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Navapad Oli Jain Community’s Festival | नवपद ओली जैन समाज के त्यौहार की उपयोगी जानकारियाँ

Navpad Oli | Navapad Oli | Siddha Chakra Yantra | Ayambil Tapa | Shri Siddha Chakra Mahayantram | Dev Tattva | Guru Tattva | Dharma Tattva | Celebration and Rituals of Navapad Oli | Days and Lunar dates of Navpad Oli for worshiping Navpad | Benefits of Ayambil Tapa | Change of Weather and Science of Navpad | Chaitra Navapad Oli | Ashwin Navapad Oli

Navapad Oli in Hindi : जैन समुदाय में प्रत्येक वर्ष दो बार नवपद ओली का महोत्सव मनाया जाता है जो नौ दिनों तक रहता है । पहला  नवपद ओली चैत्र माह (मार्च / अप्रैल) के शुक्ल पक्ष के दौरान आता है, और दूसरा नवपद ओली अश्विन महीने (सितंबर / अक्टूबर) के शुक्ल पक्ष  में आता है।  यह दोनों महीनों में शुक्ला सप्तमी और पूर्णिमा के बीच होता है। नवपद ओली नवरात्रि के त्योहार के आसपास शुरू होती है।

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अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु, सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र और सम्यक तप जैसे नौ सर्वोच्च पदों को नमन करने के लिए जैन समाज के लोग नौ दिनों तक आयंबिल तप का पालन करते हैं।आयंबिल एक प्रकार का उपवास है जिसमें भक्त केवल एक बार उबला हुआ अनाज खा सकते हैं। यह भोजन बिना नमक या चीनी या तेल – मसालों के तथा सरल होना चाहिए।

महत्त्व और किंवदंती  | Significance and Legend of Navapad Oli :

लगभग ग्यारह लाख वर्ष पूर्व, 20 वें तीर्थंकर मुनिसुवरत स्वामी के समय, राजा श्रीपाल कुष्ठ रोग से पीड़ित था। उसका विवाह मयनसुन्दरी से हुआ था, जो राजा को अन्य 700 कुष्ठरोगियों के साथ कुष्ठरोग से निदान के लिए के लिए मुनिचन्द्र नाम के एक संत के पास ले गई। मुनिचन्द्र ने उन्हें सिद्धचक्र महापूजा (9 दिनों की अवधि के लिए विशेष रूप के उपवास “ओली” के साथ) करने का निर्देश दिया। नवपद को सिद्धचक्र भी कहा जाता है। सिद्ध चक्र एक यंत्र है जिसमें 9 सर्वोच्च पदों की स्थिति लक्षित है, जिन्हें दो समूहों में वर्गीकृत किया जाता है –

  1. पंच परमेष्ठी (अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु)
  2. धर्म तत्त्व (सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र, सम्यक तप)

पहले पांच पदों को पंच परमेष्ठी के रूप में जाना जाता है और शेष चार पदों को धर्म तत्त्व के रूप में जाना जाता है। अन्तिम चार पद या धर्म तत्त्व महान गुण हैं, जो अनुसरण करने पर मुक्ति के मार्ग पर अग्रसित करते हैं।

नवपद को सिद्धचक्र भी कहा जाता है। यह एक यंत्र है जिसमें सिद्ध को शीर्ष पर रखा गया है। अरिहंत केंद्र में और आचार्य अरीहंत के दायीं ओर स्थित है। उपाध्याय को नीचे की ओर और अरिहंत के बाईं ओर साधु को रखा गया है। सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र और सम्यक तप चारों कोने में ऊपरी दाएं कोने से शुरू होकर फिर दक्षिणावर्त (घड़ी के अनुसार) चलते हैं। 

Shri Siddha Chakra Mahayantram

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Shri Siddha Chakra Yantram

उत्सव और अनुष्ठान | Celebration and Rituals:

