Lakhara Samaj in Hindi: भारतीय संस्कृति में ‘सुहाग’ और उसके प्रतीकों का सर्वोच्च स्थान है, और इन प्रतीकों (विशेषकर चूड़ियों) को अपने हाथों से गढ़ने वाले महान शिल्पी समुदाय का नाम है— लखारा समाज। मुख्य रूप से राजस्थान और भारत के उत्तर-मध्य क्षेत्रों में पाए जाने वाले इस समुदाय को लखेड़ा, लखरिया, लखरा, लखावत और लखेरा जैसे नामों से भी जाना जाता है।
‘मिशन कुलदेवी’ के इस विशेष लेख में हम लखारा समाज की ऐतिहासिक व पौराणिक उत्पत्ति, उनके अनूठे रीति-रिवाज, राजपूती खाँपों (गोत्रों) और उनकी गोत्रानुसार कुलदेवियों के बारे में विस्तार से जानेंगे।
लखारा शब्द का अर्थ और समाज का परिचय
“लखरा” या “लखारा” शब्द की उत्पत्ति “लाख” (Lac/Shellac) से हुई है। लाख एक प्राकृतिक राल (Resin) है, जो पेड़ों पर पाए जाने वाले एक विशेष कीट के स्राव से प्राप्त होता है। इसी लाख से सुंदर चूड़ियाँ, खिलौने और सजावटी वस्तुएं बनाने का पुश्तैनी कार्य करने वाले शिल्पी ‘लखारा’ कहलाए।
धार्मिक मान्यताएं:
- लखारा समाज में हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्मावलंबी होते हैं।
- हिन्दू लखारे: ये सनातन धर्म के पक्के अनुयायी हैं। ये मुख्य रूप से भगवान शिव (महादेव) और माता पार्वती के उपासक हैं। कुछ लोग भगवान विष्णु को भी मानते हैं।
- मुस्लिम लखारे: ये सुन्नी सम्प्रदाय को मानने वाले होते हैं, लेकिन हिन्दू लखारों की भाँति ही ये भी पुश्तैनी रूप से लाख की चूड़ियों का ही व्यवसाय करते हैं।
लखारा समाज की उत्पत्ति: शिव-पार्वती की पौराणिक कथा
लखारा समाज की ऐतिहासिक उत्पत्ति के बारे में इतिहासकारों के अलग-अलग मत हैं। कुछ का मानना है कि वे 11वीं शताब्दी में मध्य एशिया से आए थे, जबकि अधिकांश विद्वान इन्हें भारतवर्ष का ही प्राचीन और स्वदेशी समुदाय मानते हैं।
समाज में इनकी उत्पत्ति को लेकर एक बेहद दिव्य और रोचक पौराणिक कथा प्रचलित है:
हटड़िया की उत्पत्ति: एक बार कैलाश पर्वत पर माता पार्वती श्रृंगार कर रही थीं। उन्होंने देखा कि उनके हाथ आभूषणों से खाली हैं। उन्होंने महादेव से कहा कि “महाराज, मेरे हाथों को ढकिए (सजाइए)।”
माता पार्वती की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान शिव ने तुरंत अपने शरीर के मैल (भस्म) से एक पुरुष का निर्माण किया। शिवजी ने उसका नाम ‘हटड़िया’ रखा और उसे बड़-पीपल के पेड़ की लाख से चूड़ा बनाना सिखाया। हटड़िया ने तुरंत एक सुंदर चूड़ा बनाकर माता को पहनाया। पार्वती जी चूड़ा पहनकर बहुत प्रसन्न हुईं और इनाम के रूप में उसे बहुत सारे कीमती मोती दिए।
लखारा समाज के अनूठे रीति-रिवाज और परंपराएं
लखारा समुदाय की अपनी एक विशिष्ट संस्कृति है जो उनके पेशे से गहराई से जुड़ी है।
- महिलाओं के विशेष नियम: इस जाति की औरतें कभी भी हाथी दाँत और काँच का चूड़ा नहीं पहनती हैं (वे केवल लाख पहनती हैं)। साथ ही, इस समाज की महिलाएं अपनी नाक भी नहीं छिदाती हैं।
- विवाह संस्कार: दोनों मुख्य उपजातियों में अंतर्विवाह (Endogamy) प्रचलित है। हिन्दू लखारों में ‘नाता प्रथा’ (पुनर्विवाह) को भी सामाजिक मान्यता प्राप्त है।
- चूड़ी पहनाने के नियम: इनके चूड़ी पहनाने के अपने कुछ सख्त पारंपरिक और सामाजिक नियम हुआ करते थे।
- खान-पान और भाषा: इनकी अपनी बोली है जो हिंदी और राजस्थानी का मधुर मिश्रण है।
व्यवसाय: सुहाग का सृजन (The Art of Lac)
भारतवर्ष में विवाह, सगाई, तीज-त्यौहार या संतान होने पर हर अमीर-गरीब, हिन्दू-मुस्लिम घर में लाख के चूड़े की आवश्यकता होती है। केवल विधवा स्त्री चूड़ा नहीं पहनती।
