पिंजारा समाज का परिचय व उत्पत्ति :-
Pinjara Samaj in Hindi: भारतीय उपमहाद्वीप में ‘पिंजारा’ (Pinjara) एक ऐसा मेहनतकश और ऐतिहासिक समुदाय है, जिसकी जड़ें भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत, सूफी परंपराओं और राजपूतों के गौरवशाली इतिहास से गहराई तक जुड़ी हुई हैं। पिंजारा जाति का मुख्य व्यवसाय कपास (रूई) को धुनने, खोलने व साफ करने का रहा है।
‘मिशन कुलदेवी’ के इस विशेष लेख में हम पिंजारा समाज (जिन्हें मंसूरी, धुनिया या नद्दाफ भी कहा जाता है) की ऐतिहासिक उत्पत्ति, उनके सूफी संत से जुड़े रोचक इतिहास, उनके राजपूत गोत्रों (खाँप) और उनकी पैतृक कुलदेवियों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
पिंजारा समाज का परिचय और नामकरण
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इस समुदाय को अलग-अलग नामों से जाना जाता है:
- राजस्थान और मध्य भारत: पिंजारा
- गुजरात: मंसूरी
- पंजाब: पंजा धुनिया तथा नद्दाफ
- बनारस (उत्तर प्रदेश): कटेस
यह समुदाय मुख्य रूप से राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में निवास करता है। ऐतिहासिक रूप से, इस समाज का मैसूर के शासक टीपू सुल्तान और प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय गायक जैन मलिक (Zayn Malik) से भी संबंध माना जाता है।
ऐतिहासिक उत्पत्ति और ‘मंसूरी’ नाम के पीछे की सूफी कथा
पिंजारा समाज की उत्पत्ति के दो मुख्य ऐतिहासिक पहलू हैं: पहला मध्य-एशियाई (फारस/अफगानिस्तान) प्रभाव और दूसरा भारतीय राजपूतों का धर्मांतरण।
यह समुदाय मूल रूप से फारस (ईरान) और अफगानिस्तान के क्षेत्रों से आता है। वे कपास की खेती और इससे संबंधित उद्योगों के उद्देश्य से अफगानिस्तान और फारस से भारत आए और अंततः भारतीय उपमहाद्वीप में बस गए। उस दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच कोई बंटवारा नहीं हुआ था. इसलिए, पिंजारा समुदाय दोनों देशों में पाया जाता है। समुदाय की उत्पत्ति अफगानिस्तान, फारस और अन्य दूर-दराज के क्षेत्रों से आए स्थानीय धर्मांतरितों और अप्रवासियों से जुड़ी हुई है जो भारतीय उपमहाद्वीप में बस गए। वे कपास की पारंपरिक खेती और व्यवसाय से जुड़ गए। कुछ पिंजारा व्यक्ति, इस्लाम में परिवर्तित होने का दावा करते हैं, और अपने आपको राजपूत वंश का होने का दावा करते हैं और राजा रणजीत सिंह के शासनकाल के दौरान राजस्थान से गुजरात चले जाने का दावा करते हैं, जहां वे बस गए और फले-फूले। आज भी, वे रावत, देवदा, चौहान और भट्टी जैसे उपनाम रखते हैं, जो उनके राजपूत वंश की याद दिलाते हैं।
पिंजारा समाज खुद को फख्र से ‘मंसूरी’ कहता है। इसके पीछे एक बेहद आध्यात्मिक और त्याग से भरी सूफी कथा है।
मंसूर अल-हल्लाज की कथा: ‘मंसूरी’ उपनाम प्रसिद्ध फारसी सूफी संत मंसूर अल-हल्लाज (Mansur al-Hallaj) से प्रेरित है। कहा जाता है कि मंसूर अल-हल्लाज स्वयं एक बहुत ही कुशल बुनकर और रूई धुनने वाले (Cotton Carder) थे। उन्होंने ईश्वर (अल्लाह) के प्रेम में “अनल-हक” (मैं ही सत्य हूँ / अहं ब्रह्मास्मि) का नारा दिया था, जिसके लिए उन्हें सूली पर चढ़ा दिया गया था। पिंजारा समाज उनके इस आध्यात्मिक त्याग, सादगी और पेशे (रूई धुनने) से खुद को जोड़ता है और गर्व से ‘मंसूरी’ उपनाम लगाता है।
पिंजारा समाज के व्यवसाय करने का तरीका :-
पिंजारा के पास रूई धुनने का बाँस का धनुष होता है, जिस पर तांत का एक डोरा बढ़ा रहता है तथा एक मूँगरी होती है, जिसके दोनों सिर गोल होते है और बीच में उसे पकड़ने के लिये गहरी जगह बनी रहती है। इसी यंत्र की सहायता से रूई की धुनाई व सफाई की जाती है। यह कच्ची रूई का जमीन पर ढेर लगा होता है। फिर बाये हाथ से धनुष पकड़ कर दूसरे हाथ में मुँगरी लेकर धनुष की ताँत पर चोट मारता है। फिर वह तांत के तार को रूई से हल्का छुआ देता है, जिससे कुछ रूई चिपक जाती है, तब यह लगातार मूँगरी मारता रहता है, फलस्वरूप रूई के छोटे छोटे रेशे होकर उड़कर गिर जाती है। इससे रूई साफ व स्वच्छ हो जाती है।
व्यवसाय का पारंपरिक तरीका: रूई धुनने की कला
