सरयूपारीण ब्राह्मणों की उत्पत्ति
Saryuparin Brahmin Samaj in Hindi: सरयूपारी ब्राह्मण एक हिंदू ब्राह्मण समुदाय है जो मुख्य रूप से भारत के उत्तरी भाग में रहते हैं, विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश राज्यों में। “सरयूपारी” शब्द संस्कृत शब्द “सरयू” से लिया गया है, जो उस नदी को संदर्भित करता है जिसके तट पर ब्राह्मण बसे हुए थे। सरयूपारी ब्राह्मण कई उप-जातियों में विभाजित हैं, जिनमें से प्रत्येक की अपनी परंपराएं और रीति-रिवाज हैं। कुछ प्रमुख उप-जातियों में कान्यकुब्ज ब्राह्मण, सनाढ्य ब्राह्मण और गौड़ ब्राह्मण शामिल हैं।
ब्राह्मणोंत्पत्ति मार्तण्ड, ब्राह्मणोंत्पत्ति दर्पण, ब्राह्मण गोत्रावली, आदि ग्रन्थों के अनुसार त्रेतायुग में जब श्रीराम जी रावण-वध कर, लंका विजय करके अयोध्या लौटे तो उन्हें खुशी और गम दोनों एक साथ हुए। खुशी इस बात की वे विजेता बन कर लौटे हैं और दुःख इस बात का था कि मेरे द्वारा एक प्रकाण्ड पंडित, तपस्वी और कुलीन ब्राह्मण की हत्या हुई है । इसलिए ब्रह्महत्या के दोष से दुःखी थे । एतदर्थ उन्होंने ऋषि-मुनियों से ब्रह्महत्या के दोष के निवारण का उपाय पूछा । ऋषियों ने उन्हें अश्वमेध यज्ञ करने की सलाह दी। राम ने यज्ञ करने का निश्चय किया । उस यज्ञ में गौड़ ब्राह्मण प्रधान होते थे, किन्तु देश के अन्य भागों से उद्भट विद्वान् एवं तपस्वी भी पधारे थे । वहाँ कन्नौज के दो विद्वान् एवं तपस्वी ऋषि कान्य एवं ऋषि कुब्ज भी पधारे थे। ये दोनों भाई थे | यज्ञ में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी । जब यज्ञ समाप्त हुआ, तब कुब्ज ने सोचा कि अब राम ब्राह्मणों को दक्षिणा बाँटेंगे । राम एक राजा है, जिनके पास अपने पसीने की कमाई हुई सम्पत्ति नहीं है। वह जनता से वैधअवैध तरीके से वसूल की हुई सम्पत्ति का मालिक है। ऐसे राजा से प्राप्त किये दान से हमें भी पाप लगेगा । इसलिए ऐसे राजा का दान नहीं लेना चाहिए। साथ ही यदि ब्रह्महत्या जैसे पाप के प्रायश्चित स्वरुप वह दान दिया जा रहा है तो वह और भी दूषित है। राम ने रावण जैसे महा तपस्वी एवं विद्वान् ब्राह्मण की हत्या की थी। इसलिए यह दान नहीं लेना चाहिए । यह सोच कर कुब्ज ऋषि दान दक्षिणा लेने के भय से चुपचाप अयोध्या से सरयू नदी पारकर सरयू से उत्तर की दिशा में चले गये। उनके साथ बहुत से अन्य ब्राह्मण भी चले गये । ये ब्राह्मण सरयू नदी पार कर के दक्षिणा लेने के डर से चले गये थे, इसलिए इनको सरयूपारीण, सरयू-पारी या सरवरिया ब्राह्मण कहते हैं।
सरव्याश्चोत्तरे देशे ये गताश्च द्विजोत्तमाः।
सरयू ब्राह्मणास्ते वै संजाता नामभिः किल ।।
अर्थात् सरयूनदी के उत्तर देश में जो ब्राह्मण गये उनको सरवरिये ब्राह्मण कहते हैं। ये सरयूपारी या सरवरिये ब्राह्मण जिस गाँव में अपनी बेटी का विवाह करेंगे उस गाँव की बेटी लेते नहीं । यहाँ तक लड़की की ससुराल के गाँव का पानी तक नहीं पीते। आजकल गोरखपुर, जौनपुर, गाजीपुर, मिरजापुर, काशी, प्रयाग, अयोध्या, बस्ती, आजमगढ़, गोण्डा आदि स्थानों पर सरयूपारी ब्राह्मण बहुतायत से रहते हैं। छिट-पुट में अन्यत्र भी देखे जा सकते हैं। लोकव्यवहार में सरयूनदी के उत्तर दिशा वाले किनारे को सारब कहते हैं। इसलिए वहाँ उत्पन्न हुए ब्राह्मणों को सारब या सरयूपारी कहा जाता है। मत्स्य पुराण के अनुसार-
