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श्री सालासर बालाजी कथा, महिमा व मन्दिर का इतिहास

उत्तर चरित्र

दिन,महीने,वर्ष बीतते गये। मोहनदासजी का कठोर परिश्रम रंग लाया था। खेत में भरपूर फसल होती थी। घर में पर्याप्त गायें थीं, इसलिए दूध दही की कोई कमी नहीं थी। ये पिछले तीन वर्ष मोहनदासजी की लगन, परिश्रम और सेवानिष्ठा के वर्ष थे। रैवासा में उन्होंने पौरोहित्य विद्या सीखी थी, वह उदयराम को सीखा दी थी। उदयराम की आयु अब आठ वर्ष से ऊपर हो चुकी थी। गाँव में पूजा-पाठ के लिए उसे बुलाया जाने लगा था। इस प्रकार घर की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो गयी थी। कान्हीबाई की इच्छा थी कि भैया का विवाह हो जाये तो उसकी वंश परम्परा कायम रहेगी। वह जानती थी कि मोहन अनेक बार विवाह के प्रस्ताव ठुकरा चुका है। फिर उसने सोचा वो तो लड़कपन की बात थी। अब वह बहुत सयाना हो चुका है। सालासर में सर्वत्र उसकी सेवाभावना, परिश्रम,निष्ठा और समझदारी की प्रशंसा हो रही है। इसलिए अब पुनः प्रयास करना उचित है। कभी आशंका होती कि वह नाराज न हो जाये। ‘पर नाराजगी के भय से उसकी वंशपरम्परा तो नष्ट नहीं की जा सकती’ यह सोचकर वह बार-बार इस विषय में मोहन भैया से चर्चा करती, पर वे उसकी बात को हँसी में उड़ा देते।

एक बार वह भैया से उलझ पड़ी- ‘विवाह के बिना खानदान कैसे चलेगा। पितृऋण से मुक्त होने के लिए विवाह होना आवश्यक है’ इत्यादि बातें समझाते हुए उसने कहा कि विवाह के एक प्रस्ताव को मैंने स्वीकार कर लिया है। प्रस्ताव सालासर का बींजा नाई लाया था। मोहनदासजी उलझन में पड़ गये। वे अब हर-समय इस संकट से   मुक्ति के लिए श्री बालाजी से प्रार्थना करते रहते। कान्ही उनकी निरंतर बढ़ती अन्तर्मुखी वृत्ति से विचलित तो थी, पर उसने सोचा कि विवाह के बाद सब ठीक हो जायेगा।

एक दिन खिन्न व बेचैन मोहनदासजी को श्री बालाजी ने स्वप्न में बताया कि तुम व्यर्थ परेशान हो। जिस कन्या के साथ तुम्हारे विवाह की बात तय हुई थी उसकी तो आज मृत्यु हो गयी है। विधाता के लेख में उसकी इतनी ही आयु लिखी थी। मोहनदासजी ने स्वप्न की बात बतायी तो कान्ही ने कहा कि सपने तो सपने ही होते हैं। सपने की बात का बहम नहीं करना चाहिए। अगले दिन बींजा नाई सिंधारा लेकर कन्या के घर पहुँचा तो उसे बताया गया कि , कन्या की तो मृत्यु हो चुकी है। वह लंबे समय से बीमार थी। एक दिन पूर्व ही उसका निधन हो गया है। बींजा नाई ने सारी बात कान्ही को बता दी।

कान्हीबाई ने पुनः विवाह के लिए बात करनी चाही तो मोहनदासजी ने दृढ़तापूर्वक अपना ब्रह्मचर्यपालन का निश्चय बता दिया और विवाह के विषय में चर्चा न करने का अनुरोध किया। बाई को बुझे दिल से उनका अनुरोध मानना पड़ा।

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सालासर मोहनदासजी के लिए सेवातीर्थ बन गया था। गाँव में कहाँ कौन बीमार है इसका वे तुरन्त पता लगाकर सेवार्थ वहाँ जा पहुँचते।  गाँव में साधु सन्त आते तो वे उनकी मनोयोग से सेवा करते।  घर पर कोई आता तो उसे बिना खिलाये नहीं लौटने देते। खेत से कड़बी के पूले लाकर गाँव की निराश्रित गायों के चरने के लिए सार्वजनिक स्थान गुवाड़ में डाल देते। सालासर में एक फाटक था,जहाँ निराश्रित पशुओं को बंद कर दिया जाता था,ताकि वे खेतों को हानि न पहुँचायें। मोहनदासजी ने ठाकुर सालमसिंहजी को प्रेरित कर उस फाटक को गोशाला में परिवर्तित करा दिया। वे खेत से कड़बी के पूले वहाँ लेकर डाल देते। उनसे प्रेरित हो अन्य व्यक्ति भी ऐसा करने लगे। गाँव में जल की समस्या थी। इस समस्या के समाधान के लिए वे विचार करते रहते थे।

