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शारदीय नवरात्रि 2020 | मुहूर्त्त, पूजा विधि व महत्त्व

Shardiya Navratri 2020: आश्विन माह मनाया जाने वाला शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व आज 17 अक्तूबर से शुरू हो रहा है। नौ दिनों तक चलने वाले इस पर्व में शक्तिरूपा मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना होती है, इसलिए इसे शक्ति की उपासना का पर्व भी कहा जाता है। इन नौ दिनों में व्रत रखने का विधान है। नवरात्र में व्रत रखने वालों को मां भगवती का आशीर्वाद मिलता है, उनके सभी संकट दूर होते हैं और माँ उनकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। तो आइये सबसे पहले हम जानते हैं कि नवरात्रि क्यों मनाई जाती है –

क्यों मनाई जाती है नवरात्रि ?

नवरात्रि में देवी की आराधना का विशेष महत्त्व है।  नवरात्रि सुख व समृद्धि देती है तथा उपासना करने से जीव का कल्याण होता है। नवरात्रि क्यों मनाई जाती है इसके पीछे दो कथायें प्रचलित हैं।

नवरात्रि की प्रथम कथा

पहली कथा के अनुसार लंका युद्ध के समय ब्रह्मा ने रावण को पराजित करने के लिए देवी चंडी का पूजन कर देवी को प्रसन्न करने के लिए कहा।  और विधि के अनुसार हवन-पूजन हेतु 108 दुर्लभ नीलकमल की भी व्यवस्था कर दी। दूसरी तरफ लंकाधिपति रावण ने भी अमरत्व प्राप्त करने के लिए चंडी पाठ प्रारम्भ कर दिया। रावण ने राम की पूजा में विघ्न डालने के उद्देश्य से हवन सामग्री में से एक नीलकमल गायब करवा दिया।  इससे श्रीराम का संकल्प टूटता दिखाई दिया। सभी को यह भय सताने लगा कि कहीं देवी चंडी कुपित न हो जाये। तभी श्रीराम को स्मरण हुआ कि उन्हें ..कमल-नयन  नवकंज लोचन.. भी कहा जाता है। अतः श्रीराम ने अपना एक नेत्र माँ की पूजा में समर्पित करने का निश्चय किया। श्रीराम ने जैसे ही बाण से अपना एक नेत्र निकालना चाहा तभी माँ जगदम्बा प्रकट हुईं और कहा कि वे राम की पूजा और भक्ति से प्रसन्न हुई और उन्होंने श्रीराम को विजय का आशीर्वाद दिया।

वहीं दूसरी तरफ रावण की पूजा के समय ब्राह्मण बालक का रूप धरकर वहां पहुँच गए और वहां पूजा कर रहे ब्राह्मणों से एक श्लोक में ‘भूर्तिहरिणी’ के स्थान पर ‘भुर्तिकरिणी’ उच्चारित करवा दिया।  हरिणी का अर्थ होता है पीड़ा को हरने वाली और करिणी का अर्थ होता है पीड़ा देने वाली।  इससे माँ चंडी रावण से कुपित हो गई।  और रावण को शाप दे दिया।  यह रावण के सर्वनाश का कारण  बना।

नवरात्रि की द्वितीय कथा

दूसरी कथा के अनुसार महिषासुर को उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर देवताओं ने उसे अजेय होने का वरदान  दे दिया था। वरदान पाकर महिषासुर ने उसका दुरुपयोग करना शुरू कर दिया और नरक को स्वर्ग के द्वार तक विस्तारित कर दिया। महिषासुर ने सूर्य, चन्द्र, इन्द्र, अग्नि, वायु, यम, वरुण और अन्य देवताओं के अधिकार छीन लिए और स्वर्गलोक पर अधिकार कर वहां  का स्वामी बन बैठा। तब महिषासुर के आतंक से क्रोधित होकर देवताओं ने माँ दुर्गा की रचना की। महिषासुर का वध करने के लिए देवताओं ने अपने सभी अस्त्र-शस्त्र माँ दुर्गा को समर्पित कर दिए थे। नौ दिनों तक उनका महिषासुर से संग्राम चला था और अन्त में महिषासुर का वध करके माँ दुर्गा महिषासुरमर्दिनी कहलाईं।

नवरात्र में ध्यान देने योग्य बातें

नवरात्र में ध्यान देने योग्य कुछ बातें होती हैं, जिनका विशेष ध्यान रखना चाहिए। जैसे –  

  • नवरात्रि में पूजा घर की साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए। हर दिन देवी को ताजे फूल ही चढ़ाने चाहिए और पुराने हो चुके फूलों की कभी भी कूड़े दान में नहीं फेंकना चाहिए बल्कि किसी नदी और कुएं में प्रवाहित करना चाहिए।
  • नवरात्रि के हर दिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए। ऐसा करने से आपके सभी तरह के बिगड़े हुए काम पूरे होने लगते हैं।
  • नवरात्रि पर गाय को रोटी जरूर खिलाएं। नवरात्रि के नौ दिनों तक ऐसा करने पर भाग्य संवरता है। 
  • अष्टमी और शुक्रवार के दिन झाडू जरूर खरीदकर घर लाना चाहिए। ऐसे करने से आपके परिवार पर माता लक्ष्मी की कृपा होगी।
  • अपने हर काम में सफल होने के लिए अष्टमी के दिन माता महागौरी को कमल गट्टा जरूर चढ़ाएं, साथ ही माता का सबसे प्रिय लाल गुड़हल का फूल भी अवश्य चढ़ाएं।