अयोध्या दक्षिणे यस्याः सरयूतटगः पुनः ।
सारवीवार देशोंऽयं गौडास्तदनुकीर्तिताः ॥
सरयूपारी ब्राह्मणों के गोत्र-
सरयूपारी ब्राह्मणों के गोत्र निम्न प्रकार से हैं-
(1) गर्ग, (2) गौतम, (3) शण्डिल्य, (4) पराशर, (5) सावर्णि, (6) काश्यप, (7) वत्स, (8) भारद्वाज, (9) कौशिक, (10) उपमन्यु, (11) वशिष्ठ, ( 12 ) गार्ग्य, ( 13 ) कात्यायन, (14) घृत कौशिक, ( 15 ) गर्दभीमुख, (16) भृगु, ( 17 ) भार्गव, (18) अगस्त्य, (19) कौण्डिन्य आदि ।
किन्तु प्रधान रूप से 16 गोत्रों की चर्चा होती है। परम्परावश तीन-तेरह का भेद चला आ रहा है।
सरयूपारी ब्राह्मणों के भेद
सरयूपारी ब्राह्मणों में तीन श्रेणियां मिलती हैं
1. त्रिकुल ( प्रथम श्रेणी) 2. त्रयोदश कुल (द्वितीय श्रेणी) 3. तीसरी श्रेणी
त्रिकुल को तीन और त्रयोदश कुल को तेरह कहते हैं। त्रिकुल, त्रयोदश कुल और तृतीय श्रेणी मात्र सम्बोधन के लिए है। 11 गोत्रों से तीन और तेरह, अर्थात् सोलह घर इन ब्राह्मणों के भेद कहे गये हैं। ये 11 गोत्र हैं –
1. गर्ग, 2. गौतम, 3. शाण्डिल्य, 4. भारद्वाज, 5. वत्स, 6. घृत कौशिक, 7. गार्ग्य, 8. सावर्ण्य, 9. गर्दभीमुख, 10. सांकृत, 11. कश्यप ।
- प्रथम श्रेणी- गर्ग, गौतम, शाण्डिल्य- इन तीन कुलों की संतति त्रिकुल या प्रथम श्रेणी में गिनी जाती है।
- द्वितीय श्रेणी- 1. पयासी, 2. समुदार, 3. धर्मपुरा, 4. चौरा कांचनी, 5. गुर्दवान, 6. बृहदग्राम, 7. माला, 8. पाला, 9. पीण्डी, 10. नागचोरी, 11. इटाये, 12. त्रिफला तथा 13. इटिया । ये ही तेरह स्थान हैं। ये द्वितीय श्रेणी के कहे जाते हैं।
- तृतीय श्रेणी- अगस्त्य, कौन्डन्य, पराशर, वशिष्ठ, भार्ग, कात्यायन, गार्ग्य, उपमन्यु, कौशिक तथा भृगु और इनके अतिरिक्त अन्य गोत्र वाले सरयूपारीण तीसरी श्रेणी के हैं। निम्नलिखित ग्राम इनके स्थान हैं-
- खोरिया, कोंडरिया, अगस्त्पार, सिंघनजोड़ी, नैपुरा, करैली, हस्तग्राम, गुरौली, चारपानी, मीठाबेल, सोनोरा, मार्जनी, पोहिम, कोडिग्राम, कुसौरा और पिपरासी- ये इन तृतीय श्रेणी वालों के मूल स्थान हैं।
विभिन्न उपाधियों से सम्बोधित होने वाले गाँव
मिश्र –
वयसी, मधुवनी, मार्जनी, धरमा, भरसी, पयासी, ग्रामों के ब्राह्मण मिश्र कहे जाते हैं ।
त्रिवेदी और द्विवेदी-
सरया, सोहगौरा, धतुरा, गुरौली, पाला, टाडा, पिण्डी, नदौली, पोहिल, खैरा, सिघनजोड़ी ग्रामों के ब्राह्मण द्विवेदी और त्रिवेदी कहे जाते हैं।
पाण्डेय-
इटिया, माला, नागचौरी, हस्तग्राम, धमौली, चारपानी, त्रिफला, इटार और अगस्तपार ग्रामों के ब्राह्मण पाण्डेय कहलाते हैं ।
द्विवेदी –
काचंनी, अर्थात्, गुर्दवान्, बृहदग्राम, अर्थात् बड़गो, मीठावेल, कोढारी, समुदार और सरार ग्रामों के ब्राह्मण द्विवेदी कहलाते हैं।
चतुर्वेदी –
नेपुरा और पिपरासी गांव के ब्राह्मण चौबे कहलाते हैं।