नवपद ओली चैत्र व अश्विन सुदी सप्तमी से प्रारम्भ होकर चैत्र व अश्विन सुदी पूर्णिमा तक मनाई जाती है।   नवपद ओली तप त्यौहारों को शाश्वती या स्थायी माना जाता है। जिसका मतलब है कि नवपद ओली त्यौहार सभी समय में विद्यमान हैं अर्थात् अतीत, वर्तमान और भविष्य। इन दिनों के दौरान, नवपद की प्रतिदिन पूजा की  जाती है। नौ दिन के प्रत्येक दिन, यह त्यौहार सिद्ध चक्र के नौ पदों के लिए समर्पित है।

इन नौ दिनों के दौरान, भक्त आयंबिल तप का पालन करते हैं। वे दिन में एक बार खाना खाते हैं। भोजन सरल तथा बिना मसाले, दूध, दही, घी, तेल, हरी / कच्ची सब्जियां, जड़, फलों और चीनी के केवल उबला हुआ अनाज ही होता है।

देव तत्त्व | Dev Tattva :

पहला दिन : अरिहंत पद | Arihant Pad –

जिसका अर्थ  है वह, जिसने घृणा, क्रोध, अहंकार और मोह जैसे आंतरिक शत्रुओं को जीत लिया हो। यह सिद्धचक्र के मध्य में स्थित है। अरिहंत प्रकृति की सर्वोच्च शक्ति है। वह एक भौतिक शरीर के साथ ब्रह्मांड में सबसे शुद्ध आत्मा होता है। अरि का अर्थ है ‘शत्रु’ और हन्त का अर्थ है ‘नाश करने वाला’। यहां शत्रु आंतरिक हैं और ये हैं – राग (मोह) और द्वेष (घृणा)। इसलिए अरिहंत सांसारिक राग और द्वेष से मुक्त है और वीतराग के रूप में जाना जाता है। वह संपूर्ण संतुलन में एक भौतिक शरीर के साथ संसार में रहता है। वह संपूर्ण ज्ञान वाले सार्वभौमिक पर्यवेक्षक भी हैं जो ‘केवल ज्ञान’ है।

वह वास्तविक आध्यात्म का प्रचार करता है। वह चतुर्विध संघ भी स्थापित करता है। साधु (पुरुष संन्यासी-भिक्षु), साध्वी (महिला संन्यासी-नन), श्रावक (गृहस्थ अनुयायी पुरुष) और श्राविका (गृहस्थ अनुयायी महिलायें) इस संघ के घटक हैं जिन्हें तीर्थ भी कहा जाता है। अरिहंत तीर्थ को स्थापित करता है, इसलिए उसे तीर्थंकर भी कहा जाता है।

जैन अनुयायी नवप्रद ओली के प्रथम दिन शुक्ला सप्तमी को ‘अरिहंत पद’ की पूजा करते हैं। वे केवल उबले हुए चावल खाकर आयंबिल तप करते हैं। अरिहंत का रंग सफेद है, इसलिए इस दिन आयंबिल के लिए चुना गया अनाज सफेद है, अर्थात चावल। वे दिन में अरिहंत की पूजा और ध्यान करते हैं।

दूसरा दिन :  सिध्द पद | Siddha Pad – इसका अर्थ है ‘मुक्त आत्मा’।

यह नवपद का दूसरा पद है और सिद्धचक्र यंत्र के शीर्ष पर स्थित होता है।  यह देव तत्त्व में से एक के रूप में भी माना जाता है। सिद्ध प्रकृति की सर्वोच्च शक्ति है। वह बिना भौतिक शरीर के  ब्रह्मांड में सबसे शुद्ध आत्मा है। मोक्ष प्राप्त करने के बाद व्यक्ति सिद्ध हो जाता है। सिद्ध भी एक वीतराग और सार्वभौमिक पर्यवेक्षक है लेकिन धर्मोपदेश नहीं करता क्योंकि उनके पास कोई भौतिक शरीर नहीं है। वह संपूर्ण संतुलन, अनन्त शांति और आनंद में रहता है। वह पूर्ण गतिहीन आराम में रहता है।

