You are here
Home > व्रत कथा > शुक्र प्रदोष (भृगु वारा) व्रत कथा, पूजा विधि, महत्त्व व मुहूर्त | Shukra Pradosh Vrat Katha

शुक्र प्रदोष (भृगु वारा) व्रत कथा, पूजा विधि, महत्त्व व मुहूर्त | Shukra Pradosh Vrat Katha

Shukra Pradosh Vrat Katha in Hindi : प्रत्येक माह की दोनों पक्षों की त्रयोदशी के दिन संध्याकाल के समय को “प्रदोष” कहा जाता है और इस दिन शिवजी को प्रसन्न करने के लिए प्रदोष व्रत रखा जाता है।जब प्रदोष शुक्रवार को पड़ता है तो उसे ”भृगु वारा प्रदोष व्रत” कहा जाता है। इस व्रत को करने से जीवन से नकारात्मकता समाप्त होती है और सफलता मिलती है। इस दिन प्रदोष व्रत सौभाग्य और दाम्पत्य जीवन की सुख-शान्ति के लिए किया जाता है।

shukra-pradosh-vrat-katha

2018 में शुक्र प्रदोष / भृगुवारा प्रदोष व्रत के दिन व समय  | Shukra Pradosh / Bhrigu Vara Pradosh Vrat Dates and Time in 2018

 2018 में तीन भृगु वारा / शुक्र प्रदोष व्रत पड़ रहे हैं। तिथि के साथ यहाँ उस दिन की पूजा का मुहूर्त दिया जा रहा है –
दिनांकवारप्रदोष व्रत (शुक्ल पक्ष / कृष्ण पक्ष)समय
 13 अप्रैल शुक्रवार भृगु वारा प्रदोष व्रत (कृष्ण) 18:41 to 20:57
 27 अप्रैल शुक्रवार भृगु वारा प्रदोष व्रत (शुक्ल) 18:49 to 21:01
 07 सितम्बर शुक्रवार भृगु वारा प्रदोष व्रत (कृष्ण) 18:32 to 20:50

शुक्र प्रदोष / भृगुवारा प्रदोष व्रत की विधि | Shukra Pradosh / Bhrigu Vara Pradosh Vrat Puja Vidhi :

प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी के दिन प्रदोष व्रत किया जाता है। प्रदोष व्रत करने के लिए मनुष्य को त्रयोदशी के दिन प्रात: सूर्य उदय से पूर्व उठना चाहिए।  नित्यकर्मों से निवृत होकर भगवान् शिव का नाम स्मरण करना चाहिये। पूरे दिन उपवास रखने के बाद सूर्यास्त से लगभग एक घंटा पहले स्नान कर श्वेत वस्त्र धारण करने चाहिये।

प्रदोष व्रत की आराधना करने के लिए कुशा के आसन का प्रयोग किया जाता है। गंगाजल से पूजन के स्थान को शुद्ध करना चाहिए और उतर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठे और भगवान शंकर का पूजन करना चाहिए।

विभिन्न पुष्पों, लाल चंदन, हवन और पंचामृत द्वारा भगवान शिवजी की पूजा करनी चाहिए। एक प्रारंभिक पूजा की जाती है जिसमे भगवान शिव को देवी पार्वती भगवान गणेश भगवान कार्तिक और नंदी के साथ पूजा जाता है। उसके बाद एक अनुष्ठान किया जाता है जिसमे भगवान शिव की पूजा की जाती है और एक पवित्र कलश में उनका आह्वान किया जाता है। पूजन में भगवान शिव के मंत्र ‘ऊँ नम: शिवाय’ का जाप करते हुए शिव को जल चढ़ाना चाहिए।  इस अनुष्ठान के बाद भक्त प्रदोष व्रत कथा सुनते है या शिव पुराण की कहानियां सुनते हैं। महामृत्यंजय मंत्र का 108 बार जाप भी किया जाता है। पूजा के समय एकाग्र रहना चाहिए और शिव-पार्वती का ध्यान करना चाहिए। मान्यता है कि एक वर्ष तक लगातार यह व्रत करने से मनुष्य के सभी पाप खत्म हो जाते हैं।

शुक्र प्रदोष / भृगुवारा  प्रदोष व्रत कथा | Shukra Pradosh Vrat Katha :

प्राचीनकाल की बात है, एक नगर में तीन मित्र रहते थे – एक राजकुमार, दूसरा ब्राह्मण कुमार और तीसरा धनिक पुत्र। राजकुमार व ब्राह्मण कुमार का विवाह हो चुका था। धनिक पुत्र का भी विवाह हो गया था, किन्तु गौना शेष था। एक दिन तीनों मित्र स्त्रियों की चर्चा कर रहे थे। ब्राह्मण कुमार ने स्त्रियों की प्रशंसा करते हुए कहा- ‘नारीहीन घर भूतों का डेरा होता है।’ धनिक पुत्र ने यह सुना तो तुरन्त ही अपनी पत्‍नी को लाने का निश्‍चय किया।