पाठक-
सोनार गांव के ब्राह्मण पाठक हैं।
उपाध्याय –
खोदिया और लखिमा गांव के ब्राह्मण उपाध्याय हैं।
ओझा –
करेली गांव के ब्राह्मण ओझा हैं ।
ध्यान दें – कौडिन्य गोत्र के ब्राह्मण शुक्ल, मिश्र और त्रिवेदी उपाधियों से सम्बोधित होते हैं ।
प्रथम श्रेणी के ब्राह्मण- प्रथम श्रेणी के ब्राह्मण वे हैं, जिनका मूल गोत्र एक ही ऋषि का चला आ रहा है।
द्वितीय श्रेणी के ब्राह्मण- द्वितीय श्रेणी के ब्राह्मण वे हैं, जिनमें द्वामुष्यायण मिल गये हों, जैसे किसी की सन्तान नहीं है, उसने दूसरे गोत्र वाले किसी रिश्तेदार के बालक कोया किसी अन्य गोत्रीय ब्राह्मण बालक को गोद लेकर या किसी अन्य ऋषि गोत्रीय बच्चे का क्रय करके अपना पुत्र बना लिया हो, उसे द्वामुष्यायण कहते हैं। उसके सम्मिश्र कुल हो जाने से द्वितीय श्रेणी के कहे जाते हैं।
पंक्ति पावन- एक तीसरी श्रेणी है-पंक्ति पावन ब्राह्मणों की । जिनकी उपस्थिति से दूषित ब्राह्मणों की पंक्ति भी पवित्र हो जाती है। ये पंक्ति पावन ब्राह्मण वेद वेदान्त के पारगामी और सदाचारनिष्ठ होते हैं। सरयूपारीय ब्राह्मण कुल में ही पंक्ति पावन मिलते हैं। ये वेद के छहों अंगों के ज्ञाता, विनयी, योगी और ययावर, यानि एक रात्रि से अधिक एक स्थान में न रहने वाले होते हैं। इनको पंक्ति पावन कहते हैं। ‘मनुस्मृति’ के तृतीय अध्याय में कहा है –
अपाङ्कत्योपहता पंक्ति: पाल्यते यैर्द्विजोत्तमैः ।
तान्निबोधयत कार्येन द्विजाग्रान् पंक्तिपावनान् ॥
सरयूपारीण ब्राह्मणों की कुछ विशेषताएँ
1. शाण्डिल्य गोत्री कुछ त्रिपाठी लोगों में पंक्तियां है । इनके पीछे एक इतिहास है। सरार गांव ताप्ती नदी के किनारे है। एक बार एक कुटुम्ब में राजयक्ष्मा प्रविष्ट हो गया । यह संक्रामक रोग है। धीरे-धीरे पूरा परिवार इससे ग्रसित हो गया और सभी कालकवलित हो गये। सौभाग्य से एक स्त्री मायके गयी हुई थी। उसके पेट में बच्चा था। उसका प्रसव नाना के घर में हुआ और वहीं उसका पालन-पोषण भी होने लगा। जब बच्चा कुछ बड़ा हो गया, तो उसने माताजी से अपने पिता के विषय में पूछा। मां ने रो-रोकर कुल के सत्यानाश की पूरी कहानी सुना दी। बालक अपनी पितृभूमि देखने के लिए व्याकुल हो गया और अपने एक ग्वाले मित्रके साथ सरार गांव को चल दिया।
ताप्ती के तट पर बसी अपनी पितृभूमि को देखकर रो पड़ा और अपने मित्र ग्वाले से कहा, “इस भूमि पर हमारे पूर्वजों ने जान दी है। हम भी यहीं प्राण त्यागेंगे।” ग्वाले ने उसे बहुत समझाया, किन्तु वह नहीं माना। अन्त में ग्वाले ने कहा, “जाओ, पहले स्नान करके तो आओ । उसके बाद जो चाहो करना ।” वह लड़का ताप्ती नदी में स्नान करने के लिए उतरा। ग्वाले को लगा वह तो डूब गया। अब पीड़ित ग्वाले ने आत्महत्या कर ली। जब ब्राह्मण बालक नहाकर आया, तो उसने वाले के शव को देखा। बड़ा दुःखी हुआ । उसके बाद वह सरार गांव में गया। गांव के लोगों ने उसके पूर्वजों की जमीन उसे दे दी और उसका नाम उस दिन से धरणीधर हो गया। उस बालक के कुल के लोग अपने नाम के साथ धर लगाते हैं, इनके कुल में साधु नामक ग्वाले की पूजा होती है।