शारदीय नवरात्र में पूजा सामग्री का महत्त्व 

नवरात्रि पर देवी मां को तरह-तरह की पूजा सामग्री और भोग चढ़ाया जाता हैं। माँ  के पूजन में  प्रयोग होने वाली प्रत्येक पूजा सामग्री का महत्त्व होता है। तो आइए ,जानते हैं शारदीय नवरात्रि में मां की पूजा में किन-किन चीजों का प्रयोग होता है –

नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना

हिंदू धर्म में पूजा-पाठ और किसी धार्मिक अनुष्ठान में बिना कलश स्थापना के कोई भी धार्मिक अनुष्ठान पूरा नहीं माना जाता है। हर वर्ष चैत्र और अश्विन माह के नवरात्रि के पहले दिन अर्थात् प्रतिपदा तिथि पर कलश स्थापना की जाती है। कलश सुख-समृद्धि,ऐश्वर्य और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना जाता है। 

नवरात्रि पर ज्वारे का महत्व 

नवरात्रि पर घट स्थापना के ही दिन माता की चौकी के सामने ज्वारे उगाए जाते हैं।  माना जाता है कि नवरात्रि पर जौ बोना बहुत ही शुभ होता है। कलश के सामने मिट्टी के पात्र में जौ को बोया जाता है। नवरात्रि में जौ इसलिए बोया जाता है क्योंकि सृष्टि की शुरुआत में जौ ही सबसे पहली फसल थी। साथ ही जौ उगने या न उगने को भविष्य में होने वाली घटनाओं का पूर्वानुमान के तौर पर देखा जाता है । अगर जौ तेज़ी से बढ़ते हैं तो घर में सुख-समृद्धि आती है। अगर ये बढ़ते नहीं और मुरझाए हुए रहते हैं तो भविष्य में किसी तरह के अनिष्ट का संकेत देते हैं।

मुख्य दरवाजे पर तोरण का महत्व

नवरात्रि में माता के आगमन पर उनका स्वागत करने के लिए प्रवेश द्वार पर आम या अशोक के पत्तों से बंदनवार सजाए जाते हैं। वैदिक काल से ही किसी भी शुभ कार्य या पूजा-अनुष्ठान के दौरान घर के मुख्य दरवाजे पर तोरण द्वार लगाने की परंपरा है। मान्यता है कि इससे घर में सकारात्मक ऊर्जाओं का प्रवेश होता है और नकारात्मक शक्तियां घर से दूर होती हैं। 

नौ दिनों तक अखंड दीपक

कोई भी धार्मिक अनुष्ठान अखण्ड दीपक के बिना पूरा नहीं हो सकता है। घर पर शुद्ध देसी घी के दीए जलाने पर देवी-देवताओं की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इसके अलावा घर से नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव भी दूर हो जाता है। इसलिए नवरात्रि में भी माँ की कृपा पाने के लिए और उन्हें प्रसन्न करने के लिए अखण्ड दीपक का महत्त्व है।  अखंड दीपक पूजा स्थल के आग्नेय यानि दक्षिण-पूर्व में रखना शुभ होता है क्योंकि यह दिशा अग्नितत्व का प्रतिनिधित्व करती है।

लाल गुड़हल का फूल

माँ दुर्गा को लाल गुडहल का पुष्प अत्यधिक  प्रिय होता है। मान्यता है जो भी भक्त लाल गुड़हल का फूल माँ को अर्पित करता है उसकी मनोकामना जरूर पूरी होती है। अतः नवरात्रि पर लाल गुड़हल का फूल अवश्य अर्पित करना चाहिए।

नारियल

मान्यता है नारियल में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का वास होता है, इसलिए पवित्र और शुभ कार्यों का आरंभ करने में नारियल को जरूर रखा जाता है। अतः नवरात्रि पर कलश स्थापना के साथ लाल कपड़े में नारियल जरूर रखें।

नवरात्रि की अन्य पूजा साम्रगी-

  • लाल चुनरी
  • लाल वस्त्र
  • श्रृंगार का सामान
  • अक्षत 
  • धूप और अगरबत्ती
  • कुमकुम
  • फूल और माला 
  • उपले
  • फल-मिठाई
  • कपूर
  • पान,सुपारी, लौंग-इलायची, बताशे, और मेवे आदि

