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छिन्नमस्तिका धाम : माता चिंतपूर्णी देवी मंदिर, जहाँ चार गुना अधिक मिलता है फल | Mata Chintpurni Devi Mandir

Mata Chintpurni Devi Mandir Story in Hindi : अपने भक्तों की सभी चिंताओं को दूर कर उनकी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली भगवती श्री चिंतपूर्णी देवी का मंदिर हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में स्थित है, जिसमें देवी पिंडी के रूप में विराजमान हैं। यह मंदिर हिन्दुओं का एक प्रमुख धाम है।  इसे छिन्नमस्तिका धाम के नाम से भी जाना जाता है।

Chintpurni Mata Video :

चिंतपूर्णी मंदिर की यात्रा, दर्शन व मंदिर की जानकारी के लिए यह वीडियो अवश्य देखें –

कौन हैं देवी छिन्नमस्तिका ?

देवी छिन्नमस्तिका जिन्हें छिन्नमस्ता भी कहा जाता है,दस महाविद्याओं में से एक है। इस महाविद्या का संबंध महाप्रलय से है। यह देवी  भगवती त्रिपुरसुंदरी का ही रौद्र रूप है।  छिन्नमस्तिका का अर्थ है ‘कटे हुए सर वाली’ . देवी छिन्नमस्तिका अपने एक हाथ में खड्ग तथा दूसरे हाथ में अपना ही कटा हुआ सर धारण किये हुए हैं। इनके स्कंध से रक्त की तीन धाराएं निकलती हैं जिनमें से एक रक्तधारा का स्वयं तथा अन्य दो धाराओं का इनकी सहयोगी देवियां वर्णिनी और शाकिनी पान कर रही हैं। (कुछ स्थानों पर वर्णिनी और शाकिनी के स्थान पर जया और विजया नाम मिलता है )

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Chinnamasta

एक बार युद्ध में असुरों का संहार करने के उपरांत भी जब इन देवियों की रक्त की प्यास शांत नहीं हुई तो देवी ने अपना सिर काटकर अपनी और इन सहयोगी देवियों की रक्तपिपासा शांत की थी। इसलिए यह महाविद्या छिन्नमस्तिका कहलाई।  इन्हीं देवी छिन्नमस्तिका को समर्पित इस मंदिर में भक्तों के सभी कष्ट व चिंताएं समाप्त हो जाती हैं। इसलिए यहाँ प्रतिष्ठित देवी चिंतपूर्णी के नाम से प्रसिद्ध हुई।

एक दैत्य ने की थी यहाँ माँ की स्थापना

मान्यता है कि इस स्थान पर माँ छिन्नमस्ता की स्थापना जलंधर नामक दैत्य की आराधना से हुई थी।  त्रेतायुग में जलंधर दैत्य भगवान् शिव के क्रोध से उत्पन्न हुए थे।  इसी जलंधर दैत्य ने जालंधर पीठ की स्थापना की। पंजाब के सबसे प्राचीन शहर जालंधर का नाम इसी दैत्य के नाम पर पड़ा है।

लेकिन कालान्तर में विदेशी आक्रान्ताओं के कारण इस स्थान का लोप हो गया और लोग इस स्थान को भूल गए।

भक्त माईदास ने की थी इस धाम की खोज

मान्यता है कि माईदास नामक दुर्गामाता के एक श्रद्धालु भक्त ने इस स्थान की खोज की थी।  दन्त-कथा के अनुसार माईदास के पिता अठर नामी गाव (रियासत पटियाला) के निवासी थे। इनके तीन पुत्र थे।

देवीदास, दुर्गादास व् सबसे छोटे माईदास। भक्त माईदास का अधिकांश समय देवी की आराधना मे व्यतीत होता था, इस कारण वह अपने दोनों बड़े भाइयों के साथ व्यापार आदि कार्यों मे पूरा समय नहीं दे पाते थे। इसी बात को लेकर उनके भाईयों ने उन्हें घर से अलग कर दिया। 

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Mata Chintpurni Devi

माईदास ने अपनी भक्ति कोई कमी नहीं आने दी। एक बार अपनी ससुराल जाते समय माईदास जी मार्ग मे घने जंगल मे वट-वृक्ष के नीचे आराम करने बैठ गए ( इस स्थान का प्राचीन नाम छ्प्रोह था और आजकल उसी वट वृक्ष के नीचे चिंतपूर्णी मंदिर बना हुआ है) संयोगवश माईदास जी की आँख लग गई तथा स्वप्न मे उन्हें दिव्य तेज से युक्त एक कन्या दिखाई दी, जिसने उन्हें आदेश दिया के तुम इसी स्थान पर रहकर मेरी सेवा करो। इसी मे तुम्हारा भला है। तन्द्रा टूटने पर वह फिर ससुराल की ओर चल दिए। परन्तु उनके मस्तिष्क मे बार बार वह ध्वनि गूंजती रही।