2. गौरक्षा नाम के एक ब्राह्मण थे। उनके चार लड़के थे, उनके नाम राम, कृष्ण, नाथ और मणि थे। ये विभिन्न गांवों में जाकर बस गये। जो जहाँ बसा, वह अपने नाम के साथ अपने पितरों का नाम लगाने लगा। जैसे सरार गांव के वंशज अपने नाम के साथ राम लगाते हैं। सोहगौरा के वंशज अपने नाम के साथ कृष्ण लगाते हैं। धतुरा के ब्राह्मण अपने नाम के अन्त में मणि लगाते हैं। इसी प्रकार चेतिया ग्राम के वंशज अपने नाम के अन्त में नाथ शब्द लगाते हैं। उपरोक्त चारों गांवों के ब्राह्मण अपने को श्रीमुख शाण्डिल्य बतलाते हैं। इसी प्रकार नदौली ग्राम में एक नन्ददत्त नामक ब्राह्मण रहते थे। उनके मेरु, फेरु और सुखपति तीन पुत्र हुए। मेरु और फेरु के वंशज अपने नाम के साथ नाथ लगाते हैं, किन्तु सुखपति और सभापति के वंशज पिण्डी ग्राम वासी अपने नाम के साथ पति शब्द का प्रयोग करते हैं। जबकि प्रामाणिक शास्त्रीय ग्रन्थों में न तो कहीं श्रीमुख की चर्चा है और न गर्दमुख की । राम, कृष्ण, नाथ, पति तो बहुत दूर की बात है।
3. पिण्डी गांव-एक दिन गौतम गोत्र के एक पंक्ति पावन ब्राह्मण ने सभापति के हाथ की पानी में सानी हुई सत्तू की पिण्डी खा लिया, तब से सभापति पंक्ति मे मिला लिये गये और उस गांव का नाम पिण्डी हो गया । नदौली वासी ब्राह्मणों का गोत्र गर्दभी मुख है।
4. गर्दभी मुख नाम के पांच गोत्रकार ऋषि विभिन्न समयों में उत्पन्न हुए हैं। जैसे- भृगुवंश में गर्दभी मुख, वशिष्ठ वंश में गर्दभीमुख, विश्वामित्र वंश में गर्दभीमुख, 200? सरयूपारी ब्राह्मणोत्पत्ति वर्णन अंगिरस वंश में गर्दभीमुख और कश्यप वंश में गर्दभीमुख ।
कुछ अन्य विशेषताएँ
1. ये जिस गांव में अपनी बेटी की शादी करते हैं, उस गांव में बेटे की शादी नहीं करते ।
2. विवाह सम्बन्ध में येगोत्र निर्णय में बहुत सावधान रहते हैं।
3. गोत्र भिन्न होने पर भी यदि समान हो, तो विवाह वर्जित माना जाता है। जैसे-शाण्डिल्य, कश्यप और गर्दभीमुख के गोत्र भिन्न-भिन्न हैं, किन्तु प्रवर समान होने से विवाह सम्बन्ध वर्जित है।
4. अंगिरस और भृगु के सिवा अगर एक भी प्रवरर्षि समान दिख पड़े, तो उसे सगोत्र कहते हैं ।
5. भरद्वाज, गर्ग, रौक्षायण और और्व-ये चारों भारद्वाज कहे जाते हैं। इनका परस्पर विवाह सम्बन्ध नहीं होता है ।
6. हारित, संकृति, कण्व, रथीतर, मुद्गल, विष्णु, वृद्ध-ये छह ऋषि अंगिरस पक्ष के हैं। इसलिए इनमें विवाह सम्बन्ध वर्जित है।
7. वितहव्य, मिश्रयु, शुनक तथा वेणु-ये चार ऋषि भृगु पक्ष के होने से भार्गव कहलाते हैं। इनका भी परस्पर विवाह वर्जित है।
8. भृगु, सावर्णि और वत्स गोत्रों के पंच प्रवर भार्गव, च्यवन, आप्लवान, और्व और जामदग्न्य हैं। इसलिए इनका भी परस्पर विवाह सम्बन्ध वर्जित है।
9. माण्डव्य, दर्भ, रैवत के साथ भृगु और जमदग्नादि का विवाह सम्बन्ध नहीं होता है ।
सरयू पारीण ब्राह्मणों के गोत्र प्रवरादि
1. गर्ग
- आस्पद – शुक्ल
- प्रवर – आंगिरस, वार्हस्पत्य, भारद्वाज, श्येन, गार्ग्य
- शाखा– माध्यनन्दिनीय
- सूत्र– कात्यायन
- उपदेश – धनुर्वेद