लखारा समाज के पुरुष और स्त्रियां दोनों मिलकर चूड़े बनाते और पहनाते हैं। जब बड़े और संपन्न घरों में चूड़ियों की आवश्यकता होती है, तो लखारा समाज की स्त्रियां (लखारी) खुद उनके घर जाकर चूड़ी पहनाती हैं, जिसके बदले उन्हें मूल्य के अतिरिक्त अच्छा ‘नेग’ (मजदूरी/ईनाम) भी मिलता है।
लखारा समाज की खाँपें (Gotra) और उपजातियां
राजस्थानी लखारों को मुख्य रूप से दो उपजातियों में बांटा गया है— हटड़िया और राजकुली।
हटड़िया उपजाति में कोई अलग से खाँप नहीं होती। किन्तु ‘राजकुली’ लखारों की उत्पत्ति सीधे तौर पर राजपूताना इतिहास से जुड़ी है, इसलिए इनकी खाँपें विशुद्ध राजपूती गोत्रों पर आधारित हैं।
लखारा समाज की कुलदेवी और इष्ट देव
लखारा समाज की सामूहिक आराध्य देवियां चैना माता और कुशला माता हैं। इसके अतिरिक्त इस समाज के लोगों की श्री बालाजी (हनुमान जी) और रूप जी महाराज में अत्यंत गहरी आस्था है।
चूँकि राजकुली लखारों की उत्पत्ति राजपूती वंशों से हुई है, इसलिए वे अपने गोत्र (खाँप) के अनुसार अपनी प्राचीन राजपूती कुलदेवियों की भी विशेष पूजा करते हैं। यहाँ राजकुली लखारा समाज की खाँपों और उनकी गोत्रानुसार कुलदेवियों की विस्तृत सूची दी गई है:
| क्र.सं. | राजकुली खाँप (Gotra) | मूल वंश (Origin) | गोत्रानुसार कुलदेवी (Gotra Kuldevi) |
| 1 | चौहान (Chauhan) | अग्निवंशी राजपूत | आशापुरा माता / शाकंभरी माता |
| 2 | राठौड़ (Rathore) | मारवाड़ के सूर्यवंशी | नागणेची माता |
| 3 | भाटी (Bhati) | जैसलमेर के चंद्रवंशी | स्वांगिया माता / भादरिया माता |
| 4 | कछवाहा (Kachhwaha) | ढूंढाड़ के सूर्यवंशी | जमवाय माता |
| 5 | सोलंकी (Solanki) | चालुक्य वंश | क्षेमंकरी (खिंवज) माता / खोडियार माता |
| 6 | पंवार (Panwar) | अग्निवंशी राजपूत | अर्बुदा देवी / सच्चिया माता |
| 7 | पड़िहार / प्रतिहार (Parihar) | प्रतिहार वंश | चामुंडा माता |
| 8 | बागड़िया (Bagadiya) | क्षेत्रीय गोत्र | चामुंडा / क्षेत्रीय भवानी |
| 9 | नेणवा (Nenwa) | क्षेत्रीय गोत्र | क्षेत्रीय माता |
| 10 | हारड़ा (Harda) | क्षेत्रीय गोत्र | क्षेत्रीय माता |
(नोट: कुलदेवियों और गोत्रों के नाम पैतृक निवास और क्षेत्रीय मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। यह सूची केवल एक छोटा सा प्रयास है! यदि आपके गोत्र और आपकी कुलदेवी का नाम इस लेख में शामिल नहीं है, तो कृपया नीचे कमेंट बॉक्स में अपना गोत्र और कुलदेवी का नाम जरूर लिखें, ताकि समाज के अन्य लोगों को मदद मिल सके।
🙏 क्या आपको अपनी कुलदेवी की जानकारी नहीं है?
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आधुनिक चुनौतियां और सशक्तिकरण
आज लखारा समुदाय को कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। बाजार में मशीन से बनी सस्ती कांच और प्लास्टिक की चूड़ियों के आधुनिकीकरण के कारण इनके पारंपरिक व्यवसाय को भारी नुकसान हुआ है। इसके अलावा, लाख को पिघलाने में इस्तेमाल होने वाले रसायनों के धुएं के कारण इन्हें त्वचा और श्वसन (सांस) संबंधी बीमारियों का भी सामना करना पड़ता है।
आज सरकार और ‘लखारा वेलफेयर सोसाइटी’ जैसे कई संगठन इस कला को बचाने और समाज के युवाओं को नई शिक्षा व आजीविका के अवसर प्रदान करने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं। लखारा समाज राजस्थान और भारत की सांस्कृतिक विरासत का वह अमूल्य हिस्सा है, जिसके बिना हर शुभ कार्य अधूरा है।



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