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एक रानी जो बनी झाला वंश की कुलदेवी – शक्तिदेवी /आद माता

हरपालदेव, झाला वंश और देवी शक्ति

Jhala Kuldevi Aad Mata History in Hindi : झालावंश का प्राचीन नाम मकवाना था।  उनका मूल निवास कीर्तिगढ़ (क्रान्तिगढ़ ) था।  हरपाल मकवाना का  मूल निवास कीर्तिगढ़ था जहाँ  सुमरा लोगों से लड़ाई हो जाने के बाद वह गुजरात चला गया जहां के राजा कर्ण ने उसे पाटड़ी की जागीर सोंप दी। मरमर माता को मकवानों की कुलदेवी माना जाता है  कालान्तर में मकवानों  को झालावंश कहा जाने लगा। अनन्तर आदमाता अथवा शक्तिमाता को झालावंशज कुलदेवी के रूप में पूजने लगे ।

राजकवि नाथूरामजी सुंदरजी कृत बृहद ग्रन्थ झालावंश वारिधि में हरपालदेव को पाटड़ी की जागीर मिलने के सम्बन्ध में वृत्तान्त दिया गया है कि हरपाल क्रान्तिगढ़ छोड़कर गुजरात में अन्हिलवाड़ा पाटन की ओर रवाना हुआ।  मार्ग में उसकी प्रतापसिंह सोलंकी से भेंट हुई जो उसे पाटन में अपने घर लाया।  जहाँ उसकी भेंट एक सुन्दर कन्या से हुई। वह कन्या शक्ति स्वरूपा थी।  हरपाल ने राजा कर्ण से भेंट की।  परिचय पाकर कर्ण ने उसको अपने दरबार में रख लिया।  उस समय राजा कर्ण की रानी को बावरा नामक भूत ने त्रस्त कर रखा था।  जब राजा कर्ण सिरोही से विवाह कर लौट रहा था तो मार्ग में पालकी में बैठी देवड़ी रानी के इत्र की शीशी ऐसे स्थान पर फूट गयी जहां बावरा भूत का निवास था।  इत्र उस पर गिर गया और वह रानी के साथ पाटन आ गया।  तब से वह रानी को सता रहा था।  हरपाल ने रानी को उस भूत से मुक्ति दिलाने का निश्चय किया।  वह महलों में गया और अपनी कुलदेवी मरमर माता की आराधना कर अपनी विधियों तथा उस चमत्कारी शक्तिरूपा कन्या की सहायता द्वारा भूत को प्रताड़ित करना शुरू किया।  बावरा भूत ने हरपाल से उसे छोड़ने की प्रार्थना की और वचन दिया कि वह आगे से उसका सहायक बन कर काम करेगा।  हरपाल ने बावरा को छोड़ दिया।  हरपाल देवी हेतु बलिदान के लिए श्मशान गया।  वहां शक्तिदेवी / मरमर माता प्रसन्न हुई और वर मांगने को कहा।  हरपाल ने प्रतापसिंह की भैरवीरूपा कन्या से विवाह की इच्छा जताई। शक्तिदेवी ने उसे आशीर्वाद दिया।  हरपाल ने उस कन्या से विवाह कर लिया।

उधर कर्ण  ने उसकी रानी को प्रेतात्मा से मुक्ति दिलाने के बदले हरपाल को कुछ मांगने को कहा।  इस पर शक्ति के कथनानुसार हरपाल ने उत्तर दिया कि एक रात में आपके राज्य के जितने गाँवों को तोरण बाँध दूँ, वे गाँव मुझे बक्षे जावें।  राजा ने मंजूर कर लिया।  हरपाल ने शक्तिदेवी और बावरा भूत की मदद से एक रात्रि में पाटड़ी सहित 2300 गाँवों में तोरण बाँध दिए।  राजा को अपने वचन के अनुसार सभी गाँव हरपाल को देने पड़े।  इससे राजा घबरा गया क्योंकि उस राज्य का अधिकाँश भाग हरपाल के पास चला गया था।  राजा का यह हाल देखकर हरपाल ने भाल इलाके के 500 गांव राजा कर्ण की पत्नी को ‘कापड़ा’ के उपलक्ष्य में लौटा दिए।