उदयराम की एक कुशल पंडित के रूप में ख्याति आस-पास के गाँवों तक फैल चुकी थी। जब वह विवाह के योग्य हो गया तो मोहनदासजी ने महंतजी से परामर्श कर उसका विवाह कर दिया। पुत्रवधू गृहकार्य में निपुण थी। अब कान्हीबाई घर-गृहस्थी के कार्य से फुरसत पाकर कुछ समय मोहनदासजी के साथ भगवच्चर्चा  बिताने लगी।

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                    आषाढ़ का महीना था। ज्येष्ठ की पहली वर्षा से धरती पर हरियाली की चादर बिछ चुकी थी। किसान खेतों में हल जोतने लगे थे। मोहनदासजी उदयराम के साथ खेत पहुँचे। वे खेत में उगी हुई फालतू झाड़ियों को काटकर खेत को जुताई-बुवाई के योग्य बनाने लगे। काम करते-करते मोहनदासजी ने एक झाड़ी को काटने के लिए ज्योंही गण्डासी चलायी तो गण्डासी उनके हाथ से छूटकर गिर पड़ी। उन्हें लगा कि जैसे किसी ने गण्डासी उनके हाथ से  झटके से छीनकर पटक दी है। दुबारा गण्डासी चलाने की कोशिश करने पर फिर वैसा ही हुअ। तीसरी बार पुनः प्रयास किया तो सहसा उनकी आँखें तीव्र प्रकाश से चौन्धिया गयीं। उन्होंने देखा कि वह झाड़ी प्रकाश से घिरी हुई है। उस झाड़ी में उन्हें भगवान् श्रीराम की छवि दिखाई दी। आँखें मलते हुए उन्होंने आस-पास दृष्टि दौड़ाई तो देखा कि बेरी,फोग,आक,बूई,खींप,सिणिया,खींप,साटा,भाँखड़ी,भरुँट सबमें भगवान् श्रीराम छवि झलक  थी। अब वे उन पर गण्डासी कैसे चलाते? तभी उनके कानों में एक गम्भीर आवाज गूँजी – ‘वत्स! लौकिक कर्मों के त्याग का समय आ गया है।’

                        मोहनदासजी गण्डासी छोड़कर पास की जाँटी के नीचे बैठ गये। बैठते ही ध्यान लग गया। ध्यानावस्था में श्री बालाजी ने प्रेरणा दी कि उदयराम का विवाह करते ही तुम्हारा संकल्प और सब कर्तव्यकर्म पूर्ण हो चुके हैन। अब तुम्हें घर त्यागकर साधु वेश धारण कर लेना चाहिए। मोहनदासजी को बैठा देखकर उदयराम समझे कि मामाजी का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। उन्होंने मोहनदासजी से घर जाकर आराम करने का अनुरोध किया तो वे घर की और चल पड़े।

घर आकर उन्होंने कान्हीबाई को घर छोड़कर साधुवेश धारण करने का निश्चय बताया तो वह व्याकुल हो गयी। रूँधे हुए गले से इतना ही कह सकी-‘कैसी बात करता है तू मोहन, पागल गया है क्या?’ मोहनदासजी ने बाई को शान्तिपूर्वक धैर्य बँधाते हुए सारी बात समझायी। वह दुविधापूर्ण उलझन में फस गयी थी। एक ओर वह मोहन भैया की खुशी और उत्साह को खण्डित नहीं करना चाहती थी तो दूसरी ओर उसे इस बात की ग्लानि थी,कि भैया ने तन-मन-धन सब कुछ मेरी सेवा और संरक्षण के लिए अर्पण कर उजड़ा हुआ घर फिर बसा दिया, पर भैया ने मुझे अपनी सेवा का कोई अवसर नहीं दिया। अब जब इसे सेवा की जरुरत पड़ेगी तो ये घर छोड़कर जा रहा है। पीड़ा भरे हृदय से बाई और उदयरामजी ने मोहनदासजी के अनुरोध को स्वीकार किया।

अगले दिन मंगलवार को मोहनदासजी साधुवेश में घर से विदा हो गये। उदयरामजी ने गाँव से बाहर उनकी चुनी हुई जगह पर एक कुटिया बनवा दी। कुटिया के आस-पास जाँटियों का एक झुरमुट सा था। पास ही एक जाल का पेड़ था। मोहनदासजी ने कुटिया के सामने एक धूणा स्थापित के लिया। धूणे के पास बैठकर वे दिनभर तपस्या करते। वे दिन में मौनव्रत रखते, इसलिए श्रद्धालु आते नहीं थे ताकि उनकी एकान्त साधना में विघ्न न हो। उदयरामजी या कान्हीबाई दिन में आकर आवश्यक व्यवस्था कर जाते थे। सायंकाल होते ही श्रद्धालुजन आ जुटते थे। शाम को सत्संग भजन-कीर्तन का कार्यक्रम होता था। रात्रि में वे देर रात तक ध्यानमग्न रहते।