माता-पिता ने उसे समझाया कि अभी शुक्र देवता डूबे हुए हैं। ऐसे में बहू-बेटियों को उनके घर से विदा करवा लाना शुभ नहीं होता। किन्तु धनिक पुत्र नहीं माना और ससुराल जा पहुंचा। ससुराल में भी उसे रोकने की बहुत कोशिश की गई, मगर उसने जिद नहीं छोड़ी। माता-पिता को विवश होकर अपनी कन्या की विदाई करनी पड़ी।

ससुराल से विदा हो पति-पत्‍नी नगर से बाहर निकले ही थे कि उनकी बैलगाड़ी का पहिया अलग हो गया और एक बैल की टांग टूट गई। दोनों को काफी चोटें आईं फिर भी वे आगे बढ़ते रहे। कुछ दूर जाने पर उनकी भेंट डाकुओं से हो गई। डाकू धन-धान्य लूट ले गए। दोनों रोते-पीटते घर पहूंचे। वहां धनिक पुत्र को सांप ने डस लिया। उसके पिता ने वैद्य को बुलवाया। वैद्य ने निरीक्षण के बाद घोषणा की कि धनिक पुत्र तीन दिन में मर जाएगा।

जब ब्राह्मण कुमार को यह समाचार मिला तो वह तुरन्त आया। उसने माता-पिता को शुक्र प्रदोष व्रत करने का परामर्ष दिया और कहा- ‘इसे पत्‍नी सहित वापस ससुराल भेज दें। यह सारी बाधाएं इसलिए आई हैं क्योंकि आपका पुत्र शुक्रास्त में पत्‍नी को विदा करा लाया है। यदि यह वहां पहुंच जाएगा तो बच जाएगा।’ धनिक को ब्राह्मण कुमार की बात ठीक लगी। उसने वैसा ही किया। ससुराल पहुंचते ही धनिक कुमार की हालत ठीक होती चली गई। शुक्र प्रदोष के माहात्म्य से सभी घोर कष्ट टल गए।

शुक्र प्रदोष व्रत का उद्यापन | Shukra Pradosh Vrat Udyapan Vidhi :

स्कंद पुराणके अनुसार इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का उद्यापन करना चाहिए।

उद्यापन वाली त्रयोदशी से एक दिन पूर्व श्री गणेश का विधिवत षोडशोपचार से पूजन किया जाना चाहिये।  पूर्व रात्रि में कीर्तन करते हुए जागरण किया जाता है। इसके बाद उद्यापन के दिन प्रात: जल्दी उठकर नित्यकर्मों से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध कर लें। इसके बाद रंगीन  वस्त्रों और रंगोली से सजाकर मंडप तैयार कर लें। मंडप में एक चौकी पर शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें। और विधि-विधान से शिव-पार्वती का पूजन करें। भोग लगाकर उस दिन जो वार हो उसके अनुसार कथा सुनें व सुनायें।

‘ऊँ उमा सहित शिवाय नम:’ मंत्र का एक माला यानी 108 बार जाप करते हुए हवन किया जाता है। हवन में आहूति के लिए गाय के दूध से बनी खीर का प्रयोग किया जाता है। हवन समाप्त होने के बाद भगवान शिव की आरती की जाती है और शान्ति पाठ किया जाता है। अंत में दो ब्रह्माणों को भोजन कराया जाता है और अपने सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा देकर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। इसके बाद प्रसाद व भोजन ग्रहण करें।

अन्य वारों की प्रदोष व्रत कथायें –

रविवार की प्रदोष व्रतकथा >>

सोमवार की प्रदोष व्रतकथा >>

मंगलवार की प्रदोष व्रतकथा >>

बुधवार की प्रदोष व्रतकथा >>

गुरुवार की प्रदोष व्रतकथा >>

शनिवार की प्रदोष व्रतकथा >>

Shukra Pradosh Vrat Katha | Bhrigu Vara Pradosh Vrat Katha | Bhrigu Vara Pradosh Vrat Vidhi | Shukra Pradosh Vrat ke Laabh | Shukra Pradosh Vrat Dates and Timings in 2018 | Shukra Pradosh Vrat Muhurt  2018 | Shukra Pradosh Vrat Katha Hindi | Shukra Pradosh Vrat Vidhi | Shukra Pradosh Vrat Katha in Hindi | Shukravar Pradosh Vrat Katha | Friday Pradosh Vrat Vidhi | Shukra Pradosh Udyapan Vidhi

loading...

Sanjay Sharma
Sanjay Sharma is the founder and author of Mission Kuldevi inspired by his father Dr. Ramkumar Dadhich. Mission Kuldevi is trying to get information of all Kuldevi and Kuldevta of all societies on one platform.

One thought on “शुक्र प्रदोष (भृगु वारा) व्रत कथा, पूजा विधि, महत्त्व व मुहूर्त | Shukra Pradosh Vrat Katha

प्रातिक्रिया दे

Top