शारदीय नवरात्रि 2020  तिथियां 

17 अक्टूबर 2020 (शनिवार)- प्रथमा माँ शैलपुत्री पूजा, प्रतिपदा घटस्थापना

18 अक्टूबर 2020 (रविवार)- द्वितीया माँ ब्रह्मचारिणी पूजा

19 अक्टूबर 2020 (सोमवार)- तृतीय माँ चंद्रघंटा पूजा

20 अक्टूबर 2020 (मंगलवार)- चतुर्थी माँ कुष्मांडा पूजा

21 अक्टूबर 2020 (बुधवार)- पंचमी माँ स्कंदमाता पूजा

22 अक्टूबर 2020 (गुरुवार)- षष्ठी माँ कात्यायनी पूजा

23 अक्टूबर 2020 (शुक्रवार)- सप्तमी माँ कालरात्रि पूजा

24 अक्टूबर 2020 (शनिवार)- अष्टमी माँ महागौरी पूजा, दुर्गा महा नवमी, पूजा दुर्गा, महा अष्टमी पूजा

25 अक्टूबर 2020 (रविवार)- नवमी मां सिद्धिदात्री पूजा, नवरात्रि पारणा, विजयादशमी

26 अक्टूबर 2020 (सोमवार)- दुर्गा विसर्जन

घटस्थापना का शुभ मुहूर्त

नवरात्रि का पर्व आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से है। नवरात्रि के प्रथम दिन घटस्थापना का शुभ मुहूर्त 17 अक्टूबर 2020 (शनिवार) को प्रात: 6 बजकर 23 मिनट से प्रात: 10 बजकर 12 मिनट तक है। घटस्थापना के लिए अभिजित मुहूर्त प्रात:काल 11:44 से 12:29 तक रहेगा।

नवमी और दशमी एक दिन :

इस बार नवमी और दशमी एक ही दिन मनायी जाएगी। 25 अक्टूबर को सुबह 11 बजकर 14 मिनट तक नवमी मनायी जाएगी।  11 बजकर 14 मिनट के बाद हवन के साथ विजयादशमी मनायी जाएगी। इसके बाद शाम को दशहरा मनाया जाएगा। 

नवरात्रि : देवी के पूजन की संक्षिप्त सरल व उचित विधि

माँ जगदम्बा अपने भक्तों का कल्याण करती है।  माँ की आराधना के लिए संक्षिप्त विधि प्रस्तुत है।

सर्वप्रथम आसन पर बैठकर जल से तीन बार शुद्ध जल से आचमन करे- “ॐ केशवाय नम:, ॐ माधवाय नम:, ॐ नारायणाय नम:”

फिर हाथ में जल लेकर हाथ धो लें। हाथ में चावल एवं फूल लेकर अंजुरि बांध कर दुर्गा देवी का ध्यान करें।

आगच्छ त्वं महादेवि। स्थाने चात्र स्थिरा भव।
यावत पूजां करिष्यामि तावत त्वं सन्निधौ भव।।

‘श्री जगदम्बे दुर्गा देव्यै नम:।’ दुर्गादेवी-आवाहयामि! – फूल, चावल चढ़ाएं।
‘श्री जगदम्बे दुर्गा देव्यै नम:’ आसनार्थे पुष्पानी समर्पयामि।– भगवती को आसन दें।
श्री दुर्गादेव्यै नम: पाद्यम, अर्ध्य, आचमन, स्नानार्थ जलं समर्पयामि। – आचमन ग्रहण करें।
श्री दुर्गा देवी दुग्धं समर्पयामि – दूध चढ़ाएं।
श्री दुर्गा देवी दही समर्पयामि – दही चढा़एं।
श्री दुर्गा देवी घृत समर्पयामि – घी चढ़ाएं।
श्री दुर्गा देवी मधु समर्पयामि – शहद चढा़एं
श्री दुर्गा देवी शर्करा समर्पयामि – शक्कर चढा़एं।
श्री दुर्गा देवी पंचामृत समर्पयामि – पंचामृत चढ़ाएं।
श्री दुर्गा देवी गंधोदक समर्पयामि – गंध चढाएं।
श्री दुर्गा देवी शुद्धोदक स्नानम समर्पयामि – जल चढा़एं। आचमन के लिए जल लें,
श्री दुर्गा देवी वस्त्रम समर्पयामि – वस्त्र, उपवस्त्र चढ़ाएं।
श्री दुर्गा देवी सौभाग्य सूत्रम् समर्पयामि-सौभाग्य-सूत्र चढाएं।
श्री दुर्गा-देव्यै पुष्पमालाम समर्पयामि-फूल, फूलमाला, बिल्व पत्र, दुर्वा चढ़ाएं।
श्री दुर्गा-देव्यै नैवेद्यम निवेदयामि-इसके बाद हाथ धोकर भगवती को भोग लगाएं।
श्री दुर्गा देव्यै फलम समर्पयामि– फल चढ़ाएं।
श्री दुर्गा-देव्यै ताम्बूलं समर्पयामि -तांबुल (सुपारी, लौंग, इलायची) चढ़ाएं । मां दुर्गा देवी की आरती करें।

दशहरा या विजयादशमी –

शारदीय नवरात्रि के अंतिम दिन को दशहरा या विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है।  यह दिन राम की रावण पर विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाता है, इस प्रकार यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। इस दिन देश भर में रावण के पुतले जलाये जाते हैं। इस दिन लोग शस्त्र पूजा भी करते हैं क्योंकि शस्त्र शक्ति के चिह्न हैं।

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