वे रात-दिन आत्मस्वरूप का चिंतन-मनन करते। वे विचार करते कि ‘मैं कौन हूँ’। इस विचार को ही उन्होंने अपना जीवन का लक्ष्य बना लिया। इसी विचार में उनका समय बीतता। जैसे प्याज के छिलकों को एक-एक कर अलग कर देने से कुछ भी शेष नहीं रहता,उसी प्रकार गहन साधना से उन्हें ज्ञात हो गया कि ‘मैं’ नामक कोई वस्तु नहीं है। ‘मैं’ स्थूलशरीर नहीं हूँ। ‘मैं’ सूक्ष्मशरीर नहीं हूँ। ‘मैं’ कारणशरीर नहीं हूँ। ‘मैं’ आत्मा हूँ,एक विराट् अस्तित्वमात्र। एक परम आत्मा सर्वत्र विद्यमान है। ‘मैं’ नामक उपाधि उस विराट् परम आत्मा को क्षुद्र जीवात्मा में बदल देती है। सब कुछ परमात्मा है। सब चराचर जगत् राममय है। यह अनुभूति होते ही उनका मन अहर्निश राम में ही रमण करने लगा। प्राणिमात्र उन्हें राम का रूप नजर आने लगा। उनकी भक्ति पराकाष्ठा तक पहुँच गई थी। अहर्निश वे परावाणीरूप आदि राम नाम के श्रवण के आनंद में दुबे रहते।

इस अनन्नयभक्त की निष्ठा और समर्पण से प्रसन्न होकर परमपिता श्रीराम और माता जानकी जी ने प्रकट होकर उन्हें दिया। मोहनदासजी भावविभोर हो उनके चरणों में लोट गये। भगवान् ने वरदान देते हुए कहा कि तुम्हारी यह तपोभूमि मनोवांछित फल देने वाली होगी। यहाँ आने मात्र से मनुष्य दुःखमुक्त हो सुख-समृद्धि प्राप्त करेंगे। तुम्हारे गुरु हनुमानजी यहीं स्थायी रूप से विराजमान रहेंगे। माता जानकी ने उन्हें कवित्वशक्ति का वरदान दिया। माता जानकी की कृपा से मोहनदासजी के अंतःकरण में कवित्वशक्ति का जागरण हुआ तो वे पद्यों रचना करने लगे। वे गूढ शास्त्रीय रहस्यों को सरल मारवाड़ी भाषा में आसानी से श्रद्धालु को हृदयंगम करा देते थे। उनकी काव्यवाणी मोहनदासवाणी के रूप में प्रसिद्ध हुई। यह वाणी श्रद्धालुजनों के कण्ठ में विराजमान होने लगी।

एक दिन सालमसिंहजी ने पूछा की जीवन में दुःख ही दुःख है। दुःख से छुटकारा कैसे मिल सकता है? मोहनदासजी ने कहा कि  दुःख से मुक्ति दिलाने में तो भगवान् श्रीराम ही समर्थ हैं। यह संसार ही दुःखालय है। रामकृपा से ही व्यक्ति जीवन में दुःखमुक्त रहकर,अन्त में संसार में आवागमन मुक्त हो जाता है। शोभासर के ठाकुर धीरजसिंहजी भी वहीं थे। उन्होंने पूछा कि भगवान् श्रीराम के दर्शन व उनकी कृपा की प्राप्ति कैसे हो सकती है?

मोहनदासजी बोले कि भगवान् से मिलाप तो श्री हनुमानजी की शरण लेने से ही हो सकता है। अपनी बात को वाणीरचना में पिरोते हुए वे बोल उठे-

ले शरणू हणमान को मोहन करो मिलाप । 

राम सबल छण एक में मेटे दुःख विलाप ॥ 

एक बार राम नाम का महत्त्व बताते हुए मोहनदासजी बोले-

राम शब्द में परम सुख जे मोहन मिल ज्याव । 

चौरासी आवै नहीं जग में धका न खाव ॥ 

                         मुख से राम नाम का निरंतर जप करने से हृदय शुद्ध हो जाता है। फिर हृदय में अपने-आप रामनाम का जाप होने लगता है। इस जाप से हृदय में एक विराट् मौन का अवतरण होता है। फलस्वरूप नाभि में स्पन्दित परावाणीस्वरूप आदि रामनाम का साक्षात्कार होने लगता है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने इस ‘आदि रामनाम’ को सूर्य, चन्द्र व अग्नि का हेतु, ब्रह्मा, विष्णु और महेश का स्वरूप, वेद का प्राण, अगुन अनुपम और गुणनिधान बताया है-