सिद्ध सब कर्मों से मुक्त है और सांसारिक आत्मा के रूप में रहने का कोई कारण नहीं है, इसलिए कोई पुनर्जन्म नहीं है। वह हमेशा ब्रह्मांड के ऊपर सिद्ध शिला पर रहता है। उसके पास आठ सर्वोच्च गुण हैं और प्रतीकात्मक रंग लाल द्वारा दर्शाया गया है।

जैन अनुयायी नवपद ओली के दूसरे दिन शुक्ल अष्टमी को सिद्ध पद की पूजा करते हैं। वे केवल उबला हुआ गेहूं खाकर आयंबिल तप करते हैं। सिद्ध का रंग लाल है, इसलिए आयंबिल के लिए चुना गया अनाज लाल है, अर्थात गेहूं। वे दिन के दौरान सिद्धपद की पूजा और ध्यान करते हैं।

गुरु तत्त्व | Guru Tattva :

तीसरा दिन : आचार्य पद | Aacharya Pad – आध्यात्मिक गुरु।

आचार्य नवपद में तीसरा पद है और यह सिद्धचक्र यंत्र में अरिहंत के दाहिनी तरफ  स्थित होता है।

यह गुरु तत्त्व में पहला है। आचार्य अरिहंत के उत्तराधिकारी हैं और अरिहंत द्वारा स्थापित चार संघ के नेता हैं। अरिहंत की अनुपस्थिति में वह संघ से संबंधित सभी मामलों में सर्वोच्च और परम निर्णय लेने का अधिकारी है। वह जैन आगम शास्त्रों की व्याख्या का परम अधिकारी भी है।

वह पांच अध्यात्मिक संचालनों, ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चरित्राचार, तपाचार और वीर्याचार के लिए भिक्षुओं और ननों को पर्यवेक्षित तथा प्रेरित करता है। पहले चार आचार सिद्धचक्र के अंतिम चार पदों से संबंधित हैं। पांचवां वीर्याचार , उत्साह और इन चारों का पालन करने की शक्ति है। आचार्य में छत्तीस गुण हैं और सुनहरा पीला रंग इनका प्रतीक है।

जैन अनुयायी नवपद ओली के तीसरे दिन शुक्ल नवमी को आचार्य पाद की पूजा करते हैं। वे केवल उबले हुए चने खाकर आयंबिल करते हैं। आचार्य का रंग सुनहरा पीला है, इसलिए आयंबिल के लिए चुना गया अनाज पीला है अर्थात चने। इस दिन आचार्य पद की पूजा व ध्यान करते हैं। 

चौथा दिन : उपाध्याय पद | Upadhyay Pad – आध्यात्मिक शिक्षक।

उपाध्याय नवपद में चौथा पद है और सिद्धचक्र यंत्र में अरिहंत के निचले हिस्से में स्थित है।

यह गुरु तत्त्व में दूसरा है।  वह सभी जैन आगम, ग्यारह अंग और और चौदह पूर्व  को जानने वाला होना चाहिए।  ये उनके पच्चीस गुण हैं। वह संघ में अकादमिक गतिविधियों के लिए जिम्मेदार है। वह भिक्षुओं और ननों को उपदेश देता है और सिखाता है। वह आचार्य के एक मंत्री के समान है। कुछ पवित्र जैन ग्रंथों में उन्हें आचार्य के राज्य में राजकुमार के रूप में चित्रित किया गया है।

इस दिन जैन अनुयायी केवल उबला हुआ मूँग खाने से आयंबिल करते हैं। उपाध्याय का रंग हरा है, इसलिए आयंबिल के लिए चुना गया अनाज हरा है अर्थात मूँग। वे दिन के समय उपाध्याय की पूजा और ध्यान करते हैं।

