुख्य उपासनास्थली : मरुधरा

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कुलदेवीविषयक शोध का एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि कुलदेवियों के आदि उपासना-केन्द्र अधिकांशतः मरुधरा पर ही है। अब तो भारत के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले उनके उपासकों ने अनेक उपासना केन्द्र बना लिए हैं। उपासक वर्गों की संख्या भी बढ़ी है। मरुधरा के निवासी मारवाड़ी कहलाते हैं। कुलदेवियों की उपासना का दायरा भी आज मारवाड़ी समाज के बाहर तक बहुत व्यापक है। मारवाड़ी समाज के साथ इनके सम्बन्ध को समझने के लिए मारवाड़ी शब्द के इतिहास को समझना आवश्यक है।

मरु, मारवाड़ और मारवाड़ी

मारवाड़ और मारवाड़ी शब्द ‘मरु’ शब्द से बने हैं। वामन शिवराम आप्टे ने संस्कृत-हिन्दी कोश में मरु शब्द का विवरण देते हुए उसे एक देश और अधिवासियों का नाम बताया है, तत्पश्चात् ‘मरु-भू’ के विवरण में उसे मारवाड़ देश कहा है।
मारवाड़ी शब्द का अर्थ है- ‘मारवाड़ के अधिवासी।’ मारवाड़ी से तात्पर्य राजस्थान, हरियाणा, मालवा एवं उनके समीपवर्ती भू-भागों के रहन-सहन एवं संस्कृति वाले उन व्यक्तियों से है जो स्वयं अथवा उनके पूर्वज देश या विदेश के किसी भी भू-भाग में बसे हों व स्वयं को मारवाड़ी मानते हों।
राजस्थान और हरियाणा प्रदेशों के समीपवर्ती भू-भाग मध्यप्रदेश, गुजरात, पंजाब, उत्तर प्रदेश में विभक्त हैं। मालवा भी मध्य प्रदेश में है।  प्राचीनकाल में भी इन भू-भागों की भिन्न-भिन्न संज्ञाएँ थीं। मनुस्मृति में ब्रह्मावर्त और ब्रह्मर्षि देश नामक जनपदों का उल्लेख मिलता है। वहाँ ब्रह्मावर्त का स्वरूप इस प्रकार बताया गया है –

सरस्वती-दृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम्। 
तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते।।

इस श्लोक के अनुसार हस्तिनापुर के पश्चिमोत्तर में सरस्वती और दृषद्वती नदियों के बीच का भू-भाग ब्रह्मावर्त कहलाता था। ब्रह्मावर्त में राजस्थान, हरियाणा और पंजाब के भू-भाग आते थे।
ब्रह्मर्षिदेश का स्वरूप इस प्रकार वर्णित है-

कुरुक्षेत्रं च मत्स्याश्च पंचालाः शूरसेनकाः। 
एष ब्रह्मर्षिदेशो वै ब्रह्मावर्तादनन्तरः।।

इस श्लोक में ब्रह्मर्षिदेश के चार भागों कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पंचाल और शूरसेन का वर्णन है। ब्रह्मर्षिदेश के भू-भाग में आधुनिक हरियाणा, राजस्थान पंजाब और उत्तर प्रदेश के भू-भागों का समावेश होता है।

मारवाड़ी समाज और मातृपूजा

मारवाड़ी संस्कृति वैदिक संस्कृति की प्राचीनतम प्रतिनिधि है, अतः मातृपूजा इसकी मुख्य विशेषता है। वैदिक साहित्य में आद्या शक्ति को माता के रूप में विभिन्न नामों से सम्बोधित किया गया है। प्राचीन सभ्यता क्षेत्रों में खुदाई में मातृदेवी की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। मातृपूजा की यह परम्परा मारवाड़ी समाज में अब तक कायम है। कुलदेवी की मान्यता मातृपूजा-परम्परा का ही विकसित रूप है।

मारवाड़ी समाज की कुलदेवियाँ – एक अध्ययन

कुलदेवी  की मान्यता भारतीय संस्कृति की अनुपम परम्परा है, जिसमें सृष्टि की आधारभूत आद्याशक्ति के प्रति अपने कुल की माता के रूप में आस्था रखी जाती है । कुलदेवी की मान्यता का प्रमुख आधार अवतार-सिद्धान्त है । इस मान्यता के अनुसार भगवती आद्याशक्ति किसी भक्त की भक्ति से प्रसन्न होकर उसके घर अंशावतार के रूप में अवतरित होती है । उस अंशावतार की कृपा उस भक्त एवं उसके वंशजों को ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण समाज को प्राप्त होती रहती है । भगवती के विभिन्न अंशावतार कुलदेवियों के रूप में विख्यात हैं । जन-जन की श्रद्धापात्र इन कुलदेवियों की संख्या नाम व स्वरूप के भेद से बहुत बड़ी है । भगवती आद्याशक्ति जगदम्बा देश, काल एवं अवतार के भेद से अनेक कुलदेवीरूपों में अनेक नामों से पूजित है ।