 बन्दउँ नाम राम रघुवर को । 

हेतु कृशानु भानु हिमकर को ॥ 

विधि हरि हरमय वेद प्राण सो । अगुन अनुपम गुननिधान सो ॥ 

                               मोहनदासजी का उत्कट भक्तिभाव देखकर ग्रामवासी उन पर अनुरक्त थे। वे आदर से मोहनदासजी को बाबाजी कहने लगे थे। मोहनदासजी सबको भगवद्रूप में देखते और उनके दुःख-दर्द मिटाने के लिए प्रभु से प्रार्थना करते। उनके व्यवहार में सौम्यता, प्रेम और सदभाव रहते थे। कटुवचन तो उनके मुख से कभी निकलते ही नहीं थे क्योंकि उन्हें कभी किसी पर क्रोध नहीं आता था। वे सबके हृदय में श्रीराम का दर्शन करते थे। सायंकालीन सत्संग के समय भक्तजन मोहनदासजी के धूणे पर जुट जाते। उदयरामजी के घर दो पुत्र जन्मे थे। बड़ा पुत्र कनीराम इस समय 7 वर्ष का तथा छोटा पुत्र ईसरदास 5 वर्ष का था। दोनों धूणे पर जाने के लिए दादी कान्हीबाई से आग्रह करते। कान्हीबाई को कनीराम और ईसरदास के साथी बालक भी कान्हीदादी कहकर पुकारते। कान्हीदादी अपने दोनों पोतों व उनके साथियों को लेकर धूणे पर पहुँच जाती।

                              एक दिन कान्हीबाई कि सब लोग चले गए है तो उसने अपने मन की अभिलाषा प्रकट करते हुए मोहनदासजी से कहा- “भैया मेरे मन में बालाजी के दर्शन की अभिलाषा है। क्या मुझ अज्ञानिनी को भी वे दर्शन देंगें। मोहनदासजी बोले- बाई!तुमने यह कैसे सोच लिया कि बालाजी ज्ञानियों को ही दर्शन देते है? वे तो हृदय की प्रेमभरी पुकार पर रीझते हैं। तुम उन्हें पुकारो तो सही, वे अवश्य दर्शन देंगे।”

                              अब तो कान्हीबाई हृदय से बालाजी को पुकारने लगी। रात को इसी पुकार के साथ सोती। प्रातः दर्शन की पुकार के साथ ही जगती। इसी अभिलाषा के अनुरूप ही स्वप्न देखती। बालाजी कब तक उसकी व्याकुल पुकार की उपेक्षा करते। वे एक दिन साधुवेश में उसके द्वार पर जा पहुँचे। पर भक्त की परीक्षा लेने का उनका स्वभाव छूटता नहीं, सो ऐसे वक्त पहुँचे जब मोहनदासजी सुन्दरकाण्ड के पाठ के आयोजन में घर आये हुए थे। सब पाठ करके भोजन-प्रसाद पा रहे थे। आते ही भिक्षा के लिए आवाज लगायी। कान्हीबाई भोजन परोस रही थी। जैसे ही वह भोजन परोस कर चूरमा का प्रसाद साधुबाबा को अर्पण करने आयी, बाबाजी जा चुके थे। साधु के खली लौट जाने से कान्हीबाई को बड़ा दुःख हुआ। उसने साडी बात मोहनदासजी को बतायी तो वे हनुमानजी की लीला समझ गये। वे तत्काल आचमन करके उठे और साधु बाबा के पीछे भागे। उन्होंने साधुवेशधारी बालाजी के चरण पकड़ लिये तथा घर चलकर भोग लगाने का अनुरोध करने लगे। बालाजी हँसकर बोले- मैं तो परीक्षा ले रहा था। तुम दुःखी मत हो। कान्ही को समझाकर कहना कि मैं आश्विन की पूर्णिमा को घर आऊंगा। मोहनदासजी ने कान्हीबाई को सब बात बता दी।

                              ‘बालाजी मेरे घर पधारेंगे’ इस बात को सुनते ही कान्हीबाई का मनमयूर नाचने लगा। आश्विन की पूर्णिमा के अभी दो महीने पड़े थे, पर उसे ये दो महीने एक क्षण से भी छोटे लगे। हृदय में सच्चा प्रेम न हो तो साधक थोड़े समय की साधना और प्रतीक्षा से ही उकता जाता है, गहरा प्रेम हो तो ‘प्रभु मिलेंगे’ यह पता लग जाना ही बहुत बड़ा वरदान है। ऐसा साधक समय की गणना नहीं करता ।