- शिखा – दाहिनी
- पाद-दक्षिण
- उपास्य देव – शिव
- मूल स्थान – भेड़ी, मामखोर, बकरुआ, करज्जही, कनइल, मझगवां, महसो, बरेही,करहुचिया,लखनौरा, पां:तेय, महलियार, असौंजा, नगहरा, शुक्लपुरा अपांगते है।
गार्ग्य और गार्गेय भी इसी के अंतर्गत हैं। इन गांवों के भी कई भेद हो गये हैं। जैसे –
- मामखोर से- सीयर, खखाइचखोर, सरांव, रुदाइन, परसा, भण्टोली, छोटा सोरांव, कनइल, तलहा आदि ।
- महसों से- मुडेरा, बकैना, बसौढ़ी, कटारि, झौवा, रुद्रपुर, अकौलिया, खोरीपाकर, गोपालपुर, मेहरा, सिलहटाह आदि ।
2. गौतम
- आस्पद- मिश्र, द्विवेदी
- वेद- यजुर्वेद शाखा – माध्यन्दिन
- सूत्र- कात्यायन
- उपवेद – धनुर्वेद
- शिखा- दक्षिण
- पाद – दक्षिण
- उपास्य देव – शिव
- प्रवर- अंगिरस, वार्हस्पत्य, गौतम
- मूल स्थान- मिश्र वंश का बइसी, कारौडीह, मधुबनी, मटियारी, पिपरा, भर्सी, भउडीह, ममया, रापतपुर, जिगिना आदि । ,
द्विवेदी लोगों का मूल गांव बरपार, सहुवा, बडयापार, गोपालपुर, गड़री, रजहटा, कांचनी, गुर्दवान, धनौली, मझौरा तथा पटियारी ।
3. शाण्डिल्य
इनके दो भेद 1. श्री मुख, 2. गर्धमुख
- आस्पद – तिवारी
- वेद – सामवेद
- शाखा- कौथुमी
- सूत्र – गोभिल
- उपवेद – गन्धर्व
- शिखा – वाम
- पाद – वाम
- छन्द – जगती
- उपास्य देव – विष्णु
- प्रवर- शाण्डिल्य, असित, कश्यप
4. श्रीमुख शाण्डिल्य
गोरखपुर में सरयां, सौहगौरा, झुड़िया, देउरवा, मलुवा, सिरजम, धानी, सोपरी, चेतिया और परतावल।इन गांवों के तिवारी परिवार में पंक्ति भेद है। इनके नाम के साथ राम, कृष्ण, नाथ तथा मणि शब्द लगाते हैं।
सरसा, सोहगौरा, उनवलिया, अतरौली, रुद्रपुर, झड़िया, बहुवारी आदि के निवासी अपने नाम के साथ मणि शब्द लगाते हैं।
निम्नलिखित गांवों में भी शाण्डिल्य गोत्री तिवारी मिलते हैं, किन्तु इनका प्रवर भिन्न है।
कदहा, गोपीकान्ध, यंगेरा और घोड़नर के तिवारी लोगों का गोत्र तो शाण्डिल्य है, किन्तु प्रवर शाण्डिल्य, कौलव तथा बाल्मीक है।
देउरिया, खोरभा, गानौरा, नेवास, नकौझा, बुढ़ियावारी, धतुरा, पाला, सेमरी, चौरा, गुरौली, हथियामरास के तिवारी लोगों का प्रवर शाण्डिल्य, असित एवं कश्यप है।
5. गर्धमुख शाण्डिल्य
- आस्पद – तिवारी
- गोत्र – शाण्डिल्य
- प्रवर– शाण्डिल्य, असित, देवल
- वेद – सामवेद
- उपवेद – गान्धर्व वेद
- शाखा- कौथुमी
- सूत्र – गोमिल
- शिखा -वाम
- पाद – वाम
- छन्द– जगती
- देवता – विष्णु
इनका आदि स्थान नदौली कहा जाता है। यहीं से पिण्डी स्थान भी सम्बन्ध है । अन्तर केवल इतना है कि नदौली के लोग ‘नाथ’ शब्दान्त तथा पिण्डी के ‘पति’ शब्दान्त नामों से कहे जाते हैं। इसी गोत्र में कीलपुर के दीक्षित लोग भी हैं, किन्तु उनमें पंक्ति नहीं है।
6. पराशर
- आस्पद- पाण्डेय, उपाध्याय तथा शुक्ल
- प्रवर- शक्ति, पराशर, वशिष्ठ
- मूल स्थान- सिलावट, वामपुरा, धमौली, सोहनहार गांवों में पाण्डेय हैं । धनैती, नदुवा, चौखरी गांवों में उपाध्याय हैं। परसा, बूढ़ा, परहसा, कन्तित तथा नगवा बरौछा में शुक्ल लोग रहते हैं।
7. भारद्वाज
- आस्पद-द्विवेदी, पाण्डेय, चतुर्वेदी, पाठक, उपाध्याय