पाँचवा दिन : साधु पद  | Sadhu Pad – भिक्षु।

साधु नवपद में पांचवा पद हैं और सिद्धचक्र यंत्र में अरिहंत के बाईं ओर स्थित है। वह गुरु तत्त्व में तीसरे स्थान पर है। उन्होंने घर छोड़ दिया है। उन्होंने स्वयं को अरिहंत द्वारा प्रचारित और आचार्य द्वारा अनुशासित पवित्र मार्ग के लिए समर्पित किया है। उन्होंने स्वयं को उस पवित्र मार्ग के लिए समर्पित कर दिया है जो मोक्ष की ओर जाता है और चार पवित्र गुणों का पालन करता है।

वह 5 अवगुणों से बचे रहने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध होता है – 1. हिंसा 2. झूठ 3. चोरी करना 4. यौन क्रियाएं और 5. सांसारिक संपत्ति। वह सभी परिस्थितियों  में संतुलन में रहने का अभ्यास करता है और जानता है कि शांति तपस्या का सार है। वह नंगे पैर चलता है और किसी भी प्रकार के वाहनों का उपयोग नहीं करता है। वह खुद या दूसरों के लिए खाना नहीं बनाता हैं और गृहस्थों द्वारा प्रदान किया गया भोजन ही ग्रहण करता हैं। वह किसी भी रूप में धन या कोई सांसारिक संपत्ति नहीं रखता है।

उनके पास सत्ताईस गुण हैं, और काला रंग इनका प्रतीक है।

जैन अनुयायी शुक्ल एकादशी के दिन साधु पद की पूजा करते हैं। वे केवल उबला हुआ उड़द खाकर ही आयंबिल करते हैं। साधुपद का प्रतीक रंग काला है, इसलिए आयंबिल के लिए चुना गया अनाज काला है – उड़द।  वे दिन में साधुपद पूजा और ध्यान भी करते हैं।

धर्म तत्त्व | Dharma Tattva :

छठा दिन : सम्यक दर्शन | Samyag Darshan – सही विश्वास।

संस्कृत में सम्यक का मतलब है “सही” और दर्शन का मतलब है ”दृश्य”। यह अरिहंत के उपदेश में विश्वास को भी दर्शाता है। सम्यक दर्शन सभी धर्मों की जड़ है। केवल सही दृष्टिकोण के साथ धर्म का पालन किया जा सकता है। यह  मुक्ति प्राप्त करने के लिए जैन धर्म में तीन रत्नों में से पहला है। सम्यक दर्शन का प्रतीक रंग सफेद है।  शुक्ल द्वादशी पर आयंबिल उबले हुए चावल खाकर मनाया जाता है।

सातवां दिन : सम्यक ज्ञान | Samyag Jnan / Gyan – सही ज्ञान।

सम्यक ज्ञान सही ज्ञान को संदर्भित करता है। शास्त्रों के अनुसार, सभी कार्यों को सही ज्ञान से किया जाना चाहिए। मुक्ति पाने के लिए यह दूसरा रत्न है। इसमें पांच उप विभाग और इक्यावन गुण हैं और इसका प्रतीकात्मक रंग सफेद है। शुक्ल त्रयोदशी को आयंबिल केवल उबले हुए चावल खाने से मनाया जाता है।

आठवां दिन : सम्यक चरित्र | Samyag Charitra  – सही आचरण।

संस्कृत में चरित्र का मतलब ‘आचरण’ है। इस प्रकार सम्यक चरित्र से तात्पर्य  ‘सही आचरण’ है। मोक्ष प्राप्त करने के लिए यह तीन रत्नों में से तीसरा है। इसमें सत्तर गुण हैं और प्रतीक रंग सफेद है। शुक्ल चतुर्दशी पर आयंबिल केवल चावल खाकर मनाया जाता है।