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                        ‘आज आश्विन की पूर्णिमा है, बालाजी घर पधारेंगे’ इस कल्पनामात्र से ही कान्हीबाई भाव-विभोर थी। प्रेमरस में डूबी हुई वह भोजन की तयारी करने लगी। प्रातः जल्दी उठकर उसने अपने हाथों से बाजरे का मोटा आटा पिसा। बाजरे का रोटा बनाकर, उसे चूरकर घी और गुड़ डालकर चूरमा बनाया। हारे में कण्डों की मन्दी आँच में खीर पकाई। नयी चारपाई पर नये-नये गद्दे,चादर,तकिया आदि लगाकर स्वागत की पूरी तैयारी कर ली। सच्चा भक्त भगवान् को सर्वोत्तम वस्तु ही चाहता है, किन्तु भगवान् वस्तु को नहीं बल्कि वस्तु अर्पण करने वाले की भावना को ही देखते हैं। यहाँ तो वस्तु और भावना दोनों ही शुद्ध थे, सो श्रीबालाजी ही था। जैसे प्यासा प्राणी जल के लिए झटपटाता है, पानी में डूब रहा व्यक्ति साँस लेने के लिए के लिए तड़फता है और एक क्षण की भी देरी सह नहीं सकता, वैसी दसा जब प्रभुदर्शन के लिए भक्त की हो जाती है तो प्रभु कोभी एक क्षण का विलम्ब सहन नहीं होता। वे भक्त के सामने प्रकट होते ही हैं। श्रीबालाजी सन्तवेश में पधारे। चरण पखारकर उनको खीर चूरमे का भोग लगाया गया। घर में उत्सव का माहौल था। भोजन के बाद श्रीबालाजी चारपाई पर बिराजे। सबको रामभक्ति का उपदेश दिया। जाने से पूर्व अपने वास्तविक रूप में दर्शन दिये। अद्भुत तेजस्वी था वह रूप। उस तेज में न तो ताप था और न उससे नेत्र चौन्धियाते थे। सब उस दिव्य रूप के दर्शन कर धन्य-धन्य हो गए। सालासर में मूर्तिरूप में पधारकर विराजने का वचन देकर श्रीबालाजी अन्तर्धान हो गये।

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                           जोधपुर के राजसिंहासन पर अधिकार के लिए रामसिंह और विजयसिंह में संघर्ष चल रहा था। डीडवाना का मैदान युद्धभूमि बना हुआ था। रामसिंह की सहायता के लिए जयअप्पा के नेतृत्व में मराठा सेना डीडवाना जा रही थी। सेना के आगे-आगे चल रहे घुड़सवारों के अग्रिम दल ने सालासर के पास के मैदान को सेना के पड़ाव के लिए पसंद किया तथा सालासर के ठाकुर सालमसिंह को भोजन-पानी की व्यवस्था करने को कहा। छोटे गाँव का ठाकुर इतनी विशाल सेना के भोजन-पानी की व्यवस्था कैसे करे? वे घबराकर मोहनदासजी की शरण में पहुँचे। मोहनदासजी बोले- ‘डरने की कोई बात नहीं है। एक ध्वजा में धूणे की विभूति बांधकर, उसे तीर पर बांधकर सेना की दिशा में छोड़ दो। श्रीबालाजी सब ठीक करेंगे।’ ऐसा करते ही संकट टल गया। सेना वहाँ पड़ाव डाले बिना ही आगे बढ़ गयी। अब तो सालमसिंह मोहनदासजी के परमभक्त हो गए।

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                   विक्रम संवत् 1811, श्रावण शुक्ला नवमी, शनिवार के दिन नागौर राज्य के आसोटा ग्राम का एक किसान अपने खेत में हल चला रहा था। चलते-चलते बैल रुक गये। हल की नोक के पास से मिट्टी हटाने पर किसान ने वहाँ बालाजी की मूर्ति देखी। किसान ने मूर्ति गाँव के ठाकुर को देते हुए सारी घटना बतायी। ठाकुर ने देखा की मूर्ति में बालाजी के कन्धों पर राम-लक्ष्मण विराजमान थे। उन्होंने मूर्ति को हाथ जोड़कर प्रणाम किया तथा महल में रखवा लिया।

                     अकस्मात् ठाकुर को मूर्ति सर आवाज सुनायी दी- ‘मुझे सालासर पहुँचाओ।’ ठाकुर ने ध्यान नहीं दिया तो दुबारा आवाज आयी। फिर तीसरी बार जोर से आवाज आयी तो ठाकुर ने आज्ञा का पालन किया। उन्होंने मूर्ति को बैलगाड़ी द्वारा सालासर के लिए विदा किया। मोहनदासजी ने स्वप्न में श्रीबालाजी से मूर्ति के पधारने की सुचना पाकर अगवानी की। सालासर में मोहनदासजी के धूणे के पास बैल अपने आप रुक गये। वहाँ एक तिकोने टीले पर बालाजी की मूर्ति को पधराया गया। उस दिन श्रावण शुक्ला दशमी का रविवार था।

                      मूर्ति की स्थापना के बाद सबने मिलकर मूर्ति के ऊपर एक छप्पर तान दिया। जब छप्पर लगाने का कार्य चल रहा था तो जुलियासर के ठाकुर जोरावरसिंह उधर के रस्ते से गुजरे। जब उन्हें पता चला कि यहाँ बालाजी की मूर्ति स्थापित की गयी है तो उन्होंने मन-ही-मन पीठ का फोड़ा ठीक करने हेतु बालाजी से प्रार्थना की। यह फोड़ा उन्हें लंबे समय से कष्ट दे रहा था। रात्रि में ही उनका फोड़ा मिट गया तो उन्होंने पत्नी सहित बालाजी के दर्शन कर गठजोड़े की जात दी तथा श्रद्धापूर्वक भेंट चढ़ायी।