- वेद-यजुर्वेद
- उपवेद- धनुर्वेद
- शाखा- माध्यन्दिनीय, कात्यायन
- शिखा- दाहिनी ओर
- पाद – दाहिनी ओर
- देवता – शिव
- प्रवर- अंगिरस, वार्हस्पत्य, भारद्वाज
- मूल गांव- द्विवेदी-बड़गों, शरारि, बड़या, रमवापुर, बदगदी, मझौंवा, जलालपुर, बड़मैया, पटवारियां, मुडवरिया आदि ग्रामों को अपना मुख्य स्थान मानते हैं।
- पाण्डेय लोगों में- सिसवां, पुरैना तथा कौसड़-ये मचैयां के अन्तर्गत हैं। बलुवा, बाबू मठियारी तथा पगड़ों के लोग अध्वर्यु (अधुर्य) अधुर्य कहे जाते हैं। बलुवा बाबू और मंलौली में इसी गोत्र के चतुर्वेदी भी हैं।
8. कश्यप
- वेद – सामवेद
- उपवेद – गन्धर्व वेद
- शाखा- कौथुमी
- सूत्र – गोमिल
- पाद – वाम
- शिखा- वाम
- उपास्यदेव- शिव
- प्रवर-कश्यप, असित, देवल
- आस्पद – पाण्डेय, द्विवेदी, चौबे, मिश्र, ओझा, उपाध्याय
- मूल गांव- पाण्डेय – त्रिफला, बनगांव, फरेदा, जगदीशपुर, नाथपुर, बिसनैया, गौरा तथा नदुला में अधिकांश पाण्डेय लोगों की आबादी है। द्विवेदी-काश्जनी (परवा कन्तित) में दुबे लोग हैं।
- चौबे – सोनवर्ष, विष्णुपुर में चौबे लोग हैं।
- उपाध्याय – पकड़ी, बरौली तथा भरसांड
- मिश्र – राढ़ी, मिश्रोलिया, परमेश्वरपुर तथा रभौली में भारद्वाज गोत्री मिश्र लोग मिलते हैं।
- पाठक- सोनौरा
9. अत्रि (कृष्णात्रि गोत्र )
- वेद – ऋग्वेद
- उपवेद – आयुर्वेद
- शाखा- शाकल्य
- सूत्र – आश्रयलायन
- प्रवर- अर्चि, अचनिनस, श्यावाश्र
- शिखा- वाम
- पाद – वाम
- आस्पद- दुबे, शुक्ल
- उपास्यदेव – ब्रह्मा
- मूल गांव- डुमरीगंज तहसील में डुमरिया के दुबे लोग तथा पिछौरासत्यकर कन्तित में शुक्ल लोग मिलते हैं।
10. वत्स गोत्र
- वेद- सामवेद
- उपवेद – गन्धर्व
- शाखा- कौथुमी
- सूत्र – गोभिल
- पाद – वाम
- शिखा- वाम
- उपास्यदेव – विष्णु
- प्रवर- वत्स, च्यवन, आप्लवान, और्व एवं जामदग्न्य 5 प्रवर होते हैं ।
- आस्पद- पाण्डेय, दुबे, मिश्र, तिवारी, ओझा लोग मिलते हैं।
- मूल गांव- पाण्डेय-नागचौरी, बेलवा, सोनफेरवा, वनहा, परसिया तथा बिठौला में मिलते हैं ।
- द्विवेदी- ये सनदरिया, भरौली, बकुलारी तथा विमटी में मिलते हैं ।
- मिश्र- ये मुख्यतः पयासी, रतनमाला, नरगहा, बनकटा, करिहैया, मणिकटा, वाना, बेलौरा तथा टोगारि में मिलते हैं। पयासी में रतनमाला, भरवलिया, गोपालपुर, बीजापुर, जिगना, भिटह, छपिया, बिजरा, कतरारी, बैरिया, परसिया, भुड़िसा तथा रानीपुरी हैं।
- बनवटा या नगरहा में- अघैला, सुखई, तिलकपुर, सलेमपुर, रेवली तथा चैनपुर आते हैं ।
- करिहैयां में- करिहांव, दियावती तथा मेंहदावल हैं।
- मणिकढ़ा से – खुदिया, बघौरा, चिमखा तथा बैनुवा हैं।
- गाना में –गाना, त्योंठा, बरवरिया, बैरिया तथा चकहदा सम्मिलित हैं।
- बेलोरा में- पानन, चिनरवा, बंघोरा, मझौलिया, सुलजामपुर तथा पकरिया सम्मिलित हैं।
- तिवारी – फूदा गाजर, धुरियामार, बिरई तथा पोहिला में इस गोत्र के तिवारी रहते हैं।
- ओझा – ककुवा, रजौली तथा खैरी में वत्स गोत्री ओझा लोग रहते हैं ।
11. वात्स्यायन गोत्र
- वेद- यजुर्वेद
- शाखा- माध्यन्दि