ससुराल से वापिस आते समय माईदास के कदम फिर यहाँ रुक गए।  घबराहट मे वह फिर उसी वट-वृक्ष की छाया मे बैठ गए और भगवती की स्तुति करने लगे। देवी ने दर्शन देकर कहा कि मै इस वृक्ष के नीचे चिरकाल से विराजमान हूँ। लोग यवनों के आक्रमण तथा अत्याचारों के कारण मुझे भूल गए है।  मै इस वृक्ष के नीचे पिंडी रूप मे विराजमान हूँ।  तुम मेरे परम भक्त हो अत: यहाँ रहकर मेरी आराधना और सेवा करो। मै छिन्नमस्तिका के नाम से पुकारी जाती हूँ। नीचे जाकर तुम किसी बड़े पत्थर को उखाड़ो, वहां जल मिलेगा, उसी से तुम मेरी पूजा किया करना।

देवी के दर्शन पाकर प्रसन्नचित्त माईदास पहाड़ी से थोडा नीचे उतरे और एक बड़ा पत्थर हटाया तो काफी मात्र मे जल निकल आया। उन्होंने वहीं अपनी झोंपड़ी बना ली और उसी जल से नित्य नियमपूर्वक पिंडी कि पूजा करनी प्रारम्भ कर दी। आज भी वह बड़ा पत्थर जिसे माईदास जी ने उखाड़ा था, चिंतपूर्णी मंदिर मे रखा हुआ है। जिस स्थान से जल निकला था, वह अब सुंदर तालाब बनवा दिया गया है। इस स्थान से जल लाकर माता जी का अभिषेक किया जाता है।

मंदिर की रोचक बात

छिन्नमस्तिका धाम की एक विशेष बात यह है कि इस मंदिर को चारों दिशाओं से भगवान् रुद्र महादेव ने सुरक्षित कर रखा है। पूर्व में कालेश्वर महादेव, पश्चिम में नारायण महादेव, उत्तर में मचकण्ड महादेव तथा दक्षिण में शिव बाड़ी मंदिर स्थित हैं। इसमें दिलचस्प बात यह है कि ये चारों महादेव मंदिर चिंतपूर्णी मंदिर से २३-23 किलोमीटर की समान दूरी पर स्थित है।

चार गुणा अधिक फल प्राप्त होता है यहाँ

मान्यता है कि छिन्नमस्तिका की आराधना से शिवत्व की प्राप्ति होती है। पुराणों में यह भी कहा गया है कि इस स्थान पर जो भी साधना करता है, उसे किसी भी अन्य स्थल से चार गुणा अधिक फल प्राप्त होता है और उसकी सारी चिंताएं समाप्त हो जाती हैं। मां चिंतपूर्णी अपने हर उस सच्चे भक्त की चिंताओं को हर कर मनोकामना पूरी करती हैं, जो सच्चे मन से मां के दरबार में शीश नवाने पहुंचता है। 

प्राचीन वटवृक्ष

भवन के मध्य में माता एक वटवृक्ष के नीचे गोल पिण्डी के रूप में विराजमान हैं।  जिसके दर्शन भक्त कतारबद्ध होकर करते हैं।  इस वटवृक्ष पर श्रद्धालु अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए मोली बांधते हैं। 

नवरात्रि में भरते हैं विशाल मेले

नवरात्रि के दौरान, मंदिर में बड़े मेलों और उत्सवों का आयोजन होता हैं जिसमें देवी से आशीर्वाद लेने के लिए दुनिया भर के सभी भक्त इस स्थान पर आते हैं। मेला मार्च-अप्रैल, जुलाई-अगस्त और सितंबर-अक्टूबर महीने में तीन बार आयोजित किया जाता है। मार्च-अप्रैल में मेला नवरात्रों के दौरान होता है, जबकि जुलाई-अगस्त में यह शुक्ल पक्ष के पहले दस दिनों के दौरान होता है। दौरान सभी दिन मेले भरे रहते हैं किन्तु अष्टमी को मेला धूमधाम से मनाया जाता है।