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                        श्रावण शुक्ला एकादशी सोमवार की रात्रि को श्रीबालाजी के जागरण का भव्य आयोजन किया गया। जागरण में सालासर के ठाकुर सालमसिंह, जुलियासर के ठाकुर जोरावरसिंह, शोभासर के ठाकुर धीरजसिंह, सेवदड़ा के ठाकुर बदनसिंह व रूल्याणी से पाटोदिया परिवार के सदस्य आये। रूल्याणी, नेछवा, सीकर, फतेहपुर, सुजानगढ़, बीदासर, रामगढ़, चूरू आदि शहरों से अनेक वैश्यपरिवार भी जागरण में आये। श्रीबालाजी ने रामगढ़ के एक पोद्दार वैश्य की डाकुओं से रक्षा की थी। वह सीकर नरेश देवसिंह का खजांची था। उससे बालाजी के चमत्कार की चर्चा दूर-दूर तक फैल गयी थी। मोहनदासजी के निर्देशानुसार उदयरामजी ने स्वयं जा-जाकर तथा सन्देश भेज-भेज कर श्रद्धालुजनों को आमन्त्रित किया था।

                          मंगलवार को श्रीबालाजी का स्नान-मार्जनादिपूर्वक पूजन, सिन्दूरलेपन व श्रृंगार किया गया। उस समय मोहनदासजी प्रेम की विलक्षण दशा में थे। बचपन से बालाजी के जिस संत रूप का दर्शन करते रहे थे, वही रूप उनके मन-मस्तिष्क व नेत्रों में समाया हुआ था। उस समय उनकी समग्र चेतना उसी रूप से एकाकार हो गयी थी। उसी भावदशा में श्रृंगार का कार्य सम्पन्न हुआ। भावसमाधि टूटी तो देखा कि मूर्ति पर उनके द्वारा बालाजी का वही रूप बना दिया गया था। तभी उनके कानों में श्रीबालाजी की वाणी गूँजी- ‘वत्स!सालासर में मैं इसी रूप में रहूँगा।’ तुम्हारे द्वारा बनाया गया यह रूप मुझे अतिप्रिय है। भोग भी तुम्हारी रूचि का लगाना- ‘वही मोठ-बाजरे की खिचड़ी।’ श्रीबालाजी की इस भक्तवत्सलता से मोहनदासजी के नेत्रों से प्रेमाश्रु झरने लगे। उन्होंने दीनतापूर्वक प्रार्थना करते हुए कहा- हे हनुमानजी महाराज!आपने सालासर पधारकर इस दास के हृदय में हर्ष का संचार किया है। आपके पधारने के बाद यह पहला मंगलवार आया है। आपने मुझे अपनाकर बड़ी कृपा की है। इस अवसर पर मेरी यही प्रार्थना है कि मुझे मोह-माया की पहुँच से ऊपर ही रखना। उनके मुख से यह वाणी निकल पड़ी-

हणमत थारे हरष पछें आयो मंगलवार । 

   ऊँचा म्हाने राखज्यो अंजनी राजकुँवार ॥

                        इसके बाद श्रीबालाजी महाराज को दाल-चूरमा के साथ मोठ-बाजरे की खिचड़ी का विशेष भोग लगाया गया। सब सन्तों और श्रद्धालुजनों ने प्रसाद पाया।

                         कुछ समय बाद ही मन्दिर का कार्य प्रारम्भ हो गया। श्रद्धालुजनों के प्रयास से संवत् 1815 में मन्दिर बनकर तैयार हो गया। मन्दिर में मूर्ति की स्थापना हुई। इस अवसर पर मोहनदासजी के बचपन के साथी सन्त राघवदासजी पुष्कर से पधारे। दूसरे साथी गरीबदासजी ने भी संन्यास ले लिया था। वे मोहनदासजी की जन्मभूमि रूल्याणी में रहकर ही तपस्या करते थे। वे भी इस अवसर पर पधारे। राघवदासजी ने मसखरी करते हुए मोहनदासजी से कहा- भैया!भगवान् मायाजाल फैलाकर भक्त की परीक्षा लेते हैं। आपके इस स्थान पर भी माया बरसने लगी है। सावधान रहना। माया भी मद्य के समान मादक होती है।

मोहनदासजी ने हँसते हुए उत्तर दिया –

माया मद्य बताय द्यो हाथ न भेडां म्हे । 

अंजनिसुत की आन कढ़ास्यां म्हाने कहसी के ॥   

                           भैया!आप माया को मद्य बताते रहो। मुझे माया से क्या भय है? मैं तो इसके हाथ भी नहीं लगाता। मैंने माया को अंजनीसुत श्री हनुमानजी की शपथ दे रखी है। यह मुझे क्या कहेगी?