- सूत्र- कात्यायन
- पाद- दक्षिण
- शिखा- दक्षिण
- उपास्यदेव- शिव
- प्रवर- विश्वामित्र, किल, कात्यायन
- आस्पद- चौबे
- मूल गांव- नैपुरा, कुसौरा
12. सांकृत गोत्र
- वेद- यजुर्वेद
- शिखा- दक्षिण
- शाखा – माध्यन्दिन
- पाद – दक्षिण
- सूत्र – कात्यायन
- उपास्य देव – शिव
- प्रवर- सांकृत, सांख्यायन, मिश्र
- आस्पद – पाण्डेय, तिवारी, चौबे
- मूल गांव-
- पाण्डेय – मलांव में पाण्डेय लोग मिलते हैं ।
- तिवारी – नाउरदेउर, मिलौर सरया
- चौबे- भभुआ पार, नगवा, उनबलि, देउगर, सरसैया, तेलियाडीह तथा सिधैया में मुख्य रूप से चौबे लोग मिलते हैं।
13. सावर्ण्य गोत्र
- वेद- सामवेद
- उपवेद – गान्धर्व वेद
- शाखा- कौथुमी
- सूत्र – गोभिल
- शिखा– वाम
- पाद- वाम
- प्रवर – भार्गव, च्यवन, आप्रवाल, और्व, सावर्ण्य
- आस्पद – मिश्र, पाण्डेय
- देव – विष्णु
- मूल गांव-
- पाण्डेय – इटारि, रैकहट, पट्टीदिलीपपुर, वंशीधरपुरवा, मझगंवा, चारपानि, लसेहरी, साहुकोल तथा भसमा ये मूल स्थान हैं। सखरुआ, इमली डांड, भरोसा के परखपाण्डे, इन्द्रपुर, वारघाट, भट्टाचारी तथा टिकरा के पाण्डे भी इसी गोत्र के हैं ।
- मिश्र – सिसैया के मिश्र भी इसी गोत्र के हैं।
14. भार्गव
- वेद- सामवेद
- उपवेद – गान्धर्व वेद
- शाखा- कौथुमी
- सूत्र – गोभिल उपास्य
- देव – विष्णु
- शिखा- वाम
- पाद- वाम
- आस्पद- तिवारी
- प्रवर- भार्गव, च्यवन, आप्लवान, और्व, जामदग्न्य 5 प्रवर
- मूल गांव- भार्गवपुर, मदनपुर, सोढ़ा चक्र सिंहन जोरी, रखुआ खोर तथा चर्नार इनके मुख्य स्थान हैं।
15. उपमन्यु गोत्र
- वेद- यजुर्वेद
- उपवेद – धनुर्वेद
- शाखा- माध्यन्दिनीय
- सूत्र- कात्यायन उपास्य
- देव- शिव
- शिखा- दक्षिण
- पाद- दक्षिण
- आस्पद- ओझा, पाठक
- प्रवर- वशिष्ठ, इन्द्रप्रमद तथा उपमन्यु
- मूल गांव-
- ओझा- करैली, ओझवली, अजांप तथा मलांव इनके मुख्य स्थान हैं।
- पाठक – मगदरिया में इसी गोत्र के पाठक मिलते हैं।
16. वशिष्ठ गोत्र
- वेद- यजुर्वेद
- उपवेद- धनुर्वेद
- शाखा- माध्यन्दिनीय
- सूत्र- कात्यायन
- प्रवर- वशिष्ठ, शक्ति, पराशर
- उपास्य देव- शिव
- शिखा- दक्षिण
- पाद- दक्षिण
- आस्पद- तिवारी, पाण्डे, मिश्र, चौबे
- मूल स्थान–
- मार्जनी तथा वट्टापुर गांवों मे मिश्र लोग रहते हैं।
- मणिकण्ठवंकिवा तथा हरिना में तिवारी लोग इसी गोत्र के हैं।
- नार्जनी में चौबे |
- अम्बा, कोहड़ा गांव के पाण्डेय लोग वशिष्ठ गोत्री हैं।
17. घृतकौशिक
- वेद- यजुर्वेद
- उपवेद- धनुर्वेद
- शाखा- माध्यन्दिनीय
- सूत्र- कात्यायन
- प्रवर- विश्वामित्र, कौशिक, घृतकौशिक
- शिखा- दक्षिण
- पाद- दक्षिण
- उपास्य देव- शिव
- आस्पद- मिश्र
- मूल गांव- धर्मपुरा, लगुनहीं, हरदिया, मझौना तथा कुशहरा इनके मूल स्थान हैं।
18. कौशिक गोत्र
- वेद – यजुर्वेद
- उपवेद – धनुर्वेद
- शाखा- माध्यन्दिनीय
- सूत्र- कात्यायन
- प्रवर – विश्वामित्र, कौशिक तथा अघमर्षण
- शिखा- दक्षिण
- पाद – दक्षिण
- आस्पद – मिश्र, दुबे
- उपास्य देव – शिव
- मूल गांव-
- द्विवेदी-मीठवेल, ब्रह्मपुर ।
- मिश्र- सुगौटी।
19. कुशिक
