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महाशिवरात्रि व्रत विधि, कथा व आरती : Mahashivratri Vrat Katha Vidhi Aarti

Mahashivratri Vrat 2019 : महाशिवरात्रि हिन्दुओं का एक प्रमुख त्यौहार है। यह भगवान शिव का प्रमुख पर्व है। महाशिवरात्र‍ि का पर्व फाल्गुन मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। वैसे तो प्रत्येक माह में एक शिवरात्र‍ि होती है, परंतु फाल्गुन माह की कृष्ण चतुर्दशी को आने वाली इस शिवरात्र‍ि का अत्यंत महत्व है, इसलिए इसे महाशिवरात्र‍ि कहा जाता है। इस दिन शिवभक्त एवं शिव में श्रद्धा रखने वाले लोग व्रत-उपवास रखते हैं और विशेष रूप से भगवान शिव की आराधना करते हैं।

सृष्टि का आरम्भ 

मान्यता है कि सृष्टि का प्रारंभ इसी दिन से हुआ। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिंग ( जो महादेव का विशालकाय स्वरूप है ) के उदय से हुआ। कहते हैं कि इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ हुआ था। साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि  सबसे महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। कश्मीर शैव मत में इस त्यौहार को हर-रात्रि और बोलचाल में ‘हेराथ’ या ‘हेरथ’ भी जाता है


हलाहल और नीलकण्ठ 

समुद्र मंथन में अमृत के साथ ही हलाहल नामक विष भी पैदा हुआ था। हलाहल विष में ब्रह्मांड को नष्ट करने की क्षमता थी और इसलिए केवल भगवान शिव इसे नष्ट कर सकते थे। भगवान शिव ने हलाहल नामक विष को अपने कंठ मेंधारण कर लिया। यह विष इतना शक्तिशाली था कि भगवान शिव को इससे बहुत पीड़ा हुई और उनका कंठ नीला हो गया। इस कारण से भगवान शिव ‘नीलकंठ’ के नाम से प्रसिद्ध हैं।


देवताओं ने जगाये रखा रात भर

उपचार के लिए, चिकित्सकों ने देवताओं को भगवान शिव को रात भर जगाये रखने की सलाह दी।  इस प्रकार शिव को जगाये रखने के लिए, देवताओं ने अलग-अलग नृत्य और संगीत वादन करने लगे। जैसे सुबह  हुई, उनकी भक्ति से प्रसन्न भगवान शिव ने उन सभी को आशीर्वाद दिया। शिवरात्रि इस घटना का उत्सव है, जिससे शिव ने दुनिया को बचाया। तब से इस दिन, भक्त उपवास करते हैं, भगवान की महिमा गाते हैं और पूरी रात ध्यान करते हैं।

महाशिवरात्रि व्रत | Mahashivratri Vrat

महाशिवरात्रि व्रत का सबसे प्रमुख भाग इसका उपवास है। इस दिन शिव भगवान के भक्त शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग का विधि पूर्वक पूजन करते हैं और रात्रि में शिव जी की आरती का जागरण करते हैं। भक्तगणों द्वारा शिवलिंग पूजा में बेल-पत्र चढ़ाना, उपवास और रात्रि जागरण करना अनिवार्य है। इसी दिन रात्रि में भक्तों द्वारा भगवान शिव की बारात निकली जाती है ऐसा माना जाता है कि इसी दिन शिव जी और माँ शक्ति की शादी हुई थी। इस दिन केवल एक समय का भोजन अर्थात फल का सेवन कर सकते है। कई सारे भक्त इस दिन निर्जला उपवास रखते है। 


महाशिवरात्रि व्रत की विधि | Maha Shivratri Vrat Vidhi

महाशिवरात्रि की सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद माथे पर भस्म का त्रिपुंड तिलक लगाएं और गले में रुद्राक्ष की माला धारण करें। इसके बाद समीप स्थित किसी शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग की पूजा करें। इसके बाद व्रत करने का संकल्प लें।

महाशिवरात्रि व्रत का संकल्प | Mahashivratri Vrat Sankalp

हाथ में जल, फूल, अक्षत, सुपारी और रुपया रखें। उसके बाद नीचे लिखा मंत्र बोलें

शिवरात्रिव्रतं ह्येतत् करिष्येहं महाफलम्।
निर्विघ्नमस्तु मे चात्र त्वत्प्रसादाज्जगत्पते।।

यह कहकर हाथ में फूल, चावल व जल लेकर उसे शिवलिंग पर अर्पित करते हुए नीचे लिखा श्लोक बोलें

देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोस्तु ते।
कर्तुमिच्छाम्यहं देव शिवरात्रिव्रतं तव।।
तव प्रसादाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति।
कामाद्या: शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि।।

महाशिवरात्रि व्रत में क्या करें और क्या न करें

इस तरह महाशिवरात्रि व्रत का संकल्प लेने के बाद पूरे दिन शिवजी का ध्यान करें। दिनभर मन को शांत रखने की कोशिश करें। इसके साथ ही पूरे दिन व्रत के समय मन में काम भावना न आने दें। दिनभर शिवजी की पूजा कर सकते हैं, लेकिन शाम को प्रदोष काल में यानी सूर्यास्त के समय शिवजी की विशेष पूजा करें और रातभर जागरण कर के चारों प्रहर में पूजा करने की कोशिश करें।