तभी उनके मुख से एक और वाणी निकल पड़ी –

माया मोहनदास नै दयी बंकड़े बीर । 

मांगल जीमो मेदनी दही चूरमा खीर ॥ 

                       मोहनदास को यह माया श्रीबालाजी ने दी है। यह माया उन्हीं को अर्पित है। उनके दर पर सारी धरती के भक्तजन मंगलवार को दही,चूरमा और खीर जीमते ही रहेंगे। यह परम्परा कभी टूटेगी नहीं।

                       मोहनदासजी ने विधि विधान से श्रीबालाजी की सेवा-पूजा प्रारम्भ कर दी। वे प्रातः 4 बजे उठकर नगारा बजाते। स्नानादि से निवृत्त होकर कुएँ के जल से गर्भगृह का प्रक्षालन कर अखण्ड डीप को घृत से पूरते। मंगला भोग निवेदित कर मंगला आरती करते। प्रसाद बाँटते। दोपहर में वैदिक विधान से राजभोग निवेदित करते। सायंकाल संध्या आरती करते। स्तुति के पश्चात् बालभोग लगाते। सभी बाल-गोपाल व भक्तजन भोग-प्रसाद पाते। इसके बाद शयन-आरती करते।

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                       दूर-दूर के यात्री श्रीबालाजी के दर्शन के लिए आने लगे थे। जात-जडूला, जागरण, सवामणी आदि के लिए श्रद्धालुओं का आगमन होता रहता था। संवत् 1844 में सीकरनरेश राव देवीसिंह ने राजकुमार लक्षमणसिंह के जडूले (मुण्डन) का संस्कार किया। श्रीबालाजी की कृपा से राव देवीसिंह ने सीकर पे हुए शत्रुओं के आक्रमण को विफल कर दिया। तब उन्होंने मन्दिर-परिसर में भवन का निर्माण कराया, जिससे यात्रियों के लिए ठहरने की उत्तम व्यवस्था हो गयी।

                        मोहनदासजी कोमल हृदय के क्षमाशील सन्त थे। उनकी इस विशेषता ने उन्हें सन्तशिरोमणि के रूप में विख्यात कर दिया। एक बार रात्रि में कुछ लुटेरे उदयरामजी के घर में घुस गये। लुटेरों से घर की रक्षा करते हुए उदयरामजी घायल हो गये। कनीराम और ईसरदास कान्हीदादी तथा गाँव वालों की सहायता से उदयरामजी को मन्दिर ले आये। मोहनदासजी ने मरणासन्न और बेहोश उदयरामजी को श्रीबालाजी के सामने लेटा दिया तथा धूणे की विभूति उनके माथे पर लगायी। वे करुण स्वर में उनके प्राणों की रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगे। उनकी करुण पुकार सुनकर श्रीबालाजी ने उदयरामजी को जीवनदान दिया। उन्हें तत्काल होश आ गया तथा घावों की पीड़ा भी मिट गयी।

                         उधर कोलाहल से ग्रामीण जग गए। वे भागते हुए लुटेरों को पकड़कर मन्दिर में ले आये। लुटेरों ने अपराध के लिए क्षमा माँगी। ठाकुर सालमसिंहजी पता चलते ही मन्दिर में पहुँच चुके थे। वे लुटेरों को दण्डित करना चाहते थे, किन्तु सन्त का हृदय तो मक्खन से भी अधिक कोमल होता है। करूणामूर्ति मोहनदासजी ने उन लुटेरों को क्षमा कर दिया। लुटेरों लका हृदय बदल गया। वे लूटपाट छोड़कर नेकी के रस्ते पर चलने लगे।

                         इसी प्रकार उन्होंने एक मरते हुए किसान के प्राण बचाये। मोहनदासजी जिस जाँटी के नीचे तपस्या करते थे, उनकी साँगरी कहना निषिद्ध था। एक किसान ने उस जाँटी की साँगरी की सब्जी बनाकर खा ली। खाते ही वह बीमार पड़ गया। उसे मरणासन्न हालत में मन्दिर लाया गया।

                         मोहनदासजी का करुणापूर्ण हृदय उसे देखते ही द्रवित हो गया। उन्होंने धूणे की विभूति उसके माथे पर लगा दी। लगाते ही वह स्वस्थ हो गया। उसने अपनी भूल के लिए क्षमा माँगी।

                         अन्तिम समय में कान्हीबाई अस्वस्थ रहने लगी थी। मोहनदासजी नित्य एक बार उसे सम्भालने अवश्य जाते और रामनाम की महिमा सुनाकर नाम जपने का उपदेश देते। कान्हीबाई की मृत्यु के बाद उनका कुटिया से बहार जाना कम हो गया। वे अधिकांशतः मौन व ध्यानमग्न ही रहते। मन्दिर की पूजा व्यवस्था का कार्य उदयरामजी को सौंप दिया। पर उनकी सेवा की प्रवृति में कोई कमी नहीं आयी थी। गाँव में पानी की कमी से ग्रामवासी परेशान थे। उन्होंने सं. 1848 में मन्दिर में भेंट में आयी धनराशि से लोकहितार्थ एक तालाब का निर्माण कराया। इससे ग्रामीणों और श्रद्धालु यात्रियों की जल की समस्या का समाधान हो गया। उन्होंने यात्रियों के ठहरने के लिए सात तिबारों का निर्माण कराया। यात्रियों के लिए भोजन-प्रसाद की व्यवस्था सेवाभाव से की जाती थी।