नवां दिन : सम्यक तप | Samyag Tapa – सही तपस्या।

सम्यक तप का मतलब सही परिप्रेक्ष्य में तपस्या है। इस संदर्भ में तपस्या का अर्थ है सांसारिक इच्छाओं से दूर रहना। सम्यक तप का उद्देश्य संतुलन में रहना है। संतुलन को दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जाता है: आंतरिक और बाहरी। व्रत, तपस्या आदि कुछ बाहरी संतुलन के प्रकार हैं।  विनम्रता, ध्यान आदि आंतरिक संतुलन के प्रकार हैं। सम्यक तप का प्रतीक रंग सफेद है। नवपद ओली के अंतिम दिन पूर्णिमा को आयंबिल केवल उबले हुए चावल खाने से मनाया जाता है।

जो लोग आयंबिल तप करने में असमर्थ हैं, वे निम्नलिखित कार्य कर सकते हैं:

  • इन 9 दिनों में जड़ खाने से बचें।
  • जितना संभव हो सके, चौविहार (किसी भी तपस्या में सूर्य छिपने के बाद से सूर्य निकलने तक कुछ भी न खाना होता न पीना, जिसे चौविहार कहते है ) का पालन करें । कम से कम सप्ताह के अंत में अवश्य करें।
  • जितने अधिक से अधिक दिन संभव हो, लोगस्स और नवकारवाली करें।

मौसम का बदलाव और नवपद का विज्ञान | Change of Weather and Science of Navpad :

 पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है और दिन और रातों की अवधि लगातार वर्ष भर बदलती रहती है। परन्तु मार्च-अप्रैल और सितंबर-अक्टूबर के दौरान दिन और रात की अवधि लगभग बराबर होती है। ये नवपद ओली के दिन हैं। चूंकि दिन और रात की अवधि लगभग समान होती है, इन दिनों में प्रकृति संतुलन में रहती है। इन दिनों में न तो अधिक गर्मी होती है और न ही अधिक ठंडक। ये मध्यम ऋतु हैं, जो ब्रह्मांड की सर्वोच्च शक्तियों की पूजा करने के लिए बिल्कुल उपयुक्त हैं।

आयंबिल तप करने के लाभ | Benefits of Ayambil Tapa :

चैत्र में नवपद ओली गर्मियों की शुरुआत और सर्दियों के अंत में आती है। इसी प्रकार आश्विन में नवपद ओली सर्दियों की शुरुआत और गर्मियों के अंत में आती है। दोनों मौसम हमारे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। भक्ति और नवपद प्रार्थना हमें मानसिक रूप से स्वस्थ रखती है जबकि आयंबिल (उपवास) और अन्य तपस्या हमें रोगों से लड़ने के लिए उत्साहित करती है और हमें शारीरिक रूप से स्वस्थ रखती है।

नवपद ओली पूजा के दिन व तिथियां | Days and Lunar dates of Navpad Oli for worshiping Navpad

दिन

तिथि

पद

1

चैत्र / आश्विन शुक्ल सप्तमी

अरिहंत

2

चैत्र / आश्विन शुक्ल अष्टमी

सिद्ध

3

चैत्र / आश्विन शुक्ल नवमी

आचार्य

4

चैत्र / आश्विन शुक्ल दशमी

उपाध्याय

5

चैत्र / आश्विन एकादशी

साधु

6

चैत्र / आश्विन शुक्ल पूर्णिमा

सम्यक दर्शन

7

चैत्र / आश्विन शुक्ल त्रयोदशी

सम्यक ज्ञान

8

चैत्र / आश्विन शुक्ल चतुर्दशी

सम्यक चरित्र

9

चैत्र /आश्विन शुक्ल पूर्णिमा

सम्यक तप

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Sanjay Sharma
Sanjay Sharma is the founder and author of Mission Kuldevi inspired by his father Dr. Ramkumar Dadhich. Mission Kuldevi is trying to get information of all Kuldevi and Kuldevta of all societies on one platform.

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