कुलदेवी की मान्यता है शास्त्रसम्मत

आद्याशक्ति की माता के रूप में उपासना का प्रारम्भ वेद से हुआ है, जहाँ आद्याशक्ति को कुलदेवी के रूप में अम्बा अम्बिका आदि नामों से पुकारा गया है भारतीय संस्कृति में प्रत्येक पूजाकर्म में ‘आत्मनः कुलदेवताभ्यो नमः’ कहते हुए कुलदेवी की पूजा का शास्त्रीय विधान है । लोकरीति में कुलदेवी के धाम पर जात देने व जडूला उतारने की परम्परा है । इस प्रकार कुलदेवी की मान्यता शास्त्रसम्मत और लोकसम्मत है।

कुलदेवियों पर अनुसंधान व इनके परिणाम

प्राचीन काल से चली आ रही यह सांस्कृतिक परम्परा मध्यकाल में कुछ बाधित हुई । मारवाड़ी समाज के अनेक परिवारों को विभिन्न कारणों से मूल निवासस्थान को छोड़कर अन्यत्र बसना पड़ा । फलस्वरूप प्रवासी परिवार मूल निवासस्थान पर अधिष्ठित कुलदेवी से दूर हो गये । अनेक पीढ़ियाँ गुजर जाने के बाद उनकी वर्तमान पीढ़ी अपनी कुलदेवी के नाम, स्वरूप, स्थान व कथा-महिमा से अपरिचित है। वर्तमान समय में विभिन्न समाजों में इस विषय में अनुसंधान के प्रति जागृति आयी है।  अनेक सामाजिक संस्थाएं एवं शोधार्थी इस दिशा में सक्रिय हैं, किन्तु उनका अनुसन्धान संस्कृत-साहित्य से अपरिचय के कारण सफल नहीं हो रहा। कुलदेवीविषयक बहुत से संदर्भ संस्कृत भाषा में निबद्ध शास्त्रों, काव्यों एवं अभिलेखों में ही उपलब्ध हैं।

एक समस्या और भी रही। कुलदेवियों के अनुसंधान की प्रक्रिया छोटे-छोटे स्तरों पर हुई। मारवाड़ी समाज के विभिन्न अंगों द्वारा अपने-अपने समाज के किसी एक विद्वान् को कुलदेवियों का विवरण संकलित करने के लिए अधिकृत किया गया। कुछ विद्वान् अपनी ही स्वतः स्फूर्त प्रेरणा से इस कार्य में जुटे। यद्यपि ये प्रयास और इनके परिणाम एकांगी रहे,तथापि इन प्रयासों से लाभ भी हुआ। विभिन्न अंगभूत समाजों की कुलदेवियों की सूचियां प्रकाश में आई। व्यापक अनुसंधान का प्रारंभिक आधार तैयार हो गया।

कुलदेवियों के नामों में परिवर्तन

इन सूचियों के तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि कुछ कुलदेवियों की मान्यता एक ही समाज में है तो कुछ की विभिन्न अनेक समाजों में है। कुछ कुलदेवियों के नामों में विभिन्न समाजों में विविधता है। जैसे ओसियां की माता का विभिन्न सूचियों में संचाय, सच्चियाय, सचवाय, सूच्याय, सच्चिका आदि विभिन्न नामों से उल्लेख किया गया है तो जीण माता का जीवण, झीण, जीणाय, झीणाय आदि नामों से उल्लेख किया गया है। कुलदेवियों की जानकारी पीढ़ी दर पीढ़ी श्रुति-परम्परा से चली है, अतः नामों में परिवर्तन होना स्वाभाविक है।

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Ramkumar Dadhich
लेखक संस्कृत शिक्षा राजस्थान में सेवारत हैं। राजस्थान में सीकर जिले के नरोदड़ा ग्राम में जन्मे श्री रामकुमार दाधीच का संस्कृत साहित्य के क्षेत्र में अमूल्य योगदान रहा है।

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