Best Time to Visit Chintpurni Devi Temple

चिंतपूर्णी मंदिर वर्षभर खुला रहता है। यदि आप इस मंदिर में माता का दर्शन करना चाहते है तो आप किसी भी मौसम में आ सकते है। लेकिन सर्दियों के मौसम में इस मंदिर के आस पास का न्यूनतम तापमान शुन्य से भी नीचे चला जाता जो पर्यटकों के स्वास्थ के लिए सही नहीं है एवं वर्षा ऋतु में यहाँ अन्य स्थानों के अपेक्षा अधिक वर्षा होती है अतः पर्यटकों के लिए यहाँ आने का सबसे उपयुक्त समय अप्रैल से सितम्बर के मध्य का माना जाता है। 

How to Reach Chintpurni Temple 

By Air – यदि आप हवाई मार्ग का इस्तेमाल कर मंदिर का दर्शन करना कहते है तो आप इस मंदिर के नजदीकी हवाईपतन का इस्तेमाल कर सकते है जहाँ से आप निजी वाहन की मदद से मंदिर तक आ सकते हैं। इस मंदिर से नजदीकी airports  इस प्रकार हैं –

  • गग्गल हवाईअड्डा धर्मशाला, काँगड़ा – 60 km
  • अमृतसर हवाईअड्डा – 160 km
  • चंडीगढ़ हवाईअड्डा – 150 km

By Train – चिंतपूर्णी तक आने के लिए देश भर के विभिन्न शहरों से बहुत सी Trains हैं  जो आपको मंदिर के नजदीकी रेलवे स्टेशन तक पंहुचा सकती हैं, जहाँ से आप निजी वाहन की सहायता से मंदिर तक पहुँच सकते है | मंदिर से नजदीकी रेलवे स्टेशन ये हैं –

  • Amb Andaura – 20 km
  • Hoshiarpur – 42 km
  • Una Himachal – 50 km

By Road – सरकार द्वारा चिंतपूर्णी को सभी मुख्य शहर से जोड़ा गया है | यहाँ तक आने के लिए आपको सभी प्रकार का tourist vehicle मिल सकते है या आप अन्य बस या taxi का इस्तेमाल कर मंदिर तक पहुँच सकते है | चिंतपूर्णी से निम्न शहरों की दूरी (distance) निम्नलिखित है –

  • Chandigarh to Chintpurni – 150 km
  • Delhi to Chintpurni – 420 km
  • Hoshiarpur to Chintpurni – 42 km
  • Jalandhar to Chintpurni – 90 km
  • Kangra to Chintpurni – 55 km
  • Naina Devi to Chintpurni – 115 km
  • Vaishno Devi to Chintpurni – 250 km

Chintpurni Devi Temple on Google Map

Places to visit near Chintpurni Temple

हिमाचल प्रदेश में कई ऐसे स्थान है जो देखने योग्य है। माता चिंतपूर्णी के समीप भी कई स्थान ऐसे हैं जो दर्शनीय हैं –

Kangra : कांगड़ा हिमालय के सबसे खूबसूरत घाटियों में से एक के रूप में जाना जाता है | यह घाटी हरियाली से भरी हुई है, जो कि देखने योग्य है | यह क्षेत्र कला और शिल्प के लिए प्रसिद्ध है | Chintpurni से Kangra 54 km दूर है | यहाँ कांगड़ा देवी का भव्य मंदिर और कांगड़ा का किला भी दर्शनीय है।

Jwala Ji : ज्वालाजी में 51 शक्तिपीठों में से एक प्रमुख शक्तिपीठ माता ज्वाला देवी का मंदिर स्थित है जहाँ माँ भगवती प्राकृतिक ज्वालाओं के रूप में विराजमान हैं जो कि सदियों से स्वतः ही जलती आ रही हैं। Chintpurni से Jwala ji की दूरी लगभग 32 किलोमीटर है। Read More >>

Baglamukhi Devi : रानीताल के पास स्थित माता बगलामुखी देवी का मंदिर स्थित है। माँ छिन्नमस्तिका के ही समान बगलामुखी देवी भी दस महाविद्याओं में से एक है। यह मन्दिर चिंतपूर्णी से लगभग 31 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। Read More >>

Dharamsala : Dharamsala सुरम्य कांगड़ा घाटी में स्थित और हिमाचल प्रदेश के धौलाधार पर्वत श्रृंखला से सटा हुआ एक स्थान है | धर्मशाला, प्रकृति प्रेमियों के लिए एक आदर्श स्थान है | धर्मशाला को हिमाचल प्रदेश की शीतकालीन राजधानी के रूप से भी जाना जाता है | यह Chintpurni से 75 km दूर है |

Sanjay Sharma
Sanjay Sharma is the founder and author of Mission Kuldevi inspired by his father Dr. Ramkumar Dadhich. Mission Kuldevi is trying to get information of all Kuldevi and Kuldevta of all societies on one platform.

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