महाशिवरात्रि व्रत की कथा | Mahashivratri Vrat Katha
 

किसी समय वाराणसी के जंगल में एक भील रहता था। उसका नाम गुरुद्रुह था। वह जंगली जानवरों का शिकार कर अपना परिवार पालता था। एक बार शिवरात्रि पर वह शिकार करने वन में गया। उस दिन उसे दिनभर कोई शिकार नहीं मिला और रात भी हो गई। तभी वो झील के किनारे पेड़ पर ये सोचकर चढ़ गया कि कोई भी जानवर पानी पीने आएगा तो शिकार कर लूंगा। वो पेड़ बिल्ववृक्ष था और उसके नीचे शिवलिंग स्थापित था। वहां एक हिरनी आई। शिकारी ने उसको मारने के लिए धनुष पर तीर चढ़ाया तो बिल्ववृक्ष के पत्ते और जल शिवलिंग पर गिरे। इस प्रकार रात के पहले प्रहर में अनजाने में ही उसके द्वारा शिवलिंग की पूजा हो गई। हिरनी भी भाग गई। 

थोड़ी देर बाद एक और हिरनी झील के पास आ गई। शिकारी ने उसे देखकर फिर से अपने धनुष पर तीर चढ़ाया। इस बार भी रात के दूसरे प्रहर में बिल्ववृक्ष के पत्ते व जल शिवलिंग पर गिरे और शिवलिंग की पूजा हो गई। वो हिरनी भी भाग गई।

इसके बाद उसी परिवार का एक हिरण वहां आया इस बार भी वही सब हुआ और तीसरे प्रहर में भी शिवलिंग की पूजा हो गई। वो हिरण भी भाग गया। फिर हिरण अपने झुंड के साथ वहां पानी पीने आया सबको एक साथ देखकर शिकारी बड़ा खुश हुआ और उसने फिर से अपने धनुष पर बाण चढ़ाया, जिससे चौथे प्रहर में पुन: शिवलिंग की पूजा हो गई।

इस तरह शिकारी दिनभर भूखा-प्यासा रहकर रात भर जागता रहा और चारों प्रहर अनजाने में ही उससे शिवजी की पूजा हो गई, जिससे शिवरात्रि का व्रत पूरा हो गया। इस व्रत के प्रभाव से उसके पाप भस्म हो गए और पुण्य उदय होते ही उसने हिरनों को मारने का विचार छोड़ दिया। 

तभी शिवलिंग से भगवान शंकर प्रकट हुए और उन्होंने शिकारी को वरदान दिया कि त्रेतायुग में भगवान राम तुम्हारे घर आएंगे और तुम्हारे साथ मित्रता करेंगे। तुम्हें मोक्ष भी मिलेगा। इस प्रकार अनजाने में किए गए शिवरात्रि व्रत से भगवान शंकर ने शिकारी को मोक्ष प्रदान कर दिया।

आरती श्री शिवरात्रि की (हिन्दी)

आ गयी महाशिवरात्रि पधारो शंकर जी

हो पधारो शंकर जी आरती उतारे

पार उतारो शंकर जी हो उतरो शंकर जी

तुम नयन नयन मे हो, मन धाम तेरा

हे नीलकंठ है कंठ, कंठ मे नाम तेरा

हो देवो के देव, जगत मे प्यारे शंकर जी

तुम राज महल हो, तुम्ही भिखारी के घर मे

धरती पर तेरा चरण, मुकुट है अम्बर मे

संसार तुम्हारा एक हमारे शंकर जी

तुम दुनिया बसाकर, तुम भस्म रमाने वाले हो

पापी के भी रखवाले, भोले भाले हो

दुनिया मे भी दो दिन तो गुजारो शंकर जी

क्या भेट चढायें, तन मेला वर सुना

ले लो आँसू के गंगाजल का है नमूना

आ करके नयन मे चरण पखारो शंकर जी


Aarti shri shivratri ki (English)

Aa gayi mahashivratri padharo Shankar ji,
Ho padharo Shankar ji aarti utare,
Tum neyan neyan mein ho mann dham tera,
Hy neelkanth hai kanth kanth mein naam tera,
Ho devo ke dev jagat mein pyare Shankar ji,
Tum raaj mehal ho tumhi bhikhari ke ghar mein,
Dharti par tera charan mukut hai ambar mein,
Sansaar tumhara ek hamare Shankar ji,
Tum dunia basakar tum bhsam ramane wale ho,
Papi ke bhi rakhwale bhole bhale ho,
Dunia mein bhi do din to gujaro Shankar ji,
Kya bhet chdaye tann mela var suna,
Le lo aansu ke gangajal ka hai namuna,
Aa karke neyan mein charan pakharo Shankar ji,

Sanjay Sharma
Sanjay Sharma is the founder and author of Mission Kuldevi inspired by his father Dr. Ramkumar Dadhich. Mission Kuldevi is trying to get information of all Kuldevi and Kuldevta of all societies on one platform.

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