आज होती है बावरा भूत की पूजा

हलवद के बाहर श्मशान में भवानी भूतेश्वरी का का मन्दिर है, जिसमें बावरा भूत की मस्तक प्रतिमा विद्यमान है, जिसकी पूजा होती है।

पाटड़ी राजधानी बनाने के बाद हरपाल देव ने वहां महल, भवन आदि बनवाये, जिनके अवशेष वहाँ आज भी दिखाई देते हैं।  पाटड़ी में निवास करने के बाद ही मकवाना वंश का नाम झाला वंश पड़ा। भाटों की कथा के अनुसार राजा हरपाल की पत्नी शक्ति भैरवी पाटड़ी के महल के झरोखे में बैठी हुई थी। उस समय तीन राजकुमार और एक चारण बालक झरोखे के नीचे खेल रहे थे।  तभी एक हाथी बंधन तोड़कर भागता हुआ उधर आया और संभव था कि बालक हाथी के पैरों तले कुचले जाते । देवी रानी शक्ति ने अपने हाथ फैलाकर उन बालकों को ऊपर उठा (झेल) लिया।  झेलकर रक्षा करने के कारण उस पीढ़ी से मकवाना झाला कहलाने लगे और उस चारण बालक को भी देवी ने टप्पर (धक्का) देकर बचा लिया, इस कारण उस बालक की संताने टापरिया चारण कहलाई।

कुलदेवी आद माता के रूप में रानी देवी शक्ति

रानी शक्ति देवी भैरवी का देहान्त 1115 ई. में होना माना जाता है।  तब से झाला लोग इसी शक्ति देवी या आद माता को कुलदेवी के रूप में पूजते आये हैं।  ध्रांगध्रा और हलवद दोनों स्थानों पर शक्तिदेवी के मंदिर हैं जहां उनकी विशेष पूजा अरचना होती है।  हलवद में किसी झाला दम्पति का विवाह होने पर वे हलवद में स्थित शक्ति माता के प्राचीन मन्दिर में जाकर शक्तिमाता के दर्शन करते हैं।  वहां के झाला लोग शक्ति देवी के मृत्यु दिवस को शोकदिवस के रूप में मनाते हैं।  हलवद और ध्रांगध्रा में देवी को शक्ति देवी के नाम से ही पूजते हैं, वहाँ आद माता नाम नहीं मिलता।  मेवाड़ के झाला शक्तिदेवी को आद माता नाम से पूजते हैं।  रानी देवी के देहांत के बाद शोकाकुल राजा हरपाल देव ने पाटड़ी छोड़ दिया और वह अपने अन्तिम दिनों में धामा गाँव में रहा जहां 1130 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।

Shakti Mata Temple Dighadiya Halvad
Shakti Mata Temple Dighadiya Halvad

Shakti Mata Temple Dighadiya-Halvad Map

 

Shakti Mata Temple Dhragandhra Map

आद माता के मन्दिर

झाला वंश के प्रमुख ठिकाने बड़ी सादड़ी में नवरात्रि के उपलक्ष में कुलदेवी आद माता के मन्दिर में नवमी के दिन विशेष हवन भी हुआ करता है, इसी प्रकार गोगुन्दा ठिकाने में कुलदेवी आद माताजी की पूजा अर्चना की जाती है।  कानोड़ स्थित आद माता का मन्दिर झाला वंश के साथ आम जन की भी इस मन्दिर के प्रति धार्मिक आस्था का बोध कराता है।

Sanjay Sharma
Sanjay Sharma is the founder and author of Mission Kuldevi inspired by his father Dr. Ramkumar Dadhich. Mission Kuldevi is trying to get information of all Kuldevi and Kuldevta of all societies on one platform. <iframe src="https://www.facebook.com/plugins/follow.php?href=https%3A%2F%2Fwww.facebook.com%2Fsanjay.sharma.mission.kuldevi&width=450&height=35&layout=standard&size=large&show_faces=false&appId=1715841658689475" width="450" height="35" style="border:none;overflow:hidden" scrolling="no" frameborder="0" allowTransparency="true"></iframe>

13 thoughts on “एक रानी जो बनी झाला वंश की कुलदेवी – शक्तिदेवी /आद माता

  1. उस समय तीन राजकुमार और एक चारण बालक isme appne charna baalak to bataya lekin teen rajkumar koun -koun the
    kripya batave

  2. हम बंजारा है हमारी गोत मकवाना है तो किया ये हमारी कुल देवी है

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