                          संवत् 1850 की वैशाख शुक्ला त्रयोदशी को सन्तशिरोमणि मोहनदासजी ने जीवित समाधी लेने का निश्चय किया। उनके संकल्प को जानकार उदयरामजी और अन्य सब श्रद्धालुजन व्याकुल हो गये। पर जीवन्मुक्त सिद्ध सन्त शरीर के मोह से ऊपर उठ जाते हैं। उनके मन में जीने की भी कामना नहीं रहती। प्रेम की पराकाष्ठा में भक्त के लिए आराध्य का क्षणिक वियोग भी असह्य हो जाता है। उसे यह शरीर प्रभु से शाश्वत मिलन में बाधक लगता है। वह मुक्ति चाहता नहीं,क्योंकि मुक्ति होने पर भक्ति संभव नहीं। ऐसा भक्त समाधी के योग से इस भौतिक शरीर को ही दिव्यशरीर बना लेना चाहता है। प्रेम की यह दशा दैवी कृपा है जो विशिष्टजन पर ही उतरती है। मोहनदासजी की समाधी के दिन जिन-जिन को सुचना मिली वे सब मन्दिर में उपस्थित हो गये।

                           सूर्यदेव का रथ अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था। आसमान में सिन्दूरी लालिमा घिर आयी थी। अस्त होता हुआ सूर्य उसी तरह लाल-लाल प्रकाश से शोभायमान था, जैसे उदय के समय होता है। श्रद्धालुजनों की पुष्पवर्षा के बीच सन्तशिरोमणि मोहनदासजी जीवित समाधिस्थ हो गये। समर्पित सेवा से इतिहास का एक अध्याय पूर्ण हो गया, ताकि अनुयायीजन द्वितीय अध्याय  शुभारम्भ कर सकें। वट का बीज धरती माता के गर्भ में जाकर अपने आपको विसर्जित कर देता है ताकि उससे उत्पन्न वटवृक्ष अनन्त बीजों दे सके।

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                            पं. उदयरामजी के द्वारा संवत् 1852 में समाधिस्थल पर कान्हीबाई और मोहनदासजी की छतरियों का निर्माण कराया गया। समाधिस्थल अब मोहनमन्दिर के नाम से विख्यात है। यहाँ भाई-बहन चरण चिन्ह (पगल्या) पास-पास स्थित हैं। लक्ष्मनगढ़ के पं. जानकीलालजी पारीक सालासर में रहकर समाधी स्थल पर नित्य नियम से पूजा करते थे। उनके पुत्र पन्नारामजी पारीक भी विरक्त हो सालासर आ गये। वे अंजनीमाता की उपासना करने लगे। अंजनीमाता की उनपर कृपा हुई। उन्होंने अंजनीमाता के मन्दिर का निर्माण कराया। सालासर आने वाले भक्तजन श्रीबालाजी और अंजनीमाता के दर्शन कर अपने जीवन को सफल करते हैं। सन्तशिरोमणि मोहनदासजी द्वारा जिस सेवायज्ञ का शुभारम्भ किया गया था उसे उदयरामजी व परवर्ती पुजारी-परिवार ने जारी रखा। श्रीमोहनदासजी के आदर्श के अनुरूप सेवाकार्य को सुव्यवस्थित रूप से चलने के लिए ‘हनुमान् सेवा समिति’ की स्थापना की गयी। ‘हनुमान् सेवा समिति’ द्वारा शिक्षा,चिकित्सा,यात्री-आवास,मेलाव्यवस्था आदि विभिन्न क्षेत्रों में सेवाकार्य किये जा रहे हैं। श्रीमोहनदासजी ने सेवारुपी वट का जो पौधा लगाया था, वह सुयोग्य हाथों से सिञ्चित व संरक्षित होकर महान वटवृक्ष का रूप धारण कर चुका है। गोभक्त श्रीमोहनदासजी की गोसेवा की परम्परा को उनकी जन्मभूमि रूल्याणी ग्राम ने भी संजोकर रखा है। रूल्याणी गाँव में उनकी स्मृति में ‘सन्तशिरोमणि मोहनदासजी गोशाला’ की स्थापना कर गायों की निष्ठापूर्वक सेवा की जा रही है।

इति

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Sanjay Sharma
Sanjay Sharma is the founder and author of Mission Kuldevi inspired by his father Dr. Ramkumar Dadhich. Mission Kuldevi is trying to get information of all Kuldevi and Kuldevta of all societies on one platform.

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