- वेद – यजुर्वेद
- उपवेद – धनुर्वेद
- शाखा- माध्यन्दिनीय
- सूत्र – कात्यायन प्रवर विश्वामित्र, कौशिक, अघमर्षण
- उपास्य देव – शिव
- आस्पद- चौबे
- शिखा- दक्षिण
- पाद- दक्षिण
- मूल गांव- अलीनगर तथा हरगढ़
20. कौण्डिन्य
- वेद- अथर्ववेद
- उपवेद – स्थापत्य वेद
- शाखा- शौनकी
- सूत्र- बोधायन
- शिखा- दक्षिण
- पाद- वाम
- प्रवर- वशिष्ठ, मित्रावरुण, कौण्डिन्य
- उपास्य देव- इन्द्र
- आस्पद- मिश्र और पाण्डेय
- मूल गांव –
- मिश्र- बभनौली, नगरहा।
- पाण्डेय- पलामू, बेलौजा।
सरयू पारीण ब्राह्मणों में उपरोक्त गोत्रों के अतिरिक्त भी गोत्र मिलते हैं।
नाम गोत्र उत्तर भारतीय ब्राह्मण गोत्र शासनावली 183 चन्द्रायण आस्पद ग्राम वरतन्तु कश्यप पाण्डेय 1. 2. 3. त्रिपाठी वेलौंजा 4. धर्महरि दुबे सिंगेला कण्व निरौली दुबे सरयू पारीण ब्राह्मणों के गोत्र का और भी विस्तार है।
सरयूपारी ब्राह्मण समाज की कुलदेवी
अभी तक सरयूपारी ब्राह्मण समाज की गोत्रानुसार कुलदेवियों का विवरण नहीं मिल पाया है। यदि आप इसी समाज से हैं और अपनी कुलदेवी के बारे में जानते हैं तो कृपया Comment Box में अपना गोत्र, स्थान व कुलदेवी की जानकारी अवश्य लिखें।



महिषासुर मर्दिनी माता की जय।
सतीश कुमार तिवारी(त्रिपाठी)
श्रीमुख शांडिल्य गोत्र
सौहगौरा गांव गोरखपुर से
कुल देवी दुर्गा जी,घमसा माता
Bhai aap ki jankari bahut hi adhuri hai bahut padhne ki jarurat hai,ham mahasuriya Pandey hain aur itar,itiya,atraila sabhi ke man hain,
Sath hi atraila,itar aur itya baki sabhi ke man hain samjhe,sath hi ham teen ke bhi man hain garg, Gautam aur urmaliya aate hain teen me aap ko 3 aur 13 ka bhi adhura Gyan hai.
मंसुरिया के पाण्डेय को मैं जानता हूं, लेकिन ये लोग सरयूपारी ब्राह्मणों में नहीं आते हैं। ये लोग अपने गोत्र को चंद्रात्रय बताते हैं। झारखंड और मध्य प्रदेश में आंशिक रूप से पाये जाते हैं। झारखंड में गढ़वा जिले में और मध्य प्रदेश के सीधी तथा रीवा जिले में, उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में आंशिक रूप से चंद्रात्रय गोत्र के पाण्डेय एवं चौबे पाये जाते हैं।ये लोग सरयूपारी ब्राह्मणों में नहीं आते। सरयूपारी और कान्यकुब्ज ब्राह्मणों में शादी संबंध करने से सरयूपारी नहीं हो सकते।
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Maharaj hum Chandrayan gotra k Chaturvedi hain Lekin is gotra ki Jaankari prapat ni ho paa ri hai.
मै औदीच्य सहस्त्र झालावाडी ब्राह्मण हु, ( गोत्र गौतम है, अवंटक दवे, यजुर्वेद मध्यंदिनी शाखा त्रि प्रवर) औदीच्य ब्राह्मण का इतिहास वि. स 950 से माना जाता है उससे पहले हम सब औदीच्य उत्तर भारत मे निवासित थे, तब हम कान्यकुब्ज, सरयुपारी किस प्रकार के ब्राह्मण थे और कोनसा मूल स्थल था वह कैसे पता करे?
कुल देवी- दुर्गा माँ
कुल देवता- नाग देवता
गोत्र- सावर्ण गोत्र (सरयूपारिण)
प्रवर – पाँच
Hum log sankrit gotra ke hain aur kul devi phool mati Mata ko mante hain