पिंजारा समाज का पारंपरिक यंत्र रूई धुनने का एक विशेष प्रकार का बाँस का धनुष (धुनकी) होता है, जिस पर तांत का एक मजबूत डोरा बंधा होता है। इसके साथ एक लकड़ी की ‘मूँगरी’ (Mallet) होती है, जिसके दोनों सिरे गोल होते हैं।
प्रक्रिया: जमीन पर कच्ची रूई का ढेर लगाया जाता है। पिंजारा कारीगर बाएं हाथ से धनुष पकड़ता है और दाएं हाथ की मूँगरी से धनुष की ताँत पर चोट मारता है। तांत का कंपन (Vibration) रूई से छुआया जाता है, जिससे रूई के रेशे अलग होकर हवा में उड़ते हैं और सारी गंदगी नीचे गिर जाती है। इस मधुर ‘धुन-धुन’ की आवाज़ से ही इन्हें ‘धुनिया’ कहा जाने लगा।
एक अनोखी और लुप्तप्राय रस्म
पिंजारा जाति के इतिहास में विवाह की एक बहुत ही अनोखी रस्म हुआ करती थी, जो अब लगभग लुप्त हो गई है। जिस गाँव में बारात जाती थी, विवाह के पश्चात् बराती कुछ सूखे कांटे लेकर उस गाँव के जागीरदार के यहाँ जाते थे। वहाँ शराब का सेवन कर, उन कांटों में आग लगाई जाती थी और समाज का एक व्यक्ति उस जलती हुई आग (कांटों) में लोटता था। उनके इस अदम्य साहस को देखकर जागीरदार द्वारा उन्हें भारी इनाम दिया जाता था।
पिंजारा समाज के गोत्र और उनकी पैतृक कुलदेवियां (Gotra & Kuldevi)
‘मिशन कुलदेवी’ का मानना है कि धर्म बदलने से रक्त (DNA) और पूर्वज नहीं बदलते। पिंजारा (मंसूरी) समाज के लोग आज भी अपनी उन राजपूती खाँपों को मानते हैं, जिनका संबंध प्राचीन हिंदू कुलदेवियों से रहा है। ग्रामीण अंचलों में आज भी कई परिवार अपनी जड़ों का सम्मान करते हैं।
यहाँ पिंजारा समाज की प्रमुख खाँपें (गोत्र) और उनकी ऐतिहासिक पैतृक कुलदेवियों की सूची दी गई है:
| पिंजारा समाज की खाँप (Gotra) | ऐतिहासिक मूल (Ancestry) | पैतृक कुलदेवी (Ancestral Kuldevi) |
| गहलोत (Gehlot) | मेवाड़ के सूर्यवंशी राजपूत | बाण माता (Baan Mata) |
| राठौड़ (Rathore) | मारवाड़ के सूर्यवंशी | नागणेची माता (Nagnechi Mata) |
| भाटी / भट्टी (Bhati) | जैसलमेर के चंद्रवंशी | स्वांगिया माता / भादरिया माता |
| सोलंकी (Solanki) | चालुक्य वंश | क्षेमंकरी (खिंवज) माता / खोडियार माता |
| परिहार (Parihar) | प्रतिहार वंश | चामुंडा माता (Chamunda Mata) |
| परमार (Parmar) | अग्निवंशी राजपूत | अर्बुदा देवी / सच्चिया माता |
| देवड़ा (Deora) | चौहान वंश की शाखा | आशापुरा माता (Ashapura Mata) |
| मकवाणा (Makwana) | गुजरात/सौराष्ट्र मूल | झालाय माता / हरसिद्धि माता |
| खीजी कौर (Khiji Kaur) | क्षेत्रीय वंश | क्षेत्रीय देवी |
| भायल (Bhayal) | राजपूताना मूल | क्षेत्रीय देवी |
(नोट: यद्यपि यह समाज अब इस्लामिक आस्था का पालन करता है, फिर भी अपने पूर्वजों की ऐतिहासिक जड़ों (कुलदेवी) की जानकारी रखना हर वंश के लिए गर्व की बात है। यदि आपके गोत्र का नाम इस सूची में शामिल नहीं है, तो कृपया नीचे कमेंट बॉक्स में अपना गोत्र जरूर लिखें, ताकि अन्य लोगों को अपने इतिहास को जानने में मदद मिल सके।
(नोट: पंवार पिंजारे तो मुसलमान बनने के पश्चात भी मालवमाता की उपासना करते हैं, तभी आराधना स्वरूप चूरमा चढ़ाकर जोत करते हैं और धूप खेते हैं। धारवाड़ में कुछ मुल्तानी पिंजारे हैं जो अपना निकास बहलिम अथवा शेख से बतलाते हैं। )
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यदि किसी कारणवश आपको अपने गोत्र या अपनी कुलदेवी का नाम बिल्कुल नहीं पता है और परिवार या रिश्तेदारों से भी कोई जानकारी नहीं मिल पा रही है, तो निराश न हों! आप हमारी विशेष गाइड 👉 ‘मेरी कुलदेवी कौन है?’ को पढ़कर अपनी जड़ों और अपनी कुलदेवी को खोजने का सही रास्ता पा सकते हैं।)
पिंजारा (मंसूरी) समाज भारत और पाकिस्तान में साझा विरासत वाला एक ऐसा समुदाय है, जिसने अपने कलात्मक कौशल (कपास की धुनाई) से सदियों तक लोगों को गर्माहट (रजाई/कंबल) दी है। इनके इतिहास में प्रवासन, सांस्कृतिक संलयन, सूफीवाद और राजपूती शूरवीरता का एक अद्भुत संगम देखने को मिलता है। पिंजारा समाज भारतीय उपमहाद्वीप की उस साझी संस्कृति का अभिन्न अंग है, जिस पर हर भारतीय को गर्व